Vah Tha Sajjan Thag

वह था सज्जन ठग

वह ठग तो बहुत बड़ा था परन्तु उसकी शक्ल-सूरत, रहन-सहन, बोलचाल, चाल-ढाल सब बहुत अच्छे आदमियों जैसी थी । इसलिए जो लोग उसकी करतूतों को जानते थे उसे सज्जन ठग कह कर बुलाते थे। यह बात आज से लगभग पांच-सौ साल पहले की है । मुलतान के पास तुलम्बा नाम का एक शहर है । वह सज्जन ठग वहीं रहता था। शहर के बाहर सड़क के किनारे उसने एक मन्दिर बनवा रखा था और उसके साथ ही एक मस्जिद भी बनवा रखी थी। वह खुद सड़क के किनारे कभी हिन्दू साधुओं जैसा और कभी मुसलमान फ़कीरों जैसा भेस बना कर बैठ जाता था। उसके हाथ में सदा माला रहती थी। वह हमेशा माला के मनके फेरता रहता था और मुंह से धीरे-धीरे कुछ बुदबुदाता रहता था। उसके दूत उसी सड़क पर आगे जाकर आने वाले यात्रियों की टोह लिया करते थे और उस शहर की तरफ आने वाले यात्रियों का पूरा विवरण पहले ही उस ठग के पास पहुंचा दिया करते थे।

जब यात्री उसके पास से गुजरते तो वह उन्हें बड़े आदर और सत्कार से मिलता, उनकी बड़ी आवभगत करता और अपनी मीठी-मीठी तथा गूढ़ ज्ञान से भरी हुई बातों से उनके मन में अपनी सज्जनता का पूरा विश्वास बैठा देता। यदि यात्री हिन्दू होते तो वह उन्हें मन्दिर में ठहरा लेता और यदि यात्री मुसलमान होते तो वह उनके लिये मस्जिद में ठहराने का इन्तजाम कर देता। बड़ी रात तक वह उन यात्रियों के साथ परमात्मा की, धर्म की, ज्ञान की बातें करता रहता और फिर जब थके-मांदे यात्री नींद में सो जाते तो सज्जन ठग और उसके साथी मिलकर यात्रियों को मार डालते, उनकी लाशों को एक अन्धे कुएं में फेंक देते और उनका माल-असबाब लूट लेते।

एक बार यात्रा करते-करते गुरु नानक और उनका साथी मरदाना उस शहर की तरफ आ निकले । गुरु नानक का भव्य रूप और उनके चेहरे का तेज देखकर सज्जन ठग के दूतों ने सोचा यह जरूर कोई बहुत अमीर आदमी है। उन्होंने यह खबर सज्जन ठग के पास पहुंचा दी । बस वह इनके आने की राह देखने लगा।

जैसे ही गुरु नानक और मरदाना वहां पहुंचे उसने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। फिर वह उन्हें अपने साथ अन्दर ले आया और उनसे धर्म-कर्म की बातें करने लगा।
जब रात काफी हो गयी तो उसने गुरु नानक से कहा-"महाराज, अब आप लोग विश्राम कीजिये । आप दिन भर के थके-हारे हैं। कल आपको फिर लम्बी यात्रा पर जाना है।"
गुरु नानक ने उस ठग की कपट भरी आंखों में झांका । ठग कुछ घबड़ासा गया । आज तक किसी ने उसे इस तरह नहीं देखा था। गुरु नानक ने कहा-"आप तो बड़े धर्मात्मा व्यक्ति हैं। सोने से पहले आप परमात्मा का नाम अवश्य लेते होंगे।"
इस प्रश्न से वह कुछ और घबड़ाया। उसने कहा-“जी हां महाराज, मैं सोने से पहले कुछ देर तक परमात्मा को स्मरण करता हूं।"
"तो आओ आज मेरे साथ मिलकर परमात्मा को याद करो।" गुरु नानक ने उसे और उसके साथियों को अपने पास बैठाते हुए कहा।
सज्जन ठग और उसके साथी अजीब मुश्किल में पड़ गये। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि ये किस तरह के यात्री हैं। फिर भी उन्होंने सोचा, थोड़ी देर भजन-पूजन करने के बाद ये दोनों सो जाएंगे, तब हम लोग अपना काम कर लेंगे।

मरदाने ने रबाब बजाना शुरू किया और गुरु नानक एक सबद गाने लगे। उस सबद का भावार्थ था-"हे सज्जन, कासे का बर्तन ऊपर से कितना चमकता है परन्तु उसे जितनी बार धोया जाता है उसमें से मैल निकलता है। किसी हवेली को बाहर से कितना ही क्यों न संवारा जाए, उस पर कितनी ही चित्रकारी क्यों न की जाए परन्तु यदि वह अन्दर से पोली है तो वह जल्दी ही गिर जाएगी। बगुला पूरा सफेद होता है, वह नदियों के किनारे रहता है, किसी भक्त की तरह वह आंख मूंदकर एक टांग पर खड़ा रहता है परन्तु उसका काम क्या है-जल में रहने वाले जीवों को खाना । क्या उसकी सफेदी या उसके एक टांग पर खड़े रहने की बात सोचकर कोई उसे पवित्र-आत्मा कहेगा । देखो, सेमल का पेड़ कितना ऊंचा होता है। परन्तु सिर्फ ऊंचा होने का क्या लाभ, जबकि उसका फल फीका होता है और उसके पत्ते किसी काम नहीं आते ।"

गुरु नानक के इस भजन ने उस ठग को अन्दर तक हिला दिया। उसके सारे पाप उसकी आंखों के सामने नाचने लगे। उसकी आत्मा बिलख उठी। वह उनके चरणों पर गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा।
गुरु नानक ने कहा- "हे सज्जन ठग, मैं जानता हूं तुमने बहुत से पाप किये हैं। तुमने सज्जनों जैसा भेस बना कर बहुत से लोगों की हत्या की है और उनका माल-असबाब लूट लिया है। अब तुम उन सारे कर्मों का प्रायश्चित करो।"
ठग ने कहा-'गुरु जी, आज आपने मुझे नया जीवन दिया है। आपकी वाणी सुनकर मेरी सोई आत्मा जाग उठी है। अब आप ही बताइए कि मैं अपने कामों का प्रायश्चित किस प्रकार करूं?
गुरुनानक ने कहा-"लूट-मार करके जितनी सम्पत्ति तुमने जमा की है वह सब निर्धनों में बांट दो। आगे से एक सच्चे सज्जन जैसा जीवन व्यतीत करो। यही तुम्हारा प्रायश्चित है।"
उसने वैसा ही किया।

(डॉ. महीप सिंह)