धन्वंतरी की चिकित्सा (कन्नड़ कहानी) : कुवेम्पु

Dhanwantri Ki Chikitsa (Kannada Story) : Kuvempu

नंदनवन के एक किनारे कल्पवृक्ष से थोड़ी दूरी पर ऋषि विश्वामित्र एक अनाम वृक्ष की छाया में आगे-पीछे बरबस घूम रहे थे। हालाँकि वे नियतेंद्रिय थे, चाहने भर की देर, हर चाह की पूर्ति कर देनेवाले उस पेड़ के नीचे रहना कितना आघातकारी होता है, इस बात की उन्हें अनुभव से जानकारी थी। मन में कौंधती सारी भावचिंतापेक्षाएँ, जो अच्छी-बुरी, सानुकूल-प्रतिकूल होती हैं, वे सब जहाँ सच हो जाएँ तो क्या हो? सात्विकता को लेकर तीव्र विश्वास करने जितना अहंकारी न थे। ऋषि विश्वामित्र का मन गंभीर रूप से चिंता में डूबा था, वह उद्विग्न था, दूर आनंद-विलास में डूबे घमंडी देव विलासी और विलासिनी किसी कारण से जोर से हँस पड़े तो ऋषि ने एक बार अपना सिर उठाकर देखा। भौंहें तानकर, होंठ काट कर गुस्से में आए। जैसे करोड़ों इंद्रधनुष रासलीला में तल्लीन हों, हलके सी बहती हवा के आगे झूमती शोभित हो रही, सुगंधित पुष्पों से परिपूर्ण लताओं के बीच रंभा, ऊर्वशी, तिलोत्तमा, धृताचि, मेनका आदि अप्सराओं के साथ करालिंगन की भंगिमा में नर्तन कर गाते इंद्रादि देवताओं को देख संयमी, विरागी विश्वामित्र को गुस्सा चढ़ा। उस गुस्से में जलन की छाया भी रही होगी। उस पर मेनका को देखकर उनका गुस्सा द्विगुणित हुआ। वह इस वजह कि वह इस संसार में आकर इनके अपमानित होने का कारण बनी थी। तब भी ऋषि ने उसे शाप नहीं दिया। अमृत पान कर मदोन्मत्त होकर शील की सीमा पार कर व्यवहार कर रहे उन स्वर्ग के निवासियों को जुगुप्सा भरी नजर से देखते सिर नीचे कर वे फिर से बरबस घूरने लगे थे, "यह स्वर्ग भी कैसी चीज है? कलाली से बढ़कर हो चुका है। नरक में भी यातना का सौंदर्य तो होता है। यहाँ पर लघुत्व की भी कोई सीमा नहीं। खापी कर घमंडी होना, तपस्वियों को बिगाड़ना, दानवों के साथ लड़कर हारना, तब भागकर त्रिमूर्तियों की शरण जाना। इन्हीं महत्कार्यों में इनका सारा जीवन खत्म होता है-वह भी तो नहीं-चिरंजीव खत्म भी तो कहाँ होते हैं?

ऋषि इस प्रकार सोचकर अभी मुसकरा रहे थे कि तभी उन देवाप्सराओं के नृत्य के पार, उस अमरगान के घोष से बढ़कर बढ़ा लंबा क्लेश युक्त, छाती को ही जलाती एक कराहने की आवाज नंदन की भूमि को ही फोड़नेवाली सी सुनाई पड़ी। बिजली के गिरने से मानो ऋषि का मुँह खुल गया, काँप कर खड़े हो गए, "फिर वही कराहने की आवाज?" कह लंबी साँस छोड़ी।

वह कराहों की आवाज जरा भी उन मस्ती करते देवताओं को सुनाई न पड़ी। उनकी निर्लज पान-लीला निरापद आगे बढ़ी थी।

यह आवाज बहुत दिनों से विश्वामित्र का पीछा कर रही थी। समय कुछ भी हो, कुछ भी कर रहे हों, वह एकदम से कानों पर पड़ती और स्थित प्रज्ञ बने भी अस्थिर बना देती थी। वह जब कैलास गए थे, वहाँ पर भी यह सुन पड़ी थी। उसी जैसे वैकुंठ में, सत्यलोक में भू नरक में संचारार्थ गए थे, तब भी वहाँ की चीख के पार सुनाई पड़ी थी। रहस्यपूर्ण अनिर्दिष्ट वह आर्तध्वनि थी।

