Beti Ka Dahej Kulwant Singh Virk

बेटी का दहेज कुलवन्त सिंह विर्क

1947 की बात है। पश्चिमी पंजाब की हवा मुसलमानों के दबदबे से भारी पड़ गई थी। इतनी भारी कि बेचारे अल्ला रखे के लिए उसमें सांस लेना भी कठिन हो गया था। अल्ला रखा मुसलमान नहीं था, केवल अपनी जान बचाने के लिए इस्लाम के घराने में चला गया था। फसादों में जब उसके और बहुत सारे पास−पड़ोसी मारे गये तो उसने मुसलमान बन जाने की विनती की। उन लोगों ने उसका नाम अल्लारखा रख दिया था, क्योंकि यदि अल्लाह उसको न रखता तो उसे भी मौत के घाट उतार दिया जाता।
जान बचा कर अल्ला रखे को अब अपनी जान संभालनी मुश्किल पड़ रखी थी। घेरे में बंद किसी जंगली हिरण की तरह उसका दिल उड़ता रहता था। धरती छोड़ कर वह जाये तो जाये कहां। सारे आदमी, घर, दीवारें और सड़कें उसको अपनी दुश्मन लगतीं। तपती भूमि पर चल रहे किसी आदमी की तरह उसका पैर कहीं जम कर नहीं पड़ता, और वह चौकन्ना−चौकन्ना सा डोलता रहता। शहर आदमियों से भरा पड़ा था, पर वह किसी के साथ अपना मन नहीं मिला पा रहा था। कुछ आदमी खराब हैं तो कुछ अच्छे। पर कोई आदमी उसका अपना नहीं था। अपनी नई रोटी, नये कपड़े, अपनी अब वाली सूरत, और ऊब वाले साथी, उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। बस एक वह था और एक उसकी पत्नी। दोनों बैठकर वहां से निकल जाने की तरकीबें सोचते रहते। उन्हें अपने बच्चों से भी डर लगता था, कहीं घर में सुनी कोई बात बाहर उनके मुंह से निकल न जाये।
उन दिनों मैं पाकिस्तान में इस तरह के फंसे हुए लोगों को निकालने में लगा हुआ था। एक दिन उसने मुझे घूमते हुए देखा तो एक ओर कोने के लिए इशारा किया। मैं वहीं जा कर खड़ा रहा, पर वह न आया। वह मुझसे बातें करते हुए भी डरता था, शायद वहां खड़ा हुआ देखकर ही कोई गोली न मार दें। दो दिन के बाद वह फिर मिला। पूछने लगा तीन घंटों के बाद कहीं मिल सकते हो? मैंने कहा कोठी पर आ जाना। उसका मतलब साफ था। वह हिन्दुस्तान जाना चाहता था। तीन घंटों के बाद वह कोठी पर आ गया। और हम कुछ फोजियों को लेकर एक ट्रक में बैठकर उसके घर की ओर चल दिये।
जब हम उसके मुहल्ले में पहुंचे तो उसे मेरे साथ बैठे देखकर लोगों को बहुत क्रोध आया। मेरे साथ बैठने का अर्थ वे तुरंत समझ गये कि वह पाकिस्तान छोड़ कर हिंदुस्तान जा रहा है। लोग इसे अपने साथ विश्वासघात समझते थे। आखिर अल्लाह रक्खा उन थोड़े से लोगों में था जो अपनी जबान पर इतबार किया जाने के कारण बच सके थे। उन्होंने उसे इसलिए तो नहीं छोड़ा था कि वह कुछ दिनों के बाद ट्रक में बैठकर हिन्दुस्तान चला जाये। उसका इस प्रकार बदलना उनका बहुत बड़ा अपमान था। उनके चेहरों पर क्रोध देख कर तो अल्लारखा का भी रंग उड़ गया था। उनकी त्योरियों से डरना उसका स्वभाव बन चुका था।
जो गली उसके मकान को आती थी वह कुछ तंग थी और उसमें मोटर नहीं जा सकती थी। ट्रक को सड़क पर खड़ी करके हम उसके घर गये। भीतर उसकी पत्नी डर से सिकुड़ी हुई बैठी थी। उसके डर का मैं अच्छी तरह अंदाज नहीं लगा सकता था। जितनी सस्ती मनुष्य की जान उसकी आंखों के सामने होती रही थी, उतनी मेरी आंखों के आगे नहीं हुई थी। गली बाजारों में उसने जो मुर्दे देखे थे कुछ महीने पहले, उसके विचार में वैसी ही घटना उसके साथ भी हो सकती थी। मुझे पास डोलते देख कर उसे कुछ हौसला हुआ। उनका सामान बंधा पड़ा था और वे चलने के लिए तैयार थे। केवल एक छोटी लड़की की प्रतीक्षा थी जो स्कूल गई हुई थी। वह भी तभी आ गई।
'मम्मी सलाम आलेकुम।' उसने आ कर स्कूल में मिली शिक्षा के अनुसार कहा।
'नहीं बेटी, अब सत श्री अकाल कह। हम अब हिन्दुस्तान जा रहे हैं।' अल्लारखे की पत्नी ने उसका शुभ समाचार दे कर गोद में उठा लिया और फिर सीधे सामने देखकर जैसे उसके भविष्य में झांक कर देख लिया हो, कहा, 'अब तेरा विवाह वहीं करेंगे।'
