Likhoon...? : Shivani

लिखूँ...? शिवानी

यह प्रश्न पिछले दो वर्षों से मुझे विचलित कर रहा है। कई बार कलम उठा चुकी थी किन्तु उतनी ही बार हारकर रख दी। कभी चित्त बहुरूपिया बन, उदार दलीलें देता, कभी स्वयं कलम थाम लेता। आज तक स्मृति-गह्नर से न जाने कितने कंकाल खींच पाठकों को थमा चुकी हँ, किन्तु इस कथानक का उलझा सूत सुलझाने बैठती हूँ तो वही धूसर स्मृति किसी अशरीरी-प्रेमछाया-सी मुझे सहमाने लगती है। छिः-छिः यही मैत्री निभा रही है तू? मेरे जिस पलायन के कलंक को मेरे आत्मीय स्वजन भूल चुके हैं, जिस रहस्य के गड़े मुर्दे की कब्र को, लापरवाही से उग आए झाड़-झंखाड़ ने एकदम ही अदृश्य कर दिया है उसी मुर्दे को उखाड़ रही है तू? भूल गई है क्या कि मेरी एक विवाहिता पुत्री और है; भले ही आज वह सुदूर अफ्रीका के किसी गहन वन-अरण्य में अपने वैज्ञानिक पति के साथ किसी दुरूह शोधकार्य में ऐसी खो गई है कि शायद ही कभी भारत लौटे। पर यदि कभी लौट आई तो? ऐसा तो है नहीं कि उसके पास भारत की पत्र-पत्रिकाएँ पहुँचती ही न हों! फिर तू मेरा नाम भी तो नहीं बदल रही है। कैसे बदलू प्रिया! वह नाम ही तो तेरे व्यक्तित्व की व्याख्या कर सकता है। विधाता का दिया वह नाम मैं कैसे बदलूँ! फिर क्या तुम्हारा कलंक उजागर कर रही हूँ मैं तो केवल यह सिद्ध करना चाह रही हूँ प्रिया, कि तेरे पलायन का कलंक कलंक नहीं था, विवशता थी! प्रिया दामले, अपने पितृकुल का ऐसा जगमगाता दीपक थी, जिसकी देहरी पर पैर रखते ही पितृकुल का बाहर-भीतर दोनों उजागर हो गया था। उसके पिता चार भाइयों में सबसे बड़े थे। दुर्भाग्य से तीन चाचाओं में से दो निःसन्तान थे। तीसरे ने विवाह ही नहीं किया। इसी से बड़े लाड़-प्यार में पली प्रिया बचपन से ही अबाध्य बन उठी थी। दस-बारह वर्षों तक उसे लड़कों के ही कपड़े पहनाए गए, वैसे ही छोकरा-कट बालों में वह एकदम लड़का लगती थी।

जब वह मेरी सहपाठिन बनकर होस्टल में आई तो मैं ही नहीं सब ही छात्र-छात्राएँ उसके छरहरे, सुन्दर, तेजस्वी व्यक्तित्व से सहम गए थे। लगता था, मधुमास में जन्मी किसी कलिका-सी उस किशोरी को सौकुमार्य, चापल्य, मार्दव में मंडित करने से विधाता ने, उन वनस्पतिजन्य रंगों का प्रयोग किया था जिनका प्रयोग इन दिनों आश्रम के कलागुरु नन्दलाल बोस कर रहे थे, पलाश, हरिद्रा, गुलबनफ्सा, हरीतिकी।

विधाता की उस प्रतिभा-प्रसूत सृष्टि को देख सचमुच यही लगता था कि मोनालिसा के विश्वविख्यात चित्र की रहस्यमय मुस्कान को समझने की भाँति प्रिया के दृढ़ता से भिंचे क्यूपिड अधरों की मुस्कान समझने के लिए भी शायद अनन्तकाल तक व्यर्थ प्रयास चलते रहेंगे।

