Paduka Poojan : Pratibha Roy (Oriya Story)

पादुका पूजन : प्रतिभा राय (उड़िया कहानी)

राम जैसा पितृभक्त कौन है, लक्ष्मण-भरत जैसा भ्रातृभक्त और कौन जनमा है अभी तक! पादुका पूजन में भरत से आगे निकल जाए- ऐसा आदमी नहीं है इस दुनिया में। विधानबाबू के घर पादुका पूजन देख कोई ऐसा सोचता है तो कोई हँसता है। सोचते हैं, यह सब दिखावटी भक्ति है। पादुका पूजन, वह भी पिता का नहीं, ना ही माँ का, बल्कि पिता के छोटे भाई और विधानबाबू के चाचा का। माँ-बाप की पादुका की बात छोड़ो, उनकी तो कोई तस्वीर तक नहीं है विधानबाबू के घर पर, पर चाचा की पादुका की पूजा हो रही है।

उन दिनों फोटो नहीं खींची जाती थी, भला यह कैसे कहा जा सकता है? बात है ही कितनी पुरानी? विधानबाबू का बचपन, अभी तीस-पैंतीस साल पहले की ही तो बात है। तब तक शहर के लोगों में तस्वीर मढ़वा कर टाँगने का फैशन आ चुका था। लेकिन निपट गाँव में रहने वालों के घरों की दीवारों पर ज़िंदा लोगों के फ़ोटो खिंचवा कर दीवार पर टाँगते नहीं देखा गया था। भगवान की तसवीर छोड़ इंसान की तसवीर दीवार पर टाँग कर रोज़ दर्शन करना- भला कोई ऐसा अनर्थ करेगा? एकाध लोगों की तसवीर और भगवान की तसवीरें टाँगी जातीं ज़मींदार साहूकारों की दीवारों पर। फूल माला पहना धूपबत्ती जलाई जाती थी मरे लोगों की तसवीरों के सामने। इसलिए विधानबाबू के पिता, माता, चाचा, चाची किसी की कोई तसवीर नहीं। उनके चेहरे सब मर-खप चुके।

सिर्फ़ स्मृति-पटल पर जितना कुछ बचा है, उतना ही। आज विधानबाबू के घर में फ़ोटो खींचने का फ़ैशन दिन-प्रतिदिन इस क़दर बढ़ता जा रहा है कि खाना खा कर हाथ धोते समय की भी फोटो खींची जाती है। विधानबाबू को इस बात का अफ़सोस था कि माँ, बाप, चाचा, चाची की कोई फ़ोटो वे नहीं रख पाए। लेकिन सिर्फ़ चाचा की चमड़े की दो चप्पलें पूजा की चौकी पर रख कर पूजने की वजह क्या है?

विधानबाबू के घर का पादुका पूजन बंधु-बांधवों के बीच चर्चा का विषय बन गया था। इस का मतलब यह नहीं कि विधानबाबू चाचा के प्रति अपनी भक्ति का प्रचार कर रहे थे। बल्कि विधानबाबू ने अपने शयन कक्ष के एक कोने में रखी चौकी पर मखमल का एक लाल कपड़ा बिछा कर उस पर चमड़े की दो पुरानी चप्पलें रखी हुई है। उन पर चंदन के छींटे सूख चुके हैं। हर साल चाचा का श्रीबदन चंदन और धूप से पूजते हैं।

जो लोग विधानबाबू के निकटतम बंधु-बांधव हैं, उन्होंने विधानबाबू में महज़ पितृपुरुष के प्रति अगाध भक्ति का ही नमूना पादुका पूजन में नहीं देखा- करुणा का एक विचित्र रूप भी देखा है। कोई कुछ मदद माँगने आता तो पहले वह उसके पेट-पीठ की ओर न देख उसके पैरों को देखते हैं। एक लंबी साँस छोड़ते हैं। कुछ मदद करें या न करें पूछते हैं- ''तुम्हें एक जोड़ी चप्पल चाहिए क्या? मेरी चप्पल लोगे? या फिर, रुपए देता हूँ, एक जोड़ी चप्पल ख़रीद कर पहन लेना। देखो तुम्हारे पैर कितने चलते हैं। बहुत तकलीफ़ होती होगी गर्मियों में- गर्म रेत पर, पक्की सड़कों पर।

