कमलेश्वर
Kamleshwar
 Hindi Kavita 

Subah Ka Sapna Kamleshwar

सुबह का सपना कमलेश्वर

बात असल में यों हुई। उन दिनों शहर में प्रदर्शनी चल रही थी। जाने की कभी तबीयत न हुई। आखिर एक दिन मेरे मित्र मुझे घर से पकड़ ले गए। शायद आखिरी दिन था उसका। चला गया, पर ऐसे जमघटों में अब मन नहीं जमता। वही चिर पहचाने चेहरे ...वही मस्ती और दिखावटी लापरवाही, जो नुमायश में घूमते वक़्त लोगों पर आ जाती है। उसे खूब देख चुका हूँ; देखते-देखते अभ्यस्त हो गया हूँ। सब कुछ साधारण हो गया है। इस नुमायशी जिन्दगी में कोई उतार चढ़ाव नहीं दीखता, सो जाकर सीधा एक पुस्तक-भण्डार पर खड़ा हो गया। मित्र कुछ अँगरेजी की पुस्तकें उलटने-पलटने लगे। मैंने सामने रखी एक पत्रिका उठा ली, उसे खोलने ही जा रहा था कि मित्र ने फुसफुसाकर कहा, “वाह-वाह, क्‍या चीज़ है!”

मैंने उनकी पसन्द-भरी आँखों की ओर देखा, तो जैसे पानी को दिशा मिल जाती है, वैसे ही मेरी दृष्टि अनायास उधर घूम गई, जिधर वह देख रहा था। यह एक कलेण्डर था, जिसमें दो स्वस्थ बच्चे, रुई सा सफेद कबतूर पकड़े थे। मन आपसे-आप खिल उठा। उन बच्चों की सारी मासूमियत और कोमलता जैसे हृदय में उतर गई। लगता था अभी यह लड़का अपने दोनों हाथों को झटका देकर कबूतर को आकाश की ओर छोड़ देगा। फिर दोनों-लड़का और लड़की-खिलखिला कर हँस उठेंगे। और तब इनकी आँखें और भी छोटी हो जाएँगी। गालों पर लाली दौड़ जाएगी। “वी लव पीस,” मित्र बड़बड़ाया। ध्यान भंग हो गया। तसवीर के नीचे दृष्टि रुकी। उन अक्षरों पर पड़ी जो मित्र ने पढ़े थे-“हमें शान्ति प्यारी है।' मेरा मन फिर भटक गया। शान्ति की बातें भी बहुत नई नहीं रह गई थीं। तस्वीर में एक अजीब-सी ताजगी जरूर थी।

मैंने जो पत्रिका उठाई थी, उसे देखने लगा। ऊपर किसी वनखण्ड का सुरम्य दृश्य छपा था। प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर। और पलटा, गदराई फसलों की झूमती हुई बालियों की तसवीरें थीं। फिर कुछ सुख-बिलास की वस्तुओं के चित्र और उनके विज्ञापन। आगे कुछ आलीशान इमारतों के फोटो और उसके बाद युद्धस्थल की भयंकर तस्वीरें ! बारूद के उठते हुए गुबार, चील की तरह उड़ते हुए हवाई जहाज, धराशायी इमारतें, उजड़े हुए खेत, जिनमें सैनिक संगीनें आगे किए फसल रौंदते बढ़े जा रहे थे। वे भी अच्छे नहीं लगे पत्रिका बन्द कर दी। अन्तिम कवर का दृश्य फिर सामने था-युद्ध का महाभयंकर दृश्य। तबीयत अकुला उठी। सैनिकों की लाशों के ढेर, कटे हुए हाथ और टाँगें ! धरती की सतह से पृष्ठभूमि में उठता हुआ धुएँ का समुद्र | जैसे धरती के नीचे दबे किसी सुप्त जवालामुखी ने मुँह खोल दिया हो, अभी धुआँ है फिर लावा बह निकलेगा और...और इस बची हुई कुचली-त्रस्त घास और कटे-पंगु शरीर को भी ढक लेगा !
मित्र ने कहा, “चलो।"
मैं चल दिया।