आश्रमगुरु रवीन्द्रनाथ ने शायद ठीक ही कहा था कि नारी-सौन्दर्य का अर्धभाग प्रकृति की देन है, किन्तु उसका शेष सौन्दर्य केवल काव्य है, पे्रमी और कवि की उर्वर कल्पना का परिणाम! मैं जानती हूँ, यहाँ मेरे पाठक, शंका की नंगी संगीन लिये एक बार फिर मेरे सामने खड़े हो जाएँगे ऐसी भी क्या कल्पना जो सदा की भाँति सुन्दर नायिका को कल्पना के तुरंग पर आरूढ़ कर मानव पकड़ से दूर हवा में उड़ाकर रख दे!

किन्तु मेरा आपसे अनुरोध है, मुझे उस दिव्य व्यक्तित्व की वर्णना जी भरकर कर लेने दें। मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ, मेरी स्मृति कल्पना को रंचमात्र भी प्रश्रय नहीं दे रही है।

‘सुष्ठु उनत्ति आर्द्र यति मनः’ यह तान्त्रिाक साहित्य में भले ही त्रिपुरसुन्दरी या योगिनी के लिए प्रयुक्त हुआ हो, प्रिया भी वैसे ही मन को आर्द्र करने में समर्थ थी। उसका वही तेज देख पहले हम सब सहम गए थे, किसी ने भी उसकी ओर मैत्री का हाथ नहीं बढ़ाया। अपने साथ वह बड़े-बड़े दो सूटकेस भरकर विचित्र परिधान लाई थी। राजस्थानी लहँगे, कच्छी-चूनर, जामनगरी छायल, चूड़ीदार कुत्र्ते, अँगरखे और लेडी हेमिल्टन रेशम की सलवार- कमीजें। उससे कई बार स्पष्ट कह दिया गया था कि आश्रम की कक्षा में वह केवल सूती साड़ी की पहनकर प्रवेश पा सकेगी।

‘‘ठीक है।’’ उसने अपनी सुराहीदार ग्रीवा को और तानकर कहा था,
‘‘होस्टल में तो जो जी में आए, वह पहन सकती हूँ।’’ और वह फिर वही करती थी। रात को आश्रम-भोजनालय में जाती तो उसके आते ही हंगामा मच जाता।

‘‘ओई जे नामछेन आकाश थेके उर्वशी!’’ (देखो-देखो, उर्वशी आकाश से उतर रही है) वह न दाएँ देखती न बाएँ, अपने साथ लाया गया बगुले के पंख-सा स्वच्छ नेपकिन गोद में धर, बंगाल का ‘घंट’, ‘शुप्तो’, ‘चच्चड़ी’ का गस्सा मुँह में धरते ही नाक चढ़ा पानी का एक घूँट पीकर उठ जाती। एक दिन मैंने ही उसे टोक दिया, ‘‘तुम तो रोज भूखी ही उठ जाती हो, खाती क्यों नहीं?’’

‘‘ऐसा खाना मेरे घर के कुत्तों को भी नहीं दिया जाता, कैसे चुपचाप खा लेती हो तुम लोग?’’

आश्रम के एक-एक नियम को वह जिस दुःसाहस से रौंदे जा रही थी, उसे देख हम काँपे जा रहे थे कि अब इसकी पेशी निश्चय ही हमारी कठोर फ्रेंच दीदी के सामने होगी और वे निश्चित रूप से इस नकचढ़ी के अहंकार का भूत एक पल में झाड़कर रख देंगी। किन्तु, कुछ भी नहीं हुआ, पता यही लगा कि उसके पिता लार्ड सिन्हा, विधान रॉय एवं नीलरतन सरकार के अभिन्न मित्र हैं एवं उन्हीं के प्रभाव से प्रिया आश्रम में स्वच्छन्द विचरण कर सकती है। ऐसा नहीं था कि उसे कभी गुरुजनों की फटकार मिलती ही नहीं थी, किन्तु जब कभी मिलती, वही निषेध उसे और उद्धत बना देता।