रोगी, भिखारी, गरीब छात्र और मदद माँगने के लिए आने वालों तथा वयस्क अभावग्रस्त रिश्तेदारों को उन्होंने नई चप्पलें ख़रीद कर दी हैं। पूछन पर कहते, ''सिर्फ़ अन्नदान या वस्त्रदान ही पुण्य कार्य नहीं है, गर्मियों में, जाड़ों में पादुका दान करना महान पुण्य है। मेरे बचपन में चाचा ने एक बार कहा था...।''

चाचा पिताजी की तरह बुद्धिमान और कॅमेरे नहीं थे। जिस काम में भी हाथ डालते वह डूब जाता। पिताजी का काफ़ी पैसा डूब गया चाचा के हाथों। क्रमशः चाचा निकम्मे साबित हुए। चाचा का काम था खेती-बाड़ी सँभालना। संयुक्त परिवार था। कोई एक निकम्मा हो भी जाए तो भूखा नहीं रहता था। किंतु विधान ने चाचा को कभी निकम्मा नहीं समझा। चाचा जितना काम करते हैं, संभवतः घर में उतना काम और कोई नहीं करता। चाची के ज़िम्मे चूल्हा-चौका है। उनके जीवन का सारा समय बीत गया रसोई घर में। खा-पी कर चौका-बर्तन समेटते-समेटते आधी रात हो जाती है। चाची की कमर जकड़ जाती। सुबह उठ नहीं पातीं। विधान ने कितनी बार देखा है चाचा को चाची के पैर दबाते, घुटनों पर मलहम मलते। कहते हैं वह सब जोरू के गुलाम का काम है। लेकिन विधान जानता है कि चाचा जोरू के गुलाम नहीं हैं। ऐसा हुआ होता तो इतने बड़े संयुक्त परिवार की नींव डोल गई होती। चाची की तबीयत का ध्यान चाचा नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा। चाची सारा काम निपटा कर माँ के पैर दबा देती। चाची छोटी बहू जो ठहरी।

चाची सुबह जल्दी नहीं उठ पातीं, इसलिए चाचा सुबह से चूल्हे के पास जा कर एक पतीला चाय चढ़ा लेते हैं। घर के सभी लोगों, यहाँ तक कि नौकर-चाकर सब को चाय देते। उस के बाद बच्चों का नाश्ता। सूजी, साबूदाने की खीर तथा औरतों के पखाल (पानी मिला भात) खाने को सब्ज़ी या भुँजड़ी बनाते हैं। चाची कमर दर्द के कारण देर से नहाती हैं। बिना नहाए-धोए रसोई में कैसे जाएँगी? चाचा निकम्मे कहलाने पर भी पुरुष हैं। वे बिना नहाए-धोए रसोई में घुस सकते हैं, सब्ज़ी-भुँजड़ी बना सकते हैं। शादी-विवाह, पर्व-त्योहार के समय चाचा दिन-रात बैठे खाजा, मालपुआ, बूँदी बनाते हैं। इस काम में वे दक्ष हैं। चाची भी चाचा की तरह इतने स्वादिष्ट व्यंजन नहीं बना पाती।