नुमायश से कुछ तो खरीदना चाहिए, इसीलिए उसने औरों की देखा-देखी एक बहुत बड़ा -गुब्बारा ख़रीदकर मेरे हाथ में थमा दिया था। मुझे हँसी आ गई कि क्या खरीदारी का दिखावा जरूरी था ? वह अपनी साइकिल पर चढ़कर चला गया। गुब्बारा मेरे पास ही रह गया।

टहलता हुआ घर पहुँचा तो रात काफी जा चुकी थी। विचारों का कोई मजबूत सिलसिला नहीं था। जब कुछ समझ में नहीं आया तो उस गुब्बारे को ही सीने पर रखकर उँगलियों से धीरे-धीरे बजाकर तुप...तुप की आवाज पैदा करता रहा। गुब्बारे से कुछ हलकी बदबू आ रही थी,
जैसे कोई विषैली गैस।

धीरे-धीरे मैं उस तुप...तुप की आवाज़ में डूबता गया। एक अजीब मधुर संगीत था उसमें । बस केवल संगीत रह गया--और मैंने देखा, एक टिन के खाली डिब्बे पर दो नन्‍हें-नन्‍हें हाथ थापें दे रहे थे। वह मेरे पड़ोस की बेबी थी। अपनी गुदारी हथेलियों से उस डिब्बे को बजा रही थी। अनोखा समाँ बाँध रखा था उसने। बड़ी मौज में बजाए जा रही थी, तभी रानी आकर उससे बोली, “बुलउआ तो दे आई।”
अपनी ढोलक बजाना छोड़ बेबी बोली, “तब तो मेहमान आते होंगे, मेरी गुड़िया नहायी भी नहीं।”
रानी बोली, “नहीं, पहले घर की सफाई कर लो!”

बेबी ने परेशानी दिखाते हुए कहा, “तुम्हें क्या, तुम लड़के वाली बन कर बैठ गई, हमें हज़ार काम हैं, लड़की का ब्याह है, घर की सफाई-दावत...सभी तो अकेले करना है।” और इतना कहकर चप्पल वाले दफ़्ती के डिब्बे से गुड़िया की साड़ी निकालने लगी। एक रेशमी कतरन दिखाते हुए बोली, “ये गुड़िया की बनारसी साड़ी, है, सितारेदार।”
“मैंने तो गुड्डे के कपड़े दिल्ली से मँगवाए हैं ।” रानी ने शान दिखाते हुए कहा।

“बहुत-कुछ,” बेबी डींग सुनकर बड़बड़ाई, “राधा अम्मा की गठरी में से चुराए हैं। हमने देखा था।” और बेबी ने रानी की तरफ मुँह बिचका दिया।

“हमने तो माँगे थे, तू चोट्टिन है, तूने राधा की पेन्सिल चुराई थी...चोट्टिन...चोट्टिन ।” रानी ने बेबी की पोल खोलते हुए ताली बजाकर कहा।

बेबी ने तैश में आकर रानी के कपड़ों का डिब्बा फेंक दिया, झल्लाकर बोली, “हम नहीं खेलते, तू चोर...गुड्डा चोर...गुड्डे के घर वाले चोर।”
रानी ने कपड़े बटोरते हुए समझदारी से कहा, “ऐसे हम नहीं खेलते।”

...फिर न जाने क्या, जैसे जल में पड़ती परछाइयाँ हिलकर मिट गई हों। कुछ हलचल। अजीब-सा शोर, जिसमें वे स्वर डूब गए थे, दृश्य धुंधले पड़ने लगे। कुहरा-सा छाने लगा। उस कूहरे के बीच से सिर्फ़ रानी का मुख दिखाई दिया। वह कह रही थी, “बेबी, खेलो न !”
“सच्ची-सच्ची बोलो तो खेलूँगी...हूँ...” बेबी ने उठाया हुआ सामान जमीन पर रखते हुए कहा।
“अच्छा भाई, सच्ची-सच्ची गुड्डे के कपड़े दिल्ली से नहीं, यहीं से ख़रीदे थे, बस !” रानी ने समझौता कर लिया।

दोनों दफ़्ती के बनाए घरों के पास बैठ गईं। एक दूसरे के सहारे खड़े थे दोनों के घर। बस, दोनों की सीमाएँ नीम की सींकें रखकर अलग कर ली गई थीं। रानी के घर की चौखट से लगा गुड्डा खड़ा था, पर बेबी की गुड़िया शरम के मारे घर के भीतर बैठी थी। दियलियों का बना तराजू एक ओर रखा था और पालकी मकान के पीछे पड़ी थी। रानी के घर के सामने टीन की मोटर बारात के लिए तैयार थी।