विश्वामित्र ने हालाँकि उसके मूल को जानने की कोशिश की थी, कुछ फायदा न हुआ था। वैकुंठ में वशिष्ठ से पूछा था तो उन्होंने यह कहकर कि उन्हें वह आवाज सुनाई नहीं दे रही है विश्वामित्र की मनोभ्रांति की उपज होगी उसे दूर करने को यज्ञ करने की सलाह दी थी। मगर विश्वामित्र को पुराने छूता भरे आचारों पर विश्वास नहीं रहा था तो वशिष्ठ की सारहीन सलाह की शरण में न गए थे।

विश्वामित्र ने सोचते हुए अपना सिर ऊपर उठाकर देखा तो परशुराम को अपने पास आते देखा। रेणुकातनय के चेहरे पर भी बादल छाए हुए थे। तेजी से पास आए।
उन्होंने विश्वामित्र के कंधे पर हाथ रखकर पूछा कि कुशिका पुत्र, क्या तुम्हें एक कराह सुनाई दी?

विश्वामित्र ने परशुराम से अपने अभी तक के सारे अनुभवों की बात बताई। परशुराम ने अपने भी उन्हीं अनुभवों की बात बताई और कहा कि उसके कारण को तलाशने त्रिभुवन संचार के लिए निकले हैं।

वे अभी यही बात कर ही रहे थे कि तभी देवाप्सराओं के आनंद की सारी ध्वनियों को निगलकर वह कराह खून को सख्त बनाते हुए सुनाई पड़ी। दोनों ऋषि दिग्भ्रांत हुए, बरबस काँपते खड़े हो गए। किसी को काँटोंवाले बिस्तर पर सीधे लिटाकर उसकी छाती पर चट्टान रखकर मन भर भारी हथौड़ा लेकर मारने पर निकलती कराह जैसी बीभत्स थी वह कराह!

विश्वामित्र-परशुराम के पाँवों का कंपन अभी नहीं थमा था। तभी नारद आराम से हरिकीर्तन करते हुए उस मार्ग से वैकुंठ की तरफ बढ़ रहे थे। दोनों ऋषि तेजी से त्रिलोक संचारी की तरफ चल पड़े और अपने अनुभव के कारणों के बारे में उनसे पूछा। नारद के चेहरे पर एक स्मित सी फूटी। आँखों से पानी भी झरा। उन परस्पर विरोधी भाषों वाली घटनाओं को देख विश्वामित्र, परशुराम आश्चर्यचकित हुए। तभी यह कहकर कि बहुत समय से मुझे भी कराहना सुनाई पड़ रहा है। जब भी सुनता हूँ, मेरी छाती काँपती है। ऐसा लगता है कि प्राण निचुड़ रहे हैं। मैं भी उसकी सही वजह नहीं जानता। यह अच्छी तरह मालूम है कि निश्चित रूप से यह कराह भूलोक से ही आती है। देव ऋषि गाना गाते चले गए। दोनों ब्रह्मार्षि भूलोक की तरफ तेजी से चल पड़े।

वे दोनों अभी भूमि के पास पहुँच रहे थे कि आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें पहचान से परे अंतर दिखाई दे गया-वह पुराने दिन जब थे लोग यहाँ थे, उस समय की भूमि और आज की भूमि, सभ्यता और संस्कृति के साथ उन्हें मिनटभर समय में कोई भी बरबाद कर सकने की असभ्य संस्कृति, उनकी रक्षा करनेवाली वैद्य संस्कृति के साथ बीमारी पैदा करनेवाली दृष्ट पद्धतियाँ, संपत्ति के साथ दारिद्रय, रेल, मोटर, हवाई जहाज, डाक, बिजली, बंदूक, बम, कागज, मुद्रण यंत्र आदि-आदि को देखते, प्रशंसा करते, समीक्षा करते हुए नवीन नरवेश धारण कर वे लोग एक महानगर में आ उतरे।