चाचा पूरी दुपहरी खेती-बाड़ी का काम देखते हैं। शाम के वक़्त बच्चों को इकट्ठे करके कहानी सुनाते हैं, ताकि खाना बनने से पहले कोई ऊँघने न लगे। इन सबके अलावा, बंधु-बांधवों की आवभगत, ठाकुर बाड़ी सँभालना भी चाचा का ही काम है। गाय-बैल को समय पर पानी पिलाना, सानी करना, गोबाड़ा ठीक से साफ़ हुआ है या नहीं देखना चाचा का ही काम है। सभी दूध, दही, घी खाते हैं। पर गोबाड़ा-दुआर कोई नहीं देखता। तलैया साफ़ करवाना, नारियल के पेड़ झड़वाना, किस से क्या लेन-देन करना है सब आसानी से करते हैं चाचा। लेकिन ये सब काम पुरुष के लिए काम में नहीं गिने जाते। जिस काम से दो पैसे न मिले उसे भला काम में कौन गिनता है।

चाचा बच्चों को खूब चाहते थे। मंदिर पर कबूतर बैठने की तरह बच्चे चाचा के कंधे, पीठ पर चढ़े रहते। दो कंधों पर दो बच्चों को बिठाए चाचा को बाहर घूमते देखना रोज़ाना का दृश्य था। पीठ पर चीनी बोरा बनाए घूमेंगे बड़े बच्चों को, हालाँकि बच्चों में उन दिनों के विधान और आज के विधानबाबू थे चाचा के सब से प्रिय।

विधान बचपन से ही शांत और शिष्ट है। पढ़ाई में मन लगाता है। मास्टर जी की बेंत उस पर नहीं पड़ती। हर कक्षा में फर्स्ट। इसलिए विधान है चाचा के गले का हार। हमेशा विधान-विधान करते रहते हैं। पहले विधान फिर विराज। यदि पहले विराज को पूछते फिर विधान को तो लोग कहते चाचा ने पक्षपात किया है। पर विधान पहले विराज पीछे होने के कारण लोग चाचा को कहते देवता समान। अपने बेटे को पीछे करके भाई के बेटे को आगे रखा है। अपनी बदमाशी के लिए विराज को चाचा से अकसर डाँट पड़ती। विधान को हमेशा वाहवाही और शाबाशी। शायद इसीलिए विराज अधिक बदमाशी करने लगा। विराज दिन-प्रतिदिन बिगड़ता चला जा रहा है। उस के चेले बने हुए थे अन्य सभी भाई। विधान को माइनर कक्षा की छात्रवृत्ति परीक्षा देने के लिए पाँच मील दूर हरिपुर स्कूल जाना था, पर जाए कैसे? गाड़ी-मोटर नहीं चलती थी उन दिनों। चाचा को साइकिल चलानी नहीं आती थी। पिताजी को साइकिल चलानी आती थी पर कचहरी का काम छोड़ कर वे नहीं जा सकते।

चाचा ने कहा, ''कोई चिंता नहीं,विधान कमज़ोर है, चल नहीं सकता। मैं उसे कंधे पर बिठा कर ले जाऊँगा।'' केवल परीक्षा के दिनों में ही नहीं, बल्कि महीना भर पहले हरिपुर स्कूल के एक शिक्षक के पास छात्रवृत्ति परीक्षा के संभावित प्रश्न हल करने के लिए विधान को कंधे पर बिठा कर चाचा हरिपुर गए। गर्मियों के दिन, गर्म रेत, पैर जलते रहते थे। चाचा को ज़रूर कष्ट होता होगा, क्योंकि नंगे पैर है। चाचा चप्पल नहीं पहनते। पिताजी चप्पल पहनते हैं, क्योंकि वे कचहरी में काम करते हैं। खेती-बाड़ी का काम करने वाला भला कौन-सा गाँवली आदमी चप्पल पहनता था उन दिनों। यदि किसी ने पहनी होती तो लोग कहते फैशन दिखा रहा है। इसलिए चलते-चलते चाचा के पैरों में छाले पड़ जाने पर भी चाचा ने चप्पल पहनने की इच्छा नहीं दिखाई। चाचा के लिए एक जोड़ी चप्पल न ख़रीद पाने जैसी हालत नहीं थी घर की। किंतु किसी के दिमाग़ में यह बात घुसी ही नहीं। घुसती भी क्यों। चाचा तो कारोबार करने वाले कमाऊ आदमी नहीं थे। पाँच लोगों के बीच उठना-बैठना तो होता नहीं। फिर क्यों पहनते चप्पल?

