Pagal: Swapnil Srivastava Ishoo

पागल: स्वप्निल श्रीवास्तव (ईशू)

पागल (पार्ट 1): एंग्री यंग मैन

बड़े कॉलर की शर्ट और बेलबॉटम पतलून, उम्र अठ्ठाईस, हाईट पांच फुट तीन इंच और चेहरे पर अस्सी के अमिताभ वाला एंग्री यंग मैन लुक। समय का इतना पक्का की, नीली शर्ट- काली पैंट में देख लो तो समय मिला लो। पास की ही सोसाइटी में वाचमैनी करता था संतोष। सिर्फ अपने काम से काम, समय पर ड्यूटी फिर अपने घर। परिवार कहाँ था किसी को पता नहीं, जब से देखा इसी मोहल्ले में, पहचानते सभी थे पर बोलता किसी से नहीं था। संतोष गूंगा नहीं था बस बातें सिर्फ जानवरों से करता था, अपनों के नाम पर जानवर ही तो थे। मोहल्ले के हर कुत्ते को नाम से जानता था और कुत्ते उसे। जितना कमाता सब खर्च देता था, सीधा सा उसूल था, जो आएगा सब खायेंगे। कुत्ते भी ऐसे की बिना शर्त चाहते थे उसे….जानवर मतलबी जो नहीं होते।

संतोष की दुनिया यही थी, सुबह खाना बनाना, टिफिन रखना, कुत्तों को खिलाना और फिर चौकीदारी। नाम भले संतोष था पर अक्सर चाय की दुकानों पर गपियाने वाले उसे पागल- पागल कहते थे। करें भी क्या, न इंसान की परख थी, न जानवरों की, दिन भर हवाबाजी।

हर रोज़ की तरह आज भी संतोष आसमानी शर्ट और काली पतलून पहने पैडल मारता जा रहा था, तभी दो कुत्ते लड़ पड़े, लड़ाई भी ऐसी कि साइकिल से भिड़ते- भिड़ते बचे। फिर क्या था, संतोष ने ब्रेक लगाई, साईकिल के डंडे पर उतरा और लगा गरियाने, “सुबह-सुबह काहे लड़ रहे हो, कोई काम नहीं है क्या, अगर उतर गया तो सारी हेकड़ी निकाल दूंगा। चलो चुप मार के निकलो यहाँ से, दोबारा लड़ते देख लिया तो…..” फिर मन ही मन भुनभुनाया, “साले, खुद तो बिगड़ेंगें, मोहल्ले के चार को और बिगाड़ेंगे।” कुत्ते भी ऐसे की मानों, बच्चों की तरह मास्टर साहब की डांट सुन रहे हों।

उधर दूर चाय की दुकान पर बैठे लोग ये तमाशा देख मुस्कुरा रहे थे, तभी रामसुमेर चिल्ला कर बोला, “का बे पगलवा, का बड़बड़ा रहा है? आ जा चाय पिलाते है।” संतोष सुन ज़रूर रहा था पर पलटा नहीं, सीधे सीट पर बैठा और चल दिया ड्यूटी। सोसाइटी पंहुचा, साइकिल लगाई और गार्डरूम में काम संभाल लिया। नवजीवन सोसाइटी थी तो पुरानी पर मैनेज अच्छी कर रखी थी। संतोष भी पिछले तीन साल से यही ड्यूटी दे रहा था। रजिस्टर में आने जाने वालों का नाम लिखना, गाड़ियों के लिए गेट खोलना और कभी – कभी सेक्रेट्री साहब की गाड़ी धो देना, यही काम था उसका। इसके अलावा न कभी मुस्कुराता था, न किसी से बोलता था।

सोसाइटी में बच्चे तो थे पर संतोष से खासी पटती न थी, कुछ अनकही सी हनक दोनों तरफ से थी। बच्चे तो कभी कभी बॉल के लिए परेशान करते थे, पर संतोष बोलता फिर भी कुछ नहीं था। हाँ जानवरों को अगर छेड़ते देख ले तो ज़रूर डांट देता था। दो तीन शिकायतें तो सोसाइटी मीटिंग में पहले हो रखी थीं।