सारे मुहल्ले में और आसपास के मुहल्लों में खबर फैल गई और लोग अल्लारखा को जाते हुए देखने के लिए इक्ट्ठे होने लगे। कुछ लोग गली की दीवार से सट कर खड़े हो गये। और कुछ दीवार पर चढ़ कर बैठ गये। कुछ और दीवार के पीछे से झांक रहे थे। और कई अपने कोठों और चौबारों पर से देख रहे थे। गली में खड़ों में से कुछ के पास राइफलें भी थीं। और उनकी गर्दन में पड़ी गोलियों की लडि़यां चमक रही थीं। यदि ऐसे समय राइफलों का दिखावा न किया तो उनका लाभ क्या। सारा वातावरण काफी शरारत भरा और भयानक बना हुआ था।
अब सामान को ट्रक में रखने का काम होना था। किसी मजदूर या किसी पड़ोसी का हाथ लगवाने का प्रश्न ही नहीं था। मेरे सामान उठाने में मेरी अफसरी पर बात आती थी। और यदि फौजी सामान उठाने लग जाते तो हम सभी की जान को खतरा था। इसलिए इस काम के लिए अल्लारखा अकेला ही था। रजाइयां दुलाइयां उसने गठरी में बांध ली थीं। और बर्तन बोरियों में भर लिये थे। एक दो ट्रंक कपड़ों के थे। ज्यों−ज्यों अल्लारखा सामान के नग उठा−उठा कर ले जा रहा था, आसपास खड़े दर्शकों का क्रोध बढ़ता जा रहा था, कभी वे आपस में लड़ने लग जाते, 'तुमसे कहा था कि न कि इसको भी ठिकाने से लगा दो। अब बताओ?' एक आदमी दूसरे से कह रहा था।
'अरे अब मिटा देते हैं शक, अभी भी क्या बिगड़ा है?' उनमें से एक ने उत्तर दिया।
इस प्रकार की बातें सुनकर मुझे भी डर लग रहा था। वह जगह इतनी तंग और खुली हुई थी कि बिना मारने वाले का पता लगे कहीं से भी गोली आ सकती थी। पर हम वहां से पूंछ दबा कर नहीं भाग सकते थे क्योंकि हमारे दौड़ने से उनके हौसले बढ़ सकते थे और उनका ज़ब्त टूटने का खतरा था। रूक रूक कर के सामान खत्म हुआ। आखिरी फेरे में उसकी पत्नी को भी मैं साथ ही ले आया। मेरी समझ में अब उनके बेकाबू होने के पहले हमारे पास केवल इतना समय ही था कि हम ट्रक में बैठ कर निकल जायें।
ट्रक में बैठने से पूर्व अल्लारखा की पत्नी ने सामान पर निगाह फेंकी। कुछ चीजें उनमें नहीं थीं।
'वह गागर और बटलोई नहीं लाये तुम।'
'वह काहे में बंधी हुई थीं?'
'बंधी तो नहीं थी, वे तो ऐसे ही रखी थीं।'
'वह नहीं आ सकतीं अब। जहां मकान और ऐसा ही और सामान रह गया है वहां वह भी रह जाने दे। बैठा जा चलें।'
अल्लारखा ने ठीक कहा, उन्हें लाना अब बहुत खतरे वाला काम था। हमें जाते हुए देख कर लोगों को गुस्सा हद पर आ गया था। वे एक दूसरे से बढ़ बढ़ कर कड़वी बातें मुंह से निकाल रहे थे। और जब और कड़वी बात न सूझे तब लोग धक्के मुक्के या गोली पर भी आ सकते थे। हो सकता था कि हमें निकलता देख कर कुछ लोग बचीखुची चीजें उठाने के लिए घर में घुस गये हों और हमारे वापस जाने से डर जायें। डरा हुआ आदमी क्या नहीं कर सकता। पर अल्लारखा की पत्नी पर ये दलीलें कुछ असर नहीं कर रहीं थीं। उसका ध्यान किसी दूसरी और लगा हुआ था।
'वह गागर और बटलोई तो जरूर लानी है।' उसने अपनी बेटी की ओर फिर ट्रक में पड़े हुए थोड़े से सामान को देख कर कहा। वह अकेली वापस घर की ओर चल पड़ी। मैं भी पीछे गया क्योंकि मेरे साथ होने के कारण आसपास का लावा उबलने का खतरा कम होता था। अंदर जा कर उसने गागर बगल में दबा ली और बटलोई हाथ में लटका ली।
'इनको लेकर कहां कहां डोलती फिरोगी। कितने भारी तो है!' मैंने धीरे से झिड़की दी।
उठाने में भारी है तो क्या हुआ। मैं अपनी बेटी को दहेज में क्या दूंगी?'
वापस आते हुए उसके पैर धरती पर मजबूती से पड़ रहे थे और चाल मजबूत थी। उसकी दृढ़ता का प्रभाव सभी पर पड़ रहा था। ट्रक में आ कर उसने बेटी को गोद में उठा लिया और ट्रक पर बैठ कर उसने एक लात गागर पर और एक बटलोई पर पसार दी।

(अनुवाद : घनश्याम रंजन)

 
 
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