सचमुच अद्भुत लड़की थी वह! आकाश को भी लाँघ जाने का उसका अदम्य उत्साह, बाधाओं से जूझने को उसका सदा गर्वोन्नत सिर, कठोर कशाघात को सहकर भी किसी को कुछ न समझनेवाली मुद्रा, आज उसके रँगीले-रसीले भावों की कटु-तिक्त-मधुर स्मृतियाँ मुझे विह्नल कर रही हैं। उसे लड़कियों में उठना-बैठना अच्छा नहीं लगता था।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि काम मन का मूल है किन्तु प्रिया में वह काम शायद कुंठित होकर ही तीव्रतर हो उठा था। उसके लिए सुनर्य का ही महत्त्व था, नारी का नहीं। एक तो उसके शरीर की गढ़न भी ऐसी थी कि लगता था कि खजुराहो की भित्ति की ही कोई मूर्ति जीवन्त हो उठी है। उसके पृथुल नितम्ब, मांसल अंग-प्रत्यंग, वर्तुल वक्षःस्थल, तिर्यक् दृष्टि, सब ही विलास एवं उद्दाम काम के प्रबल संकेत देते थे शायद यही कारण था कि छात्र-मंडली उसके इर्द-गिर्द भौंरे-सी मँडराती रहती। लड़कियों में उसकी एकमात्र मित्र मैं ही थी। यद्यपि आश्रम की ही छात्रा मेरी बड़ी बहन मुझे कई बार कठोर चेतावनी दे चुकी थीं कि उस बेहया अहंकारी लड़की से मैं गज-भर की दूरी ही बरतूँ!

‘‘खुद तो बदनाम है ही, तुझे भी ले डूबेगी, खबरदार जो मैंने तुझे उसके साथ घूमते-फिरते देखा!’’ किन्तु मुझे हमेशा यही लगता था कि लोग उसे गलत समझते हैं। वह अहंकारी नहीं थी, वह तो उसका चेहरा ही विधाता ने ऐसा बनाया था कि उसकी सरल दृष्टि भी अहंकारदीप्त लगती। गणित में उसे स्वयं सरस्वती का वरदान प्राप्त था कठिन-से-कठिन सवाल भी वह चुटकियों में हल कर देती, स्मरण-शक्ति ऐसी अद्भुत थी कि एक बार किसी पाठ पर आँखें फेरती और दूसरे ही क्षण विराम-अर्द्धविराम सहित पूरा पाठ दनादन उगल देती। उसका बंगला उच्चारण एकदम त्रुटिहीन था, साहित्य सभाओं में वह रवीन्द्रनाथ, जीवनानन्द दास, विष्णु दे की कविताओं की आवृत्ति करती तो लोग आश्चर्य से मन्त्रमुग्ध हो साँस रोके उसे देखते रहते।

‘‘की मेये रे बाबा! एई तो बांगालीर थेकेओ बेशी बांगाली।’’ (क्या लड़की है रे बाबा, यह तो बंगाली से भी अधिक बंगाली है)। उसकी यही आश्रमव्यापी ख्याति लड़कियों को जला-भुना देती। एक बार होस्टल की छात्राओं ने उसकी शिकायत कर दी कि वह आधी रात को कमरा बन्द कर सिगरेट पीती है। मैं तो काँप गई कि तलाशी लिये जाने पर मेरी वह दबंग सखी अब अवश्य ही पकड़ी जाएगी, क्योंकि मैं जानती थी कि सूटकेस में रेशमी साड़ियों की तहों के बीच वह थल्ले के थल्ले सिगरेट के पैकेट छिपाकर रखती है! यह 1936 की बात है, आज शायद लड़कियों के छात्रावास में, उनके सूटकेस में चरस-गाँजे के बीड़े भी पकड़े जाने पर उन्हें उदार जमाना मुक्त कर दे पर तब किसी छात्रा के सिगरेट पीने का सन्देह भी उसके लिए चुल्लू-भर पानी में डूब मरनेवाली बात होती थी। मैंने उसे एक दिन टोका भी था, ‘‘छिः-छिः, प्रिया, तुम सिगरेट पीती हो?’’