“बहू, जरा खाना देख लेतीं।” बेबी खुद बोली और स्वयं ही जवाब भी दे दिया, “अच्छा भाई आयी, फुरसत मिले तब तो, एक काम हो ।” फिर रानी के घर सब तैयारी देखकर बोली, “रानी, धीरे-धीरे करो भाई, तुम तो जल्दी मचाए हो।”
“अरे अभी बारात चल थोड़े ही रही है।” रानी ने कहा।
“हमने नहाया तक नहीं, चलो नहा लें।” बेबी ने कहा और थोड़ा खिसक कर बैठ गई।

दोनों नहाने लगीं। सिर पर हाथ ले जाकर गुदगुदी-सी बाँह मुड़ी और कलाई मुड़ते ही मुट्ठी से पानी गिर गया...शू...शू की आवाज़...और दोनों हाथ-पैर रगड़ने लगीं। नहाना ख़त्म हुआ तो कपड़े बदले। पैर तक दोनों हाथ गए, फिर कमर पर आकर हवा में गाँठ लगाई। कन्धे पर इधर-उधर हाथ चलाकर दुपट्टा डाला और दोनों तैयार हो गईं। अब रानी का गुड्डा तैयार था। बेबी की गुड़िया भी तैयार थी। पर बेबी खाना बनाने में लगी थी। मिट्टी की पूरी, कचौरी, लड्डू और बरफी।

रानी के घर बैण्ड बज उठा। रानी मुँह में कागज की तुरही लगाए आवाज करती जा रही थी। बीच-बीच में झूमती हुई बोलती, “कुड़म-कुडुम की झइयम-झइयम...” और बेबी भी अपने घर बैठी मुस्करा-मुस्करा कर दूल्हे के घर के बाजों की आवाज़ पर मटकती जा रही थी।

पर बाजों की आवाज एकदम तेज हो गई...गड़गड़ाहट में बदल गई...घोर गर्जन। विषैली-सी महक उड़ने लगी और धुएँ के गहरे बादल चारों तरफ उभरने लगे। हवाई जहाजों की गन्‍नाहट और भगदड़ का मिला-जुला शोर। दूर खड़ी फसलों को रौंदकर बढ़ते हुए खूँखार सिपाहियों के दस्ते...बरदीधारी...मारी बूट और बन्दूकों में लगी संगीनें। क्षण-भर में ही वे सारे सिपाही अपनी लाल-लाल आँखें चमकाते, नथुने फड़काते एकाकार हो गए। वह सिर्फ एक सैनिक था। दैत्य की तरह ! जमीन पर टैंकों की तरह बड़े-बड़े पैर गड़ाए आसमान तक की ऊँचाई में खड़ा था। उसकी आँखों में ज्वालामुखी थे, नथुनों से विषैले धुएँ के गुब्बार निकल रहे थे। फिर वह चला और आगे बढ़ते-बढ़ते उसका आकार छोटा होता गया, वह सादा-सा आदमी रह गया। अरे, यह तो जैकब साहब का लड़का था। वह कमर पर हाथ रखे बहुत तेज नजरों से इधर-उधर पेड़ की शाख्रों को देख रहा था। जिधर किसी पक्षी के उड़ने की सरसराहट सुनाई पड़ती, उधर ही उसकी नज़र घूम जाती। इस पेड़ से उस पेड़, जैसे कोई पक्षी खो गया हो। आखिर उसकी दृष्टि कोठी के रोशनदान और कार्निस की मेड़ के बीच बैठे एक जंगली कबूतर पर पड़ी। बहुत तेज नजरों से उसने उसे देखा। रानी और बेबी भी सकपकायी-सी उसे देख रही थीं। उसने अपनी चौड़ी पेटी को थोड़ा कमर पर कसा और कोठी के भीतर चला गया।