यंत्रों वाले वाहनों का संचार, इनसानों की चहल-पहल, व्यापार का शोर, होटलों की धक्का-मुक्की, बिजली के तारों का ताना-बाना और खंभों पर जमघट, अजीब विज्ञापनों का प्रदर्शन, शराब बंदीवाले ऑफिस के पीछे ही शराब की दुकान, पुलिस यानी की पीछेवाले मकान की छत पर जुआघर, गली में गंदगी करने से मना करते बोर्ड के नीचे ही असहनीय दुर्गंध, सिनेमा, नाट्यगृह, कारखाना, स्कूल, कलाशाला आदि बने आश्चर्य और कौतूहल, जुगुप्सा और हर्ष के साथ समीक्षा करते कराह के मूल कारण को ढूँढ़ने लगे। तलाशते हुए वे एक मंदिर गए। वहाँ पर पुजारी तक दृढता भरे विश्वास के साथ कि मंदिर में भगवान नहीं है, बैठकर पूजा करवाने आए लोगों से पैसे वसूल रहा था। वह और वहाँ पर आए भक्तों की व्यापारिक बुद्धि को देखा। दोनों ऋषियों को हँसी आई।

विश्वामित्र ने परशुराम से कहा, "रेणुकातनय, देखा तुमने, पुरोहित वर्ग के लोग पहले जैसे आज भी कर रहे हैं! संसार इतना बदल गया, मगर ये तो 'स्ताणुरचलोयम्' बने हैं।"
परशुराम ने क्षत्रियों पर ही दोषारोपण कर कहा, "बेचारे पुरोहित क्या करें? उस समय के राजाओं के मुताबिक पुरोहित लोग थे। आज के राजाओं के मुताबिक आज के पुरोहित हैं।"

एक दूसरी जगह एक मंदिर में लोगों का जमघट था, उसे देखकर, वहाँ जाकर देखा हरिकथा चल रही थी। वह दास भगवान की दया को देखकर श्रोताओं की आँखों में आँसू बहाते हुए सुना रहा था। लोगों का भावुकता में डुलाते कह रहा था? दोनों ऋषि थोड़ी देर सुनते वहाँ खड़े रहे। तभी उस दास ने संन्यासी की महिमा का वर्णन करते हुए परशुराम, विश्वामित्र की कथाएँ कहना शुरू कर दिया। अपने लिए ही विनूतन लगते उन दोनों ऋषियों ने विस्मय से सुना। अपनी महिमा के बारे में उन्हें स्वयं पता नहीं था।

परशुराम ने हँसते हुए पूछा, “यह दास किस विश्वामित्र के बारे में बोल रहा है, कुशिक सुत?" विश्वामित्र ने कहा, "वह मुझे लेकर या मेरे बारे में नहीं बोल रहा है, वह पुराण बाँच रहा है।"

एक और जगह एक बड़ी सभा जमी थी। दरवाजे पर वहाँ रंगीन कपड़े पहने खुली तलवार लिये सिपाही खड़े थे। जरीदार साफा कैप (टोपी), हैट, बूट, लंबी कमीज, शर्ट आदि कई तरह की वेश-भूषावाले लोग वहाँ जा रहे थे तो उनको देख दोनों ऋषि उन्हीं लोगों जैसे दिखते अंदर गए। सभी सुंदर और हृट-पुष्ट होकर, सालंकृत हो, संतृप्त हो, परस्पर हस्तलाघव (हाथ मिलाते हुए) आसान ग्रहण करने के बाद एक नर्तकी रंग प्रवेश कर नर्तन करने लगी। दोनों ऋषि बहाना बनाकर बाहर निकले।

जहाँ कहीं भी गए वहाँ कहीं पर कोई भी कराह की आवाज को लेकर बात नहीं कर रहा था। ऐसा नहीं लगा कि किसी को वह आवाज सुनाई दी हो। कुछ स्थानों पर तो परिस्थितियाँ ऐसी थीं, जिससे ऋषि अपने आने का उद्देश्य ही जैसे भूल गए।