दोपहर केबिन में बैठा अपना खाना खा ही रहा था की टेलीफ़ोन की घंटी बजी, उठ कर देखा तो सेक्रेटरी सर का फोन था, बोले, “शाम को ड्यूटी ख़तम कर जाने से पहले घर आ जा, कुछ बात करनी है।” संतोष ने शांत भाव से जी हाँ, बोल कर फोन रख दिया, फिर अपने काम में लग गया। देखते ही देखते सात बज गए, दूसरी शिफ्ट के चौकीदार के मोर्चा सँभालने का वक़्त हो गया था। संतोष ने साइकिल झाड़ी, टिफिन लटकाया और मनोहर का इंतज़ार करने लगा, आते ही चाभी थमाई, रजिस्टर पकड़ाया और बढ़ गया सिन्हा जी के घर की ओर। सिन्हा जी तीसरी मंजिल पर रहते थे, सीढियों से होता हुआ दरवाज़े पर पंहुचा और घंटी बजा दी। सिन्हा जी बाहर आये और बोले, “आ जा अन्दर कुछ बात करनी है…..” संतोष भी चुपचाप अन्दर आया और सर झुकाए सोफे के साथ खड़ा हो गया।”
सिन्हा जी सोफे पर पसरते हुए बोले, “संतोष, शिकायतें बड़ी आ रही हैं, चिराग और मयंक के भी मम्मी-पापा बोल कर गए है…., इस बार तो लिखित में शिकायत दी है…..क्यों बच्चों को बेवज़ह डांटता है। अब और शिकायत आई तो नौकरी चली जाएगी।”

संतोष बोला कुछ नहीं बस सर झुका कर सुनता रहा। बताता भी क्या, बच्चे, कुत्ते और पिल्लों को परेशान कर रहे थे सो डांट दिया…..। अपनी बात रखता भी तो सुनवाई कोई न थी, जिस समाज में आदमी, आदमी की कदर न करता हो वहां जानवरों का दर्द कौन समझेगा भला। चुपचाप घर को आ गया।

रोज रात की तरह खाना खाने के बाद बाहर नीम के चबूतरे पर बैठ गया, आहट पाकर मोहल्ले के कुत्ते भी जमा हो गए, कोई पैर पर चढ़ रहा था तो कोई कंधे पर, एक वही तो था जो बिना किसी स्वार्थ के उन्हें अपना समझता था। जानवर भी यह अच्छे से जानते थे। पूरे दिन में ये दूसरा मौका था जब संतोष के मुहं से बोल फूटें हों….दिन भर की कहानी ऐसे बता रहा था मानों दोस्तों में बैठा हो, हाव-भाव दिन भर से बिलकुल अलग, कुत्ते भी ऐसे सुन रहे थे मानों सब समझ रहे हों। संतोष बोला, “सोसाइटी वाली रूबी को बिलकुल परेशान कर रखा है लड़कों ने, बेचारी ज़रा देर बच्चों को छोड़ कर निकले, सब चले आएंगे। कोई कान खींचेगा तो कोई टांग। बेचारे छोटे छोटे पिल्लों को न सुबह चैन न शाम, ऊपर से ज़रा डांट दो तो सीधा साहब से शिकायत….मैं भी देखता हूँ, मेरे रहते कौन परेशान करता है।” काफी देर तक यूं ही बड़बड़ाता रहा फिर उठा, कुत्तों के सर पर हाथ फेरा और चल दिया सोने।

पागल (पार्ट 2): रखवाला

समय बीतता चला गया, संतोष ने भी बच्चों को टोकना बंद कर दिया था, पर पूरा ध्यान रखता कि रूबी और उसके पिल्लों के आस-पास कोई न जाए। पिल्ले भी अब थोड़े बड़े होने लगे थे पर संतोष के अलावा और किसी इंसान से घुलते मिलते न थे।

दिवाली आने वाली थी, चलते फिरते पटाखों की आवाज़ सुनाई देने लगी थी। बच्चों का क्या है, जहाँ चार दोस्त इकठ्ठा हुए, पटाखा निकाला और फोड़ दिया। लोगों को परेशान करने में मानों मज़ा आता हो। खैर बचपन में तो सभी शरारत करते हैं पर चिराग और मयंक तो अलग ही थे, एकदम हाथ से निकले बिगड़ैल बच्चे। माँ-बाप ने भी मानों सर पर चढ़ा रखा हो। दोस्तों में वर्चस्व दिखाने की होड़ में कभी इंसानों को परेशान करते तो कभी जानवरों को। मोहल्ले से ले कर स्कूल तक सभी को पता था कि बच्चे शैतान हैं।