‘‘क्यों, क्या बुराई है इसमें? स्त्रिायाँ तम्बाकू, जर्दा खा सकती हैं तो सिगरेट क्यों नहीं पी सकतीं भला? और फिर मुझे पकड़नेवाला आज तक पैदा नहीं हुआ तू क्यों घबड़ाती है?’’

सच, गजब की लड़की थी वह! जब बिना किसी पूर्वसूचना के एक दिन उसके दोनों सूटकेस जब्त कर लिये गए तो उसके चेहरे पर शिकन भी नहीं उभरी। सब लड़कियों की उपस्थिति में ही, जितनी ही बार उसकी एक-एक साड़ी झटकी जा रही थी, उतनी ही बार मेरा धड़कता कलेजा मुँह को आ रहा था किन्तु एक वह थी बन्दी कि वहीं पर बैठी गहन आत्मविश्वास से मुस्कराती चली जा रही थी जैसे कह रही हो क्यों, मिला कुछ? रात-ही-रात में क्या सब पैकेट फूँक डाले थे छोकरी ने?

मैंने बाहर निकलते ही एकान्त में उससे पूछा, ‘‘कहाँ गए सब पैकेट?’’
‘‘सब पी गई हूँ! मेरी तलाशी लेने चले थे, बड़े-बड़े डूब गए, गदहा पूछे कित्ता पानी!’’

इसी बीच पिता की बीमारी का तार पा मैं बँगलौर गई, लौटी तो पता लगा प्रिया अचानक आश्रम छोड़कर चली गई है। वह कहाँ गई, क्यों गई, किसी को कुछ पता नहीं था। लड़कियाँ मुझसे पूछतीं, ‘‘क्यों, तुम्हारी अन्तरंग सखी थी तुमसे भी कुछ नहीं कह गई? किसी प्रेम का चक्कर था क्या?’’
मैं क्या कहती, कुछ कहती भी तो क्या कोई विश्वास करता कि मुझसे कुछ कहे बिना ही वह चली गई है? स्वयं मैंने उसे उसकी उस सनकी बेरुखी के लिए क्षमा नहीं किया।

फिर वर्षों बाद, वह मुझे अचानक एक दिन स्टेशन पर मिल गई। आश्रम छोड़े वर्षों बीत गए थे, मेरा विवाह हो चुका था, छात्रा-जीवन की स्मृतियाँ बहुत पीछे छूट चुकी थीं। ट्रेन आने में विलम्ब था। मैं रेलवे बुक स्टाल पर खड़ी पत्रिकाएँ उलट रही थी कि अचानक किसी ने मेरे कन्धे पर हाथ रखा। मैं चैंककर मुड़ी तो वह मुझसे लिपट गई, वह भी उसी ट्रेन से जा रही थी, फिर तो अपने वातानुकूलित डिब्बे में ही वह मुझे जबरन खींच ले गई। ‘‘तू चिन्ता मत कर, मेरे छोटे चाचा अब रेलवे बोर्ड के चेयरमैन हैं, सब मुझे जानते हैं। अभी मिनटों में तेरा टिकट कनवर्ट करवा लेंगे।’’

उसके एकान्त कक्ष में कितना कुछ कहने को था और कितना सुनने को! एक-एक कर कितनी ही रस-भरी स्मृतियाँ, वर्षों से किसी जंग लगे बक्से में से निकल रही भव्य बनारसी साड़ियों की नेपथलीनी गन्ध से हमें विभोर कर गईं।

‘‘तू अचानक ऐसे चली क्यों गई थी प्रिया?’’ मैंने पूछा।
‘‘बहुत पुरानी बात हो गई, छोड़ भी, बस मन उचट गया था हमारा,
अब यह बता कि तेरी शादी कब हुई? क्या करते हैं तेरे पति?’’
पर मैं तो उसके प्रश्न का उत्तर देना भूल एकटक उसे ही देख रही थी। वही प्रिया थी, वही रंग, वही रूप, वही कद-काठी किन्तु कहीं न जाने कुछ अटपटा लग रहा था उसकी मायावी हँसी, उसका कंठस्वर या उसकी कुटिल चितवन!