नगर में खूब तलाश कर थक गए तो वे शहर निकले। नगर की हँसी-खुशी का शोर कानों से दूर हुआ तो तुरंत एक भयानक कराह की आवाज साफ सुनाई देने लगी, और वे दोनों तड़पकर आगे बढ़े! आगे बढ़ते जाने पर वे और समीपस्थ हुई। अरण्य प्रांत भी शुरू हुआ, वहाँ काफी दूर तक चले। वह भी निर्जन था। कहीं पर भी इनसान के रहने के चिह्न नहीं मिले। फिर बाद में जंगल का प्रदेश और भी घना हुआ, पहाड़ तक चढ़कर उतरे थे। पहाड़ की चोटी पर पहुँचते ही लगा कि नीचे घाटी की तरफ से सुनाई दे रही है, वह तीव्र यातनापूर्ण क्लिष्ट आर्तनाद था। दोनों ऋषि तीव्र भय से एक-दूसरे का हाथ पकड़कर घाटी में उतरे। वहाँ एक छोटे से खेत के एक किनारे उन्हें एक घास की झोंपड़ी दिखी। उस झोंपड़ी से सत्यलोक कैलास वैकुंठ तक चढ़कर विश्वव्यापी वह भयंकर कराह की आवाज निकल रही थी! ऋषि मामूली इनसान का वेश धारण कर वहाँ चले।

झोंपड़ी के बाहर कोई इनसान नहीं दिखा। राख की ढेर पर लेटा एक कुत्ता ही एक दो बार भौंककर चुप हुआ। एक मुरगी अपने छोटे बच्चों के साथ कीचड़ फैला रही थी। चारों तरफ अनंत अरण्य आसमान छूते पहाड की सरणी पर फैलकर बीमार से नीरवता और एकांतता को बढ़ा रही थी। गरमी आग उगल रही थी। उस नीरवता में भीतर से सुनाई दे रही वराह की आवाज भीष्म भयंकर गहरी थी।
विश्वामित्र ने झोंपड़ी से आवृत्त घास की दीवार के छेद से झाँककर अंदर देखा, परशुराम को भी वैसे ही करने का इशारा किया।

झोंपड़ी के अँदर धुंधला अँधेरा फैला था। सब कुछ धुआँ भरा, काली जाली और काला हो चुकी थी। सबल, दराती, डालिया, टोकरा, मिट्टी का घड़ा, हल, (हँसिया)-आदि सब खेती के उपकरण जगह-जगह बिखरे पड़े थे। निर्जीव कचरा, सजीव मक्खियाँ मानों यत्र-तत्र सजीव हो उठी थी, बीच में बिछे कंबल पर मैला कमर तक बाँधी धोती, पूरी तरह नंगा बना एक किसान सीधा लेटे छाती को दोनों हाथों से दबाते हुए जोर से कराह रहा था। उस नरक यातना पर उसका काला पड़ा, लकड़ी बना बदन सिर चट्टान के नीचे फँसे साँप की तरह तड़प रहा था। ऋषि देख ही रहे थे कि तभी गाँठों में खून उफनकर उसके मुँह से उछलकर लाल रंग से बाहर निकला और भूमि को गीला किया। उस किसान की बगल में खूब चिथड़ोंवाली बदन को ढंकने योग्य गंदी साड़ी पहनी दुबली उसकी घरवाली सिर पर हाथ धरे बैठे आँसू बहा रही थी। उस औरत के पीछे बाल फैलाकर विकृत रूप से, नंगी, ढीले पेट की, चार-पाँच साल की एक लड़की जमीन पर मूर्च्छित-सी होकर लेटी थी।

दोनों ऋषियों की छाती जल गई, आँखों से गरम पानी बहने लगा—उस महानगर में उन लोगों ने भोग करते हुए जो दृश्य देखे थे, उसको याद कर मन में गुस्सा भी उठा। तेजी से घास की टाट को धीमे से सरकाकर, अपना सिर कंगूर से लगने न देकर, भीतर घुसे।