रूबी भी परेशान थी, उसके और बच्चों के तो खासे दुश्मन थे दोनों। बेचारी खाने की मजबूरी में सोसाइटी में टिकी थी। उस दिन तो एक पिल्ले को कान से उठा लिया था और दो की टांग एक साथ बांध दी, जब बचने को चिल्लाए तभी तो संतोष ने डांटा था और बात बढ़ गयी थी।

संतोष अभी सोसाइटी पहुंचा ही था, साइकिल लगाने के बाद जैसे ही गार्ड-रूम की ओर बढ़ा तभी ज़ोरदार लड़ियों की आवाज़ शुरू हो गई, लड़ियों के साथ- साथ रूबी और पिल्लों की दर्द भरी चीख़ भी। संतोष भागते हुए पंहुचा, देखा तो सकते में आ गया, किसी ने रूबी की पूँछ में पटाखों की लड़ी बाँध दी थी, बेचारी बेतहाशा भाग रही थी। संतोष ने जलती लड़ी को हाथ से ही बुझा दिया। हाथ तो जला पर गुस्से की आग में मानों ये जलन कही दब सी गयी थी। एक पल को तो चाहा कि यही लड़ी चिराग और मयंक को बांध कर तमाशा देखे और दुनिया को भी दिखाए, पर मन ही मन कुछ सोच कर चुप रह गया। अभी-अभी तो सिन्हा जी ने बुला कर डांटा था, कुछ बोल दिया तो नौकरी गयी, और नौकरी नहीं तो पैसा नहीं, फिर इन मासूमों को खाना कौन खिलायेगा।

पिल्ले तो सदमे में थे पर रूबी को कुछ चोटें आई थी, पटाखों की चिंगारियों से पूँछ और टांग थोड़ी जल सी गयी थी। जानवर को देखिए नेक इंसानों की पहचान इंसान से बेहतर कर लेते हैं। एक ओर इंसान ने ही ज़ख्म दिया था फिर भी संतोष के ही आस- पास घूम रही थी, मानों उम्मीद थी कि यही मदद करेगा। संतोष ने भरोसा टूटने न दिया, पहले नलके से पानी ला कर जख्म धोए फिर गार्ड रूम के फर्स्टऐड बॉक्स से दवाई ला कर लगा दी। दर्द तो था पर मज़ाल है रूबी ने एक आवाज़ की हो, इतना भरोसा था उसे संतोष पर। पिल्ले भी अब थोड़ा शांत लग रहे थे, पर चेहरे पर डर अब भी बना था।

उस दिन गुस्से में संतोष ने खाना भी नहीं खाया, बस हर आधे घंटे में जाता और देख कर लौट आता, सारा खाना उसने पिल्लों और रूबी को डाल दिया था। शाम ड्यूटी ख़त्म कर सीधे रुबी के पास पहुँच गया, पालथी मार कर बैठ गया और दूध का पैकेट फाड़ कर पिल्लों को डाल दिया। रूबी भी संतोष को ऐसे देख रही थी मानों किसी अपने को, पर आँखों में सवाल बहुत से थे….,हम मासूम ही क्यों? हमने किसी का क्या बिगाड़ा था? पिल्लों की खातिर ही तो इंसानों में शरण ली थी, ऐसा क्यों किया?

संतोष रूबी को देख रहा था मानों हर सवाल समझ रहा हो, धीरे से बोला, “ये सब पागल हैं, एक दूसरे के सगे तो होते नहीं, तुम्हारे क्या होंगे….तू परेशान मत हो, मैं हूँ….सब ठीक कर दूंगा।” रूबी ने हल्की सी पूँछ हिलाई और बगल में आ कर कंधे से सर सटा दिया। संतोष चुपचाप बैठा सोसाइटी के बोर्ड को देख रहा था, फिर दो बार सर हिलाया और उठ खड़ा हुआ। चेहरे का भाव, शरीर की सहजता और मन में फूट रहे ज्वालामुखी से संतोष अलग ही दिख रहा था। आज उसके अन्दर जो आग थी उसका अहसास खुद उसे भी नहीं था, अहसास था तो सिर्फ रूबी को, संतोष में उसे एक रखवाला नज़र आ रहा था।