रानी ने एक सन्देह-भरी दृष्टि बेबी की ओर डाली। बेबी ने जैसे सब कुछ समझते हर चुपचाप ख़ामोश नजरों से उत्तर दे दिया। दोनों की दृष्टि कार्निस की मेड़ और रोशनदान बीच बैठे उस जंगली कबूतर पर टिक गई जो बैठा सुस्ता रहा धा-सिलेटी-सा नरम पंखदार पक्षी, रेशम-से पंख, सेमल की रुई-से नरम और चिकने। बेबी और रानी असमंजस-भरी दृष्टि से ताकती रहीं। वह कबूतर आँखें बन्द कर लेता तो ज्वार के दाने की तरह सफेदी चमक उठतीं।

दोनों ने उधर ताका जिधर कोठी में वह आदमी घुस गया था। वहाँ कोई नहीं था। उन्होंने फिर अपना खेल शुरू कर दिया। रानी ने टीन की कार में गुड्डे को बैठाया। घुर्र-घुर्र की आवाज के बाद कार चल पड़ी। बेबी और रानी दोनों, मुँह से कागज की फुकनियाँ बजा रही थीं। इधर-उधर घुमाकर कार गुड़िया के दरवाज़े पर खड़ी कर दी गई। रौनक छा गई। फूल बरसाए गए। बाजे बजे। आखिर नीशा को कार से उतारकर लड़की के दरवाजे पर बिछी दियासलाई की खाट पर बैठा दिया गया। क्षण-भर में भाँवरें पड़ीं। ढोलक बजी। रानी ने जल्दी मचाई। बोली, “भाई जल्दी करो, नहीं तो गाड़ी छूट जाएगी।”

बेबी बनारसी साड़ी तह कर रही थी। पालकी बाहर आ गई। रानी ने उस पर रेशमी ओढ़नी डाल दी। काफी फुरती से तैयारी हो रही थी। दूल्हा बाहर दियासलाई के पलंग पर दीवार से टेक लगाए खड़ा था।
तभी उधर बूटों की आवाज हुई। आहट सुनकर रानी सतर्क हो गई। उन्होंने कबूतर की तरफ देखा। रानी बोली, “ढेला मार दो।”

“हाँ-हाँ, मार दो, जल्दी से,” बेबी ने खड़े होते हुए फुरती से कहा, “बहुत जल्दी, जल्दी...” और रानी ने अपनी बाँह पीछे करके एक ढेला कबूतर की तरफ फेंका। जैकब साहब का लड़का निशाना लगा रहा था। वह कंकड़ रोशनदान की लकड़ी पर भट्‌ से लगा। कबूतर ने गरदन घुमाई और हलकी सरसराहट के साथ उड़ चला।

रानी और बेबी कूदती हुई तालियाँ बजा-बजाकर शोर मचा रही थीं, “कित्ता अच्छा हुआ...हो...हो ।” उनकी तालियों में अजीब-सा संगीत था। उनके थिरकते पैरों में अनोखी लय थी।

इधर जैकब साहब का लड़का आग्नेय नेत्रों से इनको ताक रहा था। गुस्से से उसकी आँखों में आग-सी दहक उठी, नथुने फूल उठे। उसने जलती आँखों से दोनों को देखा। वे हँस रही थीं। शोर मचा रही थीं। तालियाँ पीटे जा रही थीं। खामोश करने के लिए उसने अपनी राइफिल से उधर ऊपर की ओर हवाई फायर कर दिया। रानी और बेबी सहमीं, दोनों ने एक दूसरे की बाँहें भींच लीं तो जैसे साहस आ गया, अपार साहस !

धड़ाके की गूँज हुई और सब-कुछ बदल गया। जैकब का लड़का खो गया था। एक क्षण को वही राक्षसी रूप उभरा...धुएँ के बादल उमड़े और सब शान्त हो गया...चारों ओर से हँसी की हल्की खिलखिलाहट की आवाज आ रही थी।
मेरी साँस की रफ़्तार बहुत तेज़ हो गई थी। नाक में विषैली गैस की महक भर रही थी।

क्षण-भर बाद ही चौंककर मेरी आँखें खुल गईं। देखा, वह बड़ा-सा गुब्बारा फूट गया था, उसकी खाल मेरे पंजे में थी और उसमें से बदबू आ रही थी। मुस्करा कर रह गया। सुबह काफी निखर आई थी।
“हाइड्रोजन बम पर प्रतिबन्ध की माँग! आज की ताजा ख़बर !”
चीख़ता हुआ अख़बार वाला नीचे सड़क से गुजर रहा था !

(मैनपुरी, 1948)

 
 
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