विधान चाचा के कंधे पर बैठा था सिर पर छाता लगाए। दादा उचक-उचक कर चलते गर्म रेत पर। हरिपुर पहुँचने तक चाचा के पैरों की दुर्गति हो जाती। विधान की पढ़ाई ख़त्म होने तक चाचा स्कूल के चबूतरे पर बैठे थकान मिटाते। विधान के आने पर उसे बाज़ार में नाश्ता करवाते। खुद पीते चाय- कभी-कभार दो सूखे बड़े।

विधान को कंधे पर बिठा कर लौटते समय पूछते, ''कोई परेशानी तो नहीं है बेटे?''
''मुझे क्या परेशानी होगी? चल तो तुम रहे हो दिन में दस-बीस मील गर्म रेत पर। मैं तो मज़े से बैठा हूँ कंधे पर।''
''पर पढ़ाई तो तू ही कर रहा है। दिमाग़ खपाने में बहुत कष्ट है। भाई भी उसी तरह कचहरी में काम करते हैं दिमाग़ खपा कर। भला मेरा क्या काम? गया, आया, खाया, पिया, बस। दिमाग़ गर्म होने जैसा कुछ नहीं। कष्ट क्यों होगा?''
''किंतु चाचा! तुम्हारे पैरों को तो कष्ट होता होगा। गर्म रेत से तुम्हारे पैरों में छाले भी निकल आए हैं।'' चाचा ने अपनी लंबी ठोड़ी पसारते हुए मुस्कुरा कर कहा था, ''कोई बात नहीं- हमेशा तो रहेगा नहीं यह कष्ट? तेरे इम्तिहान तो ख़त्म होने ही वाले हैं। छात्रवृत्ति पाने के बाद तू हरिपुर हाई स्कूल के होस्टल में रह कर पढ़ेगा। बड़ा ऑफ़िसर बनेगा भविष्य में। हमारे वंश का नाम उजागर करेगा...।''
विधान के रुँधे हुए स्वर में कहा था, ''लेकिन चाचा! मुझे कंधे पर ढोते-ढोते तुम्हारे दोनों पैरों में छाले पड़ने का बहुत दुख है मेरे मन में।''
''दुख क्यों हैं रे पगले! बड़ी नौकरी करने पर क्या मुझे एक जोड़ी चप्पल नहीं ख़रीद देगा?'' चाचा ने कहा था।
चकित उल्लास में विधान ने पूछा था, ''चप्पलें ख़रीद देने से तुम चप्पलें तो पहनोगे चाचा?''
''क्यों नहीं पहनूँगा रे? निकम्मा होने के कारण किसी और के पैसों की चप्पलें पहनने से भला कौन हँसेगा?'' चाचा ने आत्मविश्वास के साथ कहा था।

विधान को छात्रवृत्ति मिली थी। छोटे-से गाँव के और भी छोटे बाज़ार में तहलका मच गया कि महांति परिवार के बच्चे को छात्रवृत्ति मिली है। पिता जी की मालिश करते-करते नाऊ ने पूछा, ''मालिक, सुना है आप के भतीजे को छात्रवृत्ति मिली है? कुछ भी हो, मालिक के वंश का नाम रौशन हो गया।''
पिता जी ने एक ब्रह्म तमाचा जड़ दिया नाऊ के गाल में। आँखें लाल करते हुए कहा था, ''क्यों बे स्साले- आज तक नहीं जान सका कि विधान मेरा बेटा है, कहता है भतीजा... जा, बाज़ार में घूम-घूम कर कहना कि मेरे भतीजे को नहीं, बेटे विधान को छात्रवृत्ति मिली है...।''