पागल (पार्ट 3): बदला

चारों तरफ रौनक दिख रही थी, सुबह से ही सड़कों पर सफाई चल रही थी, त्योहारों के दिनों में फिज़ा की खुशबू ही कुछ और होती है। संतोष नहा-धो कर तैयार हुआ, यूनिफार्म पहनी, साइकिल उठाई और चल दिया ड्यूटी। चेहरा ऐसा मानों किसी बड़े काम को अंजाम देने जा रहा हो, बदले की आग ने उसे और भी तपा दिया था। सोसाइटी पहुंच कर सीधे सिन्हा जी के घर गया और घंटी बजा दी। त्यौहार था तो सभी घर पर थे, सिन्हा जी बोले, “हाँ संतोष बोल!” संतोष धीमी आव़ाज में बोला, “नमस्ते सर, दिवाली मुबारक…आप से कुछ काम था!” सिन्हा जी बोले, “नमस्ते-नमस्ते, तुमको भी दीपावली की शुभकामना! बताओ भाई क्या बात है?” संतोष बोला, “सर, कुछ एडवांस चाहिए…” सिन्हा जी दिखते सख्त थे, पर उसूलों के पक्के थे, जानते थे तीज-त्यौहार में हर किसी को पैसे की ज़रुरत होती है, बोले, “अच्छी बात है…बोलो कितने दूं…हज़ार में काम चल जाएगा?” संतोष बोला कुछ नहीं, बस हां में सर हिला दिया। सिन्हा जी अन्दर से लौटे और पांच सौ के दो नोट पकड़ा दिए। संतोष बोला, “सर, एक दो घंटे की छुट्टी चाहिए।” सिन्हा जी त्यौहार के मूड में थे सो बोले, “ठीक है, पर गेट पर किसी को बोल जा, त्यौहार का दिन है लोगों का आना जाना लगा रहेगा।” धीरे से संतोष ने सर हिलाया, नमस्ते किया और चल दिया। पीछे से सिन्हा जी की पत्नी बोलीं, “ज़बरदस्ती सब पागल-पागल बोलते है, सीधा साधा लड़का है, बस बोलता कम है….” सिन्हा जी मुस्कुराये और बोले, “अरे पागल तो बोलेंगे ही ना….इंसानों से बात करता नहीं, बस कुत्तें-बिल्लियों से बतियाता रहता है।”

संतोष नीचे पंहुचा, साइकिल उठाई और मनोहर से बोला, “ज़रा गेट देख लेना, कुछ काम है एक दो घंटे में वापस आ जाऊंगा।” मनोहर अपनी पत्नी के साथ सोसाइटी के आउट-हाउस में ही रहता था, दिन में लोगों के कपड़े प्रेस करता और रात में चौकीदारी। मनोहर हँसते हुए बोला, “का रे पगला, सुबह-सुबह कहाँ? ज़ल्दी आ जाना, सब कपड़ा प्रेस को पड़ा है वरना सब भड़के गा।” संतोष ने पैडल मारा और बढ़ा दी साइकिल परेड ग्राउंड की ओर, आज कल पटाखों की दुकानें ऐसी ही जगहों पर लगती हैं, वैसे सुरक्षा के दृष्टीकोण से सही भी है।

हाथ पीछे बांधे कुछ देर तक दुकानों का मुआयना करता रहा फिर एक दुकान पर रुका और बोला, “वो बड़ा वाला रॉकेट कितने का है?” दुकानदार बोला, “ले लो बहुत बढ़िया है, आसमान तक जाता है फिर धमाके के साथ फटता भी है।” संतोष के चेहरे पर अजीब से मुस्कान आई, न जाने क्या सोच रहा था…फिर बोला, “दो रॉकेट दे दो, और वो सबसे बड़ी वाली लड़ी भी।” न दाम कम कराये, न पीछे मुड़ कर देखा, सीधे क़दमों से चलता हुआ साइकिल तक पंहुचा, थैली टांगी और चल पड़ा वापस सोसाइटी की ओर। रास्ते से दवाई, पट्टी, दूध और मिठाई भी खरीद ली थी।

लंच का समय हो चुका था, पहले दूध ले कर रूबी और पिल्लों के पास गया फिर वहीँ टिफिन खोल कर बैठ गया, न जाने ऐसा लग रहा था मानो आश्वासन दे रहा हो।