‘‘चल पहले कुछ खा लिया जाए।’’ उसने अपना ठाठदार नाश्तादान टोकरी से निकाला, स्वच्छ नेपकिन, काँटे-छुरी, चम्मच खनकते ही मेरी सुप्त क्षुधा भी जाग्रत हो गई। क्या आला दस्तरख्वान सजा दिया था पट्ठी ने। इन मौलिक लटकों में तो वह हमेशा बेजोड़ थी।

‘‘याद है, ये मावे के पेड़े तुझे होस्टल में भी बेहद पसन्द थे अभी भी वह हलवाई जिन्दा है और जैसे-जैसे बुढ़ा रहा है अभागा वैसे-वैसे और उम्दा पेड़े बनाता जा रहा है। खाकर देख।’’

‘‘तेरी शादी हो गई, प्रिया?’’ पेड़ा मुँह में रखते ही मेरे भीतर कहीं उफनती प्रच्छन्न जिज्ञासा जिह्नाग्र पर आ गई। मैं मन-ही-मन सोच रही थी कि तब क्या इस सनकी लड़की की शादी नहीं हुई? यह तो अभी भी मुझे मायके की दूकान के ही पेड़े खिला रही है। मेरे प्रश्न को अनसुना कर वह फिर चहकने लगी, ‘‘यह ले एक पेड़ा और खा है ना बढ़िया?’’

मैं अपना कौतूहल रोक नहीं पा रही थी।
‘‘तेरी शादी हो गई प्रिया?’’ मैंने फिर पूछ दिया।
‘‘हाँ,’’ वह हँसी, ‘‘देखती नहीं यह कढ़ा हुआ सालू?’’ अपना फलबरी दुपट्टा उसने मेरे सामने झंडी-सा फहरा दिया पर यह तो प्रिया की परिचित उन्मुक्त हँसी नहीं थी।

तब, क्या वह अब तक कुँआरी ही थी या अकाल वैधव्य ने उसे ऐसी श्रीहीन बना दिया था, न कंठ में मंगलसूत्र था, न अँगुली में अँगूठी, न ललाट पर मद्रासी कंकु की उसकी वह बिंदी जिसके नीचे वह हमेशा एक नन्हा-सा काला गोल बिन्दु सँवार लिया करती थी। उसका वह मौलिक सज्जा प्रयोग फिर आश्रम में फैशन बनकर ही चल निकला था। जिसे देखो, ललाट पर दो-दो बिन्दियाँ।

मेरा गन्तव्य स्टेशन आने को ही था, मुझे तो दूसरे ही स्टेशन पर उतरना था पर वह कहाँ जा रही थी? ‘‘अपना पता नहीं देगी? कभी चिट्ठी तो लिख देना, मेरा पता भी लिख ले।’’

‘‘अरे छोड़, जब मिलना होगा, ऐसे ही भगवान हमें मिला देगा और एक बात बता दूँ संसार के अधिकांश पते झूठे होते हैं।’’

क्या सचमुच ही बौरा गई थी लड़की या किसी पागलखाने से रोग मुक्त होकर लौट रही थी? ऐसी गहन मैत्री थी हमारी और न अपना पता देने का उत्साह, न मेरा पता लेने की व्यग्रता।