पिता जी ने दस रुपए बख़्शीश दिए थे नाऊ को। नाऊ ने दाँत निपोरते हुए कहा था, ''छोटे मालिक कंधे पर बिठा कर हरिपुर ले जाया करते थे, इसीलिए समझा भतीजा है।''
''तो क्या हो गया? बेटे और भतीजे में फ़र्क ही क्या है? क्या भतीजे को कंधे पर बिठा कर नहीं ले जा सकते? मुझे फ़ुर्सत ही कहाँ?'' पिता जी ने गुस्से में कहा था।

चाचा ने जब सुना बहुत हँसे थे। कहा था, ''विधान को जन्म देने के बाद शोर मच गया कि भाभी बस जाने वाली हैं। भैया ने खुद मेरी बीवी को बुला कर कहा, आज से यह लड़का पहले तुम्हारा है। बाकी सब का बाद में। इस की माँ के बचने की कोई उम्मीद नहीं। और आज जब विधान को छात्रवृत्ति मिली है तो कहते हैं विधान उनका बेटा है! खुशकिस्मती से भाभी बच गई। किंतु भैया की बात मानें तो विधान मेरा पहले है, बाकी लोगों का बाद में।''

पिताजी के जाने के काफी दिनों बाद तक चाचा नाऊ का ब्रह्म तमाचा याद करके मुस्कुराते। फिर लंबी साँस छोड़ते कि ''विधान कितना मेहनती था। मन लगा कर पढ़ाई की। बड़ा अफसर बना। हज़ारों रुपए कमाए। भैया कुछ देख नहीं पाए।'' सचमुच विधानबाबू के पिता बावनघाटी इलाके में चल बसे। उस समय विधानबाबू की उम्र तेरह या चौदह साल थी। उस के बाद उन्होंने अपनी निष्ठा और बुद्धि के बल पर पढ़ाई की और नाम कमाया। ऊँचे ओहदों पर रहे। लेकिन क्या यह कहा जा सकता है कि चाचा ने कुछ नहीं किया? यह सच है कि विधानबाबू को छात्रवृत्ति मिली थी। पर क्या सिर्फ़ उतने में ही उनका गुज़ारा हो गया। चाचा गाँव से चिउड़ा, चावल, लाई, गुड़, नारियल, घी, बड़ियाँ ले कर उसके पास आया करते थे। विधानबाबू मेस बना कर रहते थे। नौकरी पाने के बाद भी चाचा ने चावल बंद नहीं किया था। विधानबाबू चाचा को मानते थे। चाचा के साँस रोग के लिए च्यवनप्राश, विटामिन के साथ-साथ मिठाई और फल गाँव भेजा करते। चाचा उतने से ही खुश हो जाते। आशीर्वचन उड़ेल देते बाबू पर।