हालाँकि इन दोनों ने एक मामूली इनसान का वेश धरा था, उन्हें देखते ही किसान की पत्नी ने चीत्कार कर हाथ जोड़े और टेर लगाई, "दया करो, आपके पाँव पड़ेंगी, अब पैसे नहीं हैं। मेरा घर वाला बीमार है। उसके चंगा होते ही कर्ज उठाकर भी ला देंगे। बच्ची को देखकर तो दया करो!" रोने लगी। ऋषियों ने जब उसे बहुत कोशिश कर यह कहकर समझाया कि हम कर वसूलीवाले सरकारी अफसर भी नहीं। पान भी नहीं, साहूकार के वसूलीवाले दूत भी नहीं, हम परदेसी यात्री हैं, उस औरत ने ऋषियों के चरणों पर गिरकर अपने दुःख का रोना रोया।

"तुम्हारे मर्द को कैसी बीमारी है?"
"कैसी बीमारी होगी, यह तो ऊपरवाला जाने?"
"कितने दिन हो गए?"
"बहुत वक्त से है। कभी एक बार कम होता है तो दुबारा बढ़ जाता है। कितनों को दिखाया, किसी की समझ में न आया कि कैसी बीमारी है। एकदम से ऐसा लगता है कि कोई छाती पर बैठ गया है, वजन बढ़ जाता है। जोड़ों में ऐसा लगता है जैसे लोहा गरम कर उस पर दाग दिया हो, और दर्द शुरू हो जाता है, बीच-बीच में खून गाँठों जैसे बहने लगता है। वैद्य हुए, ज्योतिषी हो गए, भगवान हो गए? साब जी, भगवान ने हमारा साथ छोड़ दिया है।" कहते वह औरत फूट- फूटकर रो पड़ी।
"नहीं, भगवान ने साथ नहीं छोड़ा। शांत हो जाओ। अपने से जो होगा, वह हम करेंगे" कहकर दोनों ऋषियों ने रोगी का परीक्षण किया।
हृदय, श्वासकोश, जठर, अतड़ियाँ, मस्तिष्क आदि सब अंगों का अच्छा परीक्षण किया। कहीं पर तिल भर भी दोष, रोग का कारण चिह्न नहीं दिखा। रोगी किसी भी प्रश्न का जवाब देने की हालत में नहीं था। जब छाती पर हाथ रखा तभी घाव को छूने से होते दर्द सा चेहरा सिकोड़कर और तीव्रता से कराहने लगता था।

ऋषि बहुत चिंतित हो गए। यह ब्रह्म विद्या से अधिक बड़ा रहस्य था। किसान की बीमारी का कारण मालूम नहीं हो रहा था। खैर, अंत को तय किया। नजदीक वाले गाँव के सरकारी डाक्टर को बुला लाए। उसने हालाँकि कहा भी कि मैं ऐसे गाँव जहाँ मोटर गाड़ी नहीं जाती, मैं बिलकुल नहीं आ सकूँगा, ऋषि के हाथ सोने के सिक्के देखकर नकेल बँधे साँड़ मानिंद बिना कुछ कहे चला आया।

मगर उसके रोगी के पास अंदर पहुँचते ही बीमार की छाती का बोझ बढ़ गया, अधिक खून निकलने लगा। डॉक्टर तेजी से उसका परीक्षण कर, रोग के लक्षण समझ में नहीं आने के बावजूद एक बड़ा लोटिन नाम कहकर रंगीन पानी को दवा के रूप में देकर गया। उसके दूर जाते-जाते रोगी भी अपनी पहली हालत पर पहुँचा।

उस औरत को डॉक्टर पर जरा सा भी विश्वास न था। उसने पुरोहित को बुलाने की सलाह दी। उसने पूरी तरह यह माना था कि किसी भयानक पिशाच की चेष्टा से ही उसका घरवाला बीमार है। विश्वामित्र के मना करने के बावजूद परशुराम ने यह कहकर कि देख ही लेते हैं, एक पंडितजी को बुलाया। उसे भी रोग का कोई कारण समझ में नहीं आया, मगर तब भी एक बड़ा सा नाम कहकर, यह बताकर कि माया मंत्र द्वारा उसे रोका है, सोने के सिक्के की दक्षिणा लेकर तृप्त होकर लौट गया।