‘‘मैं अगले स्टेशन पर उतर जाऊँगी,’’ मैंने कहा और साड़ी की भाँज ठीक करने उठने लगी।

उसने मेरा हाथ पकड़कर बिठा लिया, ‘‘नाराज हो गई? तब सुन, मेरा विवाह हो गया, तेरी ही तरह मेरी भी एक प्यारी-सी बच्ची है, सुदर्शन पति है, बड़ा-सा प्रासाद है, दो कार हैं, यहाँ तक कि मेरे लखपती व्यवसायी पति का अपना चार्टर्ड प्लेन भी है। पर मैं यह सब हमेशा के लिए छोड़कर भारत चली आई हूँ।’’

‘‘क्या कहती हो प्रिया? क्या तुम्हारे पति...’’ मेरे अधूरे प्रश्न को उसने स्वयं पूरा कर दिया, ‘‘क्या मेरे पति बदचलन हैं, शराबी हैं? यही पूछना चाह रही है ना? वहीं विदेश में ही जन्मे, वहीं बस गए। किशोर पटवर्धन को कोई भी लत नहीं है, वह मुझे बेहद चाहता है और मैंने ही उसे छोड़ा है, उसने नहीं।’’

ट्रेन की गति धीमी हो रही थी, दूर से ही आसन्न बड़े स्टेशन की बत्तियाँ जुगनू-सी चमकने लगी थीं।

मैंने अधीर होकर उसे झकझोर दिया, ‘‘कैसी मूर्ख है तू कहती है तेरे एक बच्ची भी है, वह बड़ी होगी, विवाह होगा, तब क्या उसे माँ का अभाव नहीं खलेगा? फिर उसके निर्दोष पिता को तू अकारण ही छोड़कर चली आई!’’

‘‘अकारण नहीं,’’ वह हँसी किन्तु कैसी विचित्र हँसी थी वह! ‘‘बहुत कारण हैं, मैं उसके विवाह तक बनी रहती तो उसकी लज्जा उसके लिए घातक बन सकती थी।’’

स्टेशन आ गया था, मैं विदा लेकर उतर गई। वह देर तक खिड़की से हाथ हिलाती रही और एक बार वह हिलता हाथ वर्षों के लिए किसी शून्य में विलीन हो गया।

ठीक दस वर्ष बाद वह फिर मिल गई। आज कई बार सोचती हूँ न मिली होती तो शायद अच्छा ही होता।

नैनीताल जाड़ों में प्रायः ही मसान-घाट-सा वीरान हो जाता है। कहते हैं, 25 दिसम्बर को वहाँ अवश्य हिमपात होता है। मैं दस वर्षों तक वहाँ रही और कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि बड़े दिन पर बर्फ न गिरी हो, जब नहीं भी रही, तब भी उस ऐतिहासिक हिमपात का समाचार सुन लेती।

उस दिन भी 25 दिसम्बर का हिमपात होकर उदार क्षणिक धूप से गलकर पिघल गया था। कई दिनों की अनवरत वर्षा के बाद, पहली बार निरभ्र आकाश चमका था, ताल लबालब छलक रहा था। नैनादेवी के मन्दिर की क्षुद्र घंटियों के साथ गिरजे के गुरु-गम्भीर घंटे की गर्जना पखावज की-सी जुगलबन्दी कर रही थी। ठंडी सड़क निःस्तब्ध सन्नाटे से घिरी एकाएक अँधेरी सुरंग-सी लग रही थी। न जाने किस सनक में मैं उस सन्नाटे में पाजाण देवी के दर्शन को निकल गई थी। ताल की गार पर खड़े विलोवृक्ष मणिपुरी नर्तकियों की-सी अलस मादक लास्यपूर्ण मुद्रा में झूम रहे थे।