देखते-देखते विधानबाबू बूढ़े हो गए, चाचा थुलथुल बूढ़े। अब शहर नहीं जा पाते। बेटे-बहू से जितनी सेवा-सुश्रुषा मिलनी चाहिए नहीं मिल पाती। रोज़-रोज़ कौन पूछता है बूढ़ों को! विधानबाबू भी नौकरी के दौरान बीवी-बच्चों के साथ आज कटक तो कल कोरापुट में तैनात रहते, बूढ़ा-बूढ़ी को साथ ले कर कितनी जगह घूमेंगे? चाचा-चाची भी गाँव छोड़ कर हमेशा के लिए शहर नहीं आएँगे। भला उन्हें शहर अच्छा लगेगा? आज कल चाचा चल-फिर नहीं सकते। चाची उन्हें ढो रही थीं। साँस रोग बढ़ गया था। शरीर कमज़ोर- उम्र काफ़ी- पका आम। विधानबाबू भी दायित्व-जंजाल छोड़ कर गाँव में महीना-पंद्रह दिन नहीं रह पाते। मिठाई वगैरह ले कर गाँव जाते हैं। दूसरे दिन लौट आते हैं। पिछली बार चाचा की तबीयत उतनी अच्छी नहीं थी। पास-पड़ोस, बंधु-बांधव, अच्छी-अच्छी खाने की चीज़ें ले कर उन्हें देखने जाना शुरू कर दिया था। अर्थात इस बार ऊपर से बुलावा आने का वक़्त आ गया था। ख़बर पा कर विधानबाबू भी गए थे। कंदरपुर का एक हाँडी रसगुल्ला ले गए थे। चाचा को रसगुल्ला बहुत अच्छा लगता है। लेकिन चाचा के हिस्से के रसगुल्ले विधानबाबू को ही खाने पड़े थे। चित्रा चाचा के पास बैठ कर उन्हें रसगुल्ला खिलाने लगी। मुँह में रसगुल्ला लेने से पहले चाचा ने पूछा, ''विधान को रसगुल्ला दिया है ना?'' मानो विधानबाबू अब भी बच्चे हों! विधानबाबू की आँखें भर आईं।
''और किसी चीज़ की इच्छा हो तो मन खोल कर कह दो, भतीजा आया है। पैसों का अभाव नहीं। जो भी कहोगे कटक से ले आएँगे। गाड़ी से आए हैं चिंता क्या है?'' टोला-पड़ोस के लोग पूछ रहे बुढ़ऊ से।
चाचा की अंदर धँसी आँखों के कोनों से कीचड़ मिले आँसू निकल आए। काँपते स्वर में कहा, ''विधान मेरा भतीजा नहीं, बेटा है। मेरा बेटा, भाई का भी बेटा। बेटे के सिवा वह किसी का भतीजा हो ही नहीं सकता...''
''चलो ठीक है, वह तुम्हारा बेटा है यह हाट-बाज़ार में सभी लोगों को मालूम है। इसीलिए नाऊ ने भाई साहब से ब्रह्म तमाचा खाया था, याद नहीं?'' चाची ने कहा।

चाचा के चेहरे पर मुस्कान उभर आई। अतीत को याद करते हुए बोले, ''भैया ने भी बच्चों को मात दे दी थी उस दिन...''
''चलो- अब बताओ। क्या है तुम्हारी इच्छा?'' किसी ने पूछा।
''इच्छा? हाँ बहुत दिनों से एक इच्छा थी, एक जोड़ी चप्पल पहनने की। भैया जैसा मैं नहीं बन सकता। पर उनकी तरह एक जोड़ी चप्पल पहन कर चलना चाहता था। विधान ने कहा था। बचपन की बात है। शायद भूल गया। वरना क्या वह मामूली चप्पलें नहीं ख़रीद सकता था? अब क्या करूँगा? पैर फूल कर इतने मोटे हो चुके हैं, अब चप्पल नहीं घुसेगी... संभव हे सूजन कम हो जाए... वैद्य ने तो कहा है...''
चाचा की बातें सुन कर विधानबाबू का मन भीतर से करोर गया। सचमुच वे चाचा के पूरे जीवनकाल में उनके लिए एक जोड़ी मामूली चप्पल तर नहीं ख़रीद सके।