विश्वामित्र ने परशुराम से कहा, "ये पुरोहित सब एक समान होते हैं। वसूली-है-वसूली। इस वशिष्ठ ने पूर्व में वसूली की थी न, उसी तरह आज यह पंडित भी वसूल रहा है! वह तो रघुवंश को शनिग्रह जकड़ चुका था। इक्ष्वाकु, रघु, दिलीप, दशरथ, राम सभी को अपनी पुरोहिताई से निचोड़ा था। मैंने कहा तो भी कि पुरोहित को नहीं बुलाएँगे।" दोनों ऋषि उसी झोपड़ी में रहे और उस किसान के रोग का रहस्य और कारण पहचानकर उसके लिए औषधि तलाशने की कोशिश की, मगर सब बेकार हुआ। ।

जैसे ही गाँववाले लोग और अधिकारियों को इस बात का पता चला कि इस झोंपड़ी में सोने के सिक्के खूब बाँटनेवाले लोग हैं, उन्हें किसान के स्वास्थ्य की खूब चिंता हुई और ऐसे लोग भी जिन्होंने कभी वहाँ पाँव तक रखा नहीं था, अब वहाँ आकर पूछताछ करने लगे। जैसे ही अधिकारी (साहब लोग), डॉक्टर, पुरोहित आते, किसान की छाती का दर्द बढ़ जाता।

कुछ दिन बाद एक दिन ध्यान करते विश्वामित्र को एक बात सूझी कि इस रोग रहस्य को देव वैद्य धन्वंतरी ही बता सकता है! परशुराम को भी यह सूचना ठीक लगी और उन्होंने धन्वंतरी को बुलावा भेजा। धन्वंतरी एक मामूली से वैद्य का भेष धारण कर शीघ्र वहाँ आ पहुँचा। किसान की छाती के दर्द की तड़पन देखकर और खून को भी गाढ़ा बना देनेवाली उस कराह की आवाज को सुनकर वह बेचैन हो गया। मगर फिर भी अगले ही मिनट यह यादकर कि वह स्वयं एक वैद्य है, हिम्मत कर रोगी का शरीर परीक्षण करने के लिए रोगी की छाती पर हाथ रखा।

विश्वामित्र और परशुराम भी किसान की पत्नी की तरह कातरता से होंठ बंद किये खड़े हो देख रहे थे। रोगी की कराहों के बीच, उस प्रतीक्षा की निस्पंदता बींब उसका श्वासोच्छ्वास भी सुनाई दे रहा था। बहुत देर तक परीक्षा कर फिर धन्वंतरी ने ऋषियों की तरफ व्यंग्यपूर्ण दृष्टि से देखा। किसान की बीवी ने उस दृष्टि में बसी निराशा को देख रोना शुरू कर दिया।

किसान की पत्नी को धन्वंतरी खाली देखते हुए लग रहे थे, मगर वास्तव में तब देव वैद्य और ऋषि बातचीत कर रहे थे।
धन्वंतरी ने कहा, "यह दैहिक रोग नहीं।"
परशुराम ने पूछा, "आत्मा का है क्या?"
धन्वंतरी ने सिर हिलाकर सूचित किया, "वह भी नहीं।"
विश्वामित्र ने चकित होकर पूछा, "तब?"

धन्वंतरी ने कहा कि दैहिक रोग होता तो इसे देह में ही होना था। मगर मैंने खूब परीक्षण किया है, वहाँ कहीं भी नहीं है। आत्मा का यदि होता तो उसे पाप रूप में दिखाना जरूरी था, मगर इस सरल सहज जीवन वाले किसान को अभी तक यह बीमरी नहीं चढ़ी। इसलिए कहकर अपनी जेब से एक दिव्य यंत्र बाहर निकाला (वह भी किसान की पत्नी को नहीं दिख रहा था) फिर यह कहकर कि उससे देखने पर सारा रहस्य खुल जाएगा वे रोगी से कुछ दूर और उस दिव्य यंत्र के सहारे परीक्षण करने लगे।