आकाश फिर धूसर मेघखंडों से घिरने लगा था, मैंने ठंडी बयार से सिहर, शाल कसकर लबादे-सा लपेट लिया और चाल तेज कर दी नैनीताल की वर्षा, बिना किसी पूर्वसूचना के आ गए अतिथि की भाँति, कभी भी आकर सहमा देती है। कहीं ऐसा न हो कि तीव्र वर्षा का वेग मुझे बीच ही में दबोच ले और मैं अपने घर तक की कठिन चढ़ाई भी न चढ़ पाऊँ। उन दिनों अवस्था भी ऐसी थी कि तेज चल पाना भी मेरे लिए कठिन हो रहा था। सहसा किसी ने मेरे कन्धे को अपने मजबूत पंजे से जकड़ लिया। मैं घबड़ाकर खड़ी ही रह गई। जनशून्य ठंडी सड़क पर दूर-दूर तक कोई नहीं था। कुछ ही दिन पूर्व, उसी ठंडी सड़क पर डिग्री कॉलेज की एक छात्रा की क्षत-विक्षत लाश मिलने का समाचार पूरे नैनीताल को स्तब्ध कर गया था।

उन दिनों का नैनीताल आज का नैनीताल नहीं था, वहाँ तब हत्या तो दूर, सामान्य-सी चोरी या ताला तोड़ने की घटना ने भी कभी सरल नागरिकों को भयत्रस्त नहीं किया था। कुछ दिनों तक वहाँ की धर्मभीरु गृहिणियों ने भी ठंडी सड़क पर जाना छोड़ दिया, पहले उस सड़क पर उन्हें केवल शेर, भालू का ही भय सहमाता था, पर अब तो मानव का ही भय उनके लिए नरभक्षी पशु बना जा रहा था।

‘‘पहचाना नहीं?’’ इस बार कन्धे से हाथ हटा वह दीर्घांगी छाया मेरे सम्मुख खड़ी हो गई। ‘‘प्रिया!’’ उसे बाँहों में भरने में मेरे दोनों उत्साही हाथ जैसे किसी ने सहसा अदृश्य खड्ग से काटकर धरा पर डाल दिए। यह कैसा विचित्र वेश था उसका, ढीला इकबर्रा पायजामा, रेशमी कुर्ता और खुले बटनों से झाँकती लोमश छाती, अधरों पर जर्दे-पान की लाली, सहसा उसकी आँखों में लाल डोरे बनकर उतर आई थी। कहाँ गई वह लम्बी वेणी, वह वत्र्तुल वक्ष, वह दुहरी बिन्दी?

मेरे सम्मुख प्रिया का ही अविहूत नक्शा था, वही कद, वही काठी, किन्तु नहीं वह प्रिया नहीं थी।

तब क्या वह उसका जुड़वाँ भाई था? पर प्रिया तो अकेली ही थी, न भाई, न बहन, चाचा निःसन्तान थे, मामा थे ही नहीं और मौसी कुँआरी थी। ‘‘कौन हो तुम?’’

वह बड़ी बेहयायी से हँसा, ‘‘क्यों भाई, अभी तुम्हीं ने तो प्रिया कहकर पुकारा था ना। अब पूछती हो मैं कौन हूँ?’’

‘‘नहीं, तुम प्रिया नहीं हो!’’ मैं जाने को उद्यत हुई।
‘‘रुको,’’ उसने कहा और इससे पहले कि मैं दामन बचाकर छिटकती,
उसने दोनों हाथ फैलाकर, मेरा मार्ग अवरुद्ध कर दिया।
‘‘तुमने ठीक ही पहचाना, मैं प्रिया ही हूँ।’’
‘‘क्या बक रहे हो, छोड़ो मेरा रास्ता।’’

‘‘नहीं,’’ फिर वह हमारी मैत्री के न जाने कितने प्रकरण एक ही साँस में सुना गया ‘‘याद है, जब तू और मैं एक्सकर्शन दल को घिस्सा दे कचौड़ी गली में कचौड़ी खाने सटक गए थे, और इक्के में लौट, राजघाट के पिछवाड़े के रास्ते, चुपचाप आकर अपने-अपने बिस्तर में घुस गए थे? याद है, जब तुझे मैंने चुटकियों में उनचासवाँ थियोरम याद करवा दिया था जो तुझे याद ही नहीं होता था? याद है, जब प्रभात मुखर्जी ने अपनी क्लास में हम दोनों को कक्षा में बात करने पर पीरियड-भर खड़ी रखा था? याद है, तुझे रात को नींद में चलने की आदत थी और हम दोनों एक-दूसरे की चोटियाँ बाँध लेते थे कि तू चलने लगे तो मैं जाग जाऊँ? तू हमेशा मेरे पास आकर सो जाती थी याद है...’’