त्यौहार का दिन था सो चहल पहल दिन भर थी, गेट खोलते- बंद करते कब शाम हो गयी पता ही न चला। पूरी सोसाइटी जगमगा रही थी, इस त्यौहार की रौनक अलग ही होती है। देखते ही देखते घरों से शंख और घंटियों की आवाज़ आने लगी, हर परिवार अपनी बालकनी में दिए और मोमबत्ती लगा रहा था। कुछ ही देर बीती थी कि धमाके शुरू हो गए, पूरा शहर ऐसे गूँज रहा था मानों लड़ाई छिड़ गयी हो। थोड़ी देर और बीती कि मिठाई देने दिलाने का सिलसिला शुरू और फिर साथ मिल कर पटाखे फोड़ने का। कोई फुलझड़ी जला रहा था, कोई अनार तो कोई पटाखों की लड़ी, न जाने किस बात की होड़ थी, पूरा इलाका धुआं-धुआं हो गया था, बारूद की गंध का नशा सा हो मानों। खैर बड़े बड़े देशों के असलहे ख़तम हो जाते है, यहाँ तो हज़ार- दो हज़ार के पटाखे थे, कब तक फूटते, ख़तम तो होना ही था। देखते ही देखते आवाज़े कम होने लगीं साथ ही गंध भी। अब समय था अपने अपने घर जाने का और पूरी-पकवान खाने का। अचानक से ही पूरे शहर में सन्नाटा सा हो गया, इक्का दुक्का छोड़ कर पटाखों की आवाज़ ख़तम सी हो गयी थी।

मनोहर भी परिवार के साथ दिवाली मना कर गेट पर आ गया था, बोला, “का रे पगला, दिवाली न मनाओगे का? जाओ घर, अब हम देख लेंगे।” संतोष कुछ न बोला, बस थैली उठाई और चल दिया। सीधा पंहुचा रूबी के पास, सर पर हाथ फेरा और अपने साथ ले जाने लगा। यूँ तो पटाखों की आवाज़ से सभी दुबके पड़े थे पर संतोष बुलाए और रूबी न सुने….., रूबी बढ़ी तो साथ साथ पिल्ले भी चल पड़े, सीधा पहुंचे असेम्बली एरिया में जहाँ से ‘ए’ और ‘बी’ विंग की बालकनी दिखती थीं। चिराग और मयंक के घर भी तो ‘बी’ विंग में थे….न जाने संतोष ने क्या सोच रखा था।

पहले तो अखबार पर मिठाई रखी फिर रूबी और पिल्लों को बुलाया, थैली से दो कांच की बोतलें निकाली और उनका मुंह कर दिया चिराग और मयंक की बालकनी की ओर। फिर भाग कर गया और मयंक और चिराग की साइकिल उठा लाया और चारो ओर लड़ी लपेट दी।

मिठाई का एक टुकड़ा अपने मुंह में डालते हुए बोला, “दिवाली मुबारक!!” न जाने क्यों चेहरे पर अजीब सी मुस्कान थी। अचानक से दो ज़ोरदार धमाके हुए, एक चिराग की बालकनी में दूसरा मयंक की, अभी कोई कुछ समझ पाता की लड़ियों की आवाज़ पूरी सोसाइटी में गूंजने लगी। देखते ही देखते लोग बालकनियों में आ गए थे, उधर चिराग के परदे में आग लग गयी थी बड़ी मुश्किल से आग बुझाई और सभी बाहर आये। बाहर का नज़ारा तो अलग ही था, लड़ियाँ ही लड़ियाँ और बीच में दो साइकिल, कुछ ही दूर संतोष बैठा चिराग और मयंक की बालकनी को देख रहा था और मुस्कुरा रहा था।

लोगों को समझते देर न लगी, थोड़ी ही देर में भीड़ लग गयी और कुछ ने तो हाथ भी उठा दिया, चिराग के पापा ने पी.सी.आर फोन कर दिया था सो कुछ ही देर में पुलिस भी आ गयी, दो तीन थप्पड़ हवालदार ने भी जड़े और ले जाने लगे जीप में बैठाने। संतोष सिर्फ मुस्कुरा रहा था, कभी चिराग और मयंक को देखता तो कभी रूबी और पिल्लों को। उस दिन के बाद से संतोष को उस मोहल्ले में किसी ने नहीं देखा था। दुनिया की नज़र में वो पागल था पर रूबी जानती थी, उस दिन उसने क्या किया था। आज भी जानवरों को इंसानियत पर भरोसा है तो सिर्फ संतोष जैसे लोगों की वज़ह से।

 
 
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