विश्वामित्र और परशुराम अभी खड़े होकर दिव्य यंत्र में ध्यान से देख ही रहे थे कि धन्वंतरी का चेहरा (गुस्से से) लाल हो गया। उसकी छाती श्वासोच्छ्वास के उतार-चढ़ाव से ऊपर-नीचे उड़ने लगी। आँखों से आँसू उभरकर हुए गालों पर गिरकर फिर नीचे गिरकर सूख गई।

"हाय रे पापी" कह धन्वंतरी ने हाथी की तरह चिंघाड़ा। मगर एक साधारण सी महिला किसान की पत्नी को यह आवाज उसकी खाँसी की तरह सुनाई पड़ी थी! दोनों ऋषि चौंक गए और "क्यों? क्या हुआ?" कहते हुए धन्वंतरी की तरफ बढ़े।

धन्वंतरी ने चुपचाप यंत्र को ऋषियों की तरफ आगे बढ़ाया। दोनों ऋषियों ने यंत्र में ध्यान से देखा, फिर चौंक गए!

किसान की छाती पर सारा चक्राधिपत्य (राज्यभार) बहुत बड़े पर्वत के आकार में पड़ा हुआ था। ऋषि जिस महानगर को देख आये थे, वह उसके सिर पर विराज रहा है! वहाँ के मंदिर, विद्या संस्थाएँ, क्रीड़ा संस्थाएँ, आनंद वन, कर्मसौध, कारखाने, राज प्रासाद आदि सभी अपना सारा बोझ किसान की छाती पर डालकर, संस्कृति और सभ्यता की कीर्ति से विराज रहे हैं।

"हाय! हाय! हाय! यही बड़ी बात है की वह अभी तक मरा नहीं, जिंदा है। गोवर्धन पर्वत को उठानेवाले श्रीकृष्ण की छाती पर भी इस राज्य का भार पड़ा होता तो वह भी टुकड़े-टुकड़े हो गया होता?" परशुराम चिल्लाए।

विश्वामित्र ने गुस्से से दाँत पीसकर कहा, "जमदग्नि ने उस दिन सभी शासकों के नामोनिशान मिटाकर समता प्रचार के लिए अपना सारा जीवन न्यौछावर कर दिया, वह बेकार गया।"

और तब परशुराम ने यह कहकर कि तुमने भी ऊँच-नीच का फर्क मिटाने के लिए सारा जीवन निछावर किया था न, अब देख, वह भी बेकार हुआ। धन्वंतरी की तरफ मुड़कर देखा और कहा, जल्दी बता धन्वंतरी क्या करने से यह किसान बचेगा?
धन्वंतरी ने जवाब दिया, उसकी छाती से राज्य का बोझ उतारने से रोग ठीक हो जाएगा।
"सारा संसार, नियमरहित होकर अराजक होकर अव्यवस्था फैल जाए तो?"

धन्वंतरी ने जरा क्रोधित हो गुस्से से कहा, आपकी अक्ल ठिकाने नहीं। पहले रोग दूर हो। फिर शरीर से मजबूत होकर वे नीचे गिरे 'राज्य के बोझ' को छाती पर न डालकर पीठ पर ढोकर 'राज्यभार' का वहनकर निर्वाह करेगा! तुरंत विश्वामित्र ने साँड़ की तरह हुँकारा। उस हुँकार से महा भयंकर शांतिभूत रूपाकार ले खड़े हुए और सिर झुकाकर कहा कि 'आदेश हो।'

तब गर्जनकर हाथ हिलाकर कहा, "जाओ, उस किसान की छाती पर पड़ा बोझ जमीन पर ढकेलो।" तुरंत राज्य में बिजली, वर्षा, आँधी, भूकंप दिखकर उत्पात हुआ। देखते-ही-देखते राजमहल नीचे गिरा। मंदिर बड़े जोर की आवाज से नीचे गिर पड़े।

लगा, किसान की कराह धीरे से घटने लगी। श्वासोच्छ्वास सहज होने लगा। आँखों में संतोष की रोशनी भी चमकी... फिर... कुछ ही देर बाद, सबको चकित करते हुए मुसकुराते हुए उठकर, ऋषियों को उसने प्रणाम किया!