‘‘बस चुप करो...’’ कह तो दिया पर मैं उसे स्तब्ध खड़ी देखती रह गई। कौन था यह अद्भुत सिद्ध जो मेरी और प्रिया की मैत्री के इन संस्मरणों की अभिज्ञता से मुझे सहमा रहा था। कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रिया मर-खप गई हो और यह उसका दुष्ट प्रेत हो!

‘‘अभी भी तू नींद में चलती है क्या? पर सुन...’’ उसने बड़े स्नेह से मेरा हाथ थाम लिया, ‘‘अब तू डरकर मेरे बिस्तर में घुस भी आई तो मैं तेरी चोटी अपनी चोटी से नहीं बाँध पाऊँगी, देख ना इधर,’’ वह अपने कटे केश पर हाथ फेर बड़ी दुष्टता से मुस्कराया।
मेरा चेहरा लाल पड़ गया।
सहसा मेरे गर्भस्थ शिशु की धड़कनें मेरी धड़कनों से मिलकर धड़क उठीं धक्, धक्!

अधेरा और घनीभूत हो गया। कुहरा धीरे-धीरे ताल के ऊपर शामियाने-सा टँग गया था। मन्दिर की आरती की गूँज कभी धीमी और कभी प्रखर होकर अयांरपाटा के पहाड़ों से टकरा रही थी।

सुर-मुनि-मोहिनि सौम्या तू शोभाऽऽधारा
विवसन विकट स्वरूपा, प्रलयमयी धारा
जग जननी जय-जय माँ,
जग जननी जय-जय!

‘‘तूने उस दिन ट्रेन में पूछा था ना, मैंने क्यों घर-बार छोड़ा? तो सुन, नीला के जन्म के बाद ही मेरा शरीर मेरे लिए पहेली बनने लगा। मेरे कन्धे स्वयमेव चैड़े हो गए, मेरी अँगुलियाँ मोटी होती चली गईं, मेरे पंजों में लोहे की जकड़न आ गई, मेरी आवाज भारी होने लगी और मेरा दर्पण ही मुझे छलने लगा। पहले मुझे पुरुषों का साहचर्य प्रिय लगता था। अब किसी भी सुन्दरी युवती या किशोरी को देख मैं पागल हो उठती। पति-स्पर्श भी मुझे असह्य लगने लगा। बेचारा किशोर आश्चर्य से मुझे देखता। एक दिन उसने कहा, ‘क्या हो गया है तुम्हें प्रिया? क्या तुम मुझसे नाराज हो?’

‘‘ मैं उससे कैसे कहती कि किशोर, मैं अब प्रिया नहीं रही धीरे-धीरे अप्रिय बन रही हूँ।

‘‘ फिर एक दिन मैं साहस कर एक अज्ञात चिकित्सक के पास गई, अपने पी.पी. के पास जाती तो एक-न-एक दिन किशोर जान लेता। रुपया मेरे लिए हाथ का मैल था, मैं किसी भी विशेषज्ञ की ऊँची-से-ऊँची फीस दे सकती थी।

‘‘ डॉक्टर ने मेरे सन्देह की पुष्टि की, मैं धीरे-धीरे नारी का चोला छोड़ रही थी, एक सामान्य-सा आॅपरेशन ही मुझे पुरुष बना देगा, किन्तु मेरा पौरुष क्या मेरा ही सर्वनाश नहीं कर देगा, मेरी निर्दोष बच्ची, मेरा देवतुल्य पति? वे क्या मेरे पौरुष को स्वीकार कर पाएँगे? क्या स्वयं मेरी