विधानबाबू ग्लानि से उदास हो उठे। ऐसा नहीं था कि वे चप्पल ख़रीदने की बात भूल गए थे, भला कैसे भूलते? चाचा के कंधे पर बैठ कर परीक्षा देने जाने की बात- छात्रवृति पाने की बात भला कैसे भूल सकते थे? लेकिन उन्होंने कभी सोचा तक नहीं था कि चप्पल पहनने की अभिलाषा उनके मन में लगातार बनी रही। सोचा था, चाचा ने बच्चे का दिल बहलाने के लिए ऐसा कहा होगा। यदि चाचा के मन में सचमुच ऐसी कोई अभिलाषा थी तो चाचा ने कम से कम विधानबाबू या चित्रा को याद क्यों नहीं दिलाई? चाची तो खुल कर बातें करती हैं- गरम चादर, दवाइयाँ, छाता जो भी चाहिए याद दिलाया है, पर... संभवतः संकोच कर गईं। शायद इसलिए कि विधानबाबू बेटा नहीं भतीजा है? क्या बेटा होते तो माँगा होता उन्होंने? विधानबाबू ने भी सोचा था एक-दो बार चाचा को चप्पल ख़रीद देंगे। फिर सोचा, चाचा चप्पल पहन कर जाएँगे कहाँ? क्या सचमुच पहनेंगे? कहीं सब की तरह विधानबाबू ने भी तो यह नहीं मान लिया कि चाचा जैसे निकम्मे आदमी को चप्पल नहीं पहननी चाहिए! वादा करके चप्पल न ख़रीदना क्या इस बात का सबूत नहीं हे कि विधानबाबू ने भी चाचा को पिता जी से नीचे ही रखा? मन मार कर विधानबाबू लौट आए। किंतु उसी दिन चाचा के लिए एक जोड़ी चप्पल भी ख़रीद लाए। ईश्वर चाहेंगे तो पैरों की सूजन कम हो जाएगी। कम से कम एक बार तो चप्पलें डाल ही लेंगे चाचा पैरों में।

चाचा के पैरों में सूजन सचमुच कम हो गई थी। चाचा खुश हो रहे थे अपने झुर्रीदार पैरों को देख कर। विधानबाबू को चाचा के पैरों में चप्पलें पहनाते देख शरारती नाती-नतनी खिलखिला कर हँसने लगे। उनमें से किसी ने कहा, ''दादा जी बेंत ले कर कचहरी जो जाएँगे...''
गनीमत थी चाचा को ठीक से सुनाई नहीं देता। किंतु औरतें होंठ दबा कर धीरे-धीरे मुस्कुरा रही थीं। किसी ने फुसफुसा कर कहा, ''मरते समय बुढ़ऊ को शौक चर्रा रहा है।''

विधानबाबू खुद को अपराधी समझने लगे। क्यों किया उन्होंने यह मज़ाक? खुद को ग्लानिमुक्त करने के लिए वे चप्पल ख़रीद कर लाए हैं, चाचा के पहनने के लिए नहीं, यह बात उन्हें खुद को नहीं, वहाँ उपस्थित सब को साफ़-साफ़ दिख रही थी। क्या ज़रूरत थी, मौत के मुँह में जाते चाचा के लिए चप्पल ख़रीद कर लाने की?

चाचा चल बसे। चप्पलों की जोड़ी वहीं रखी थी पैरों के पास। मरते दम तक कहते रहे, ''उन्हें वहीं रहने दो, मेरे विधान ने ख़रीदी है। शायद फिर उठ कर चलने लगूँ। काश विधान की ख़रीदी चप्पलें पहन कर चलने के लिए ही भगवान मुझे जीला दें!'' मरते समय बहुत बेचैन हो उठे थे जीने के लिए। विधानबाबू की ख़रीदी चप्पलों में इतनी शक्ति कहाँ थी कि वे चाचा की लौटती गाड़ी को रोक सकें?

चाचा के क्रियाकर्म के बाद विधानबाबू चाचा की वे चप्पलें सिर से लगा कर बगल में दबा कर वहाँ से ले आए, जिन्हें सिर्फ़ एक बार चाचा के पैरों का स्पर्श मिला था।
चौदह वर्ष के बाद लौट आने का वायदा भरत से किया था रामचंद्र ने। चाचा ने ऐसा कोई वायदा नहीं किया। लेकिन उदास गर्मियों में- धू-धू दुपहरी में जब धरती जल रही होती है,चाचा उन्हीं चप्पलों को पहन कर थप-थप करते विधानबाबू के सीने पर चल रहे होते हैं।

(रूपांतर : राजेन्द्र प्रसाद मिश्र)

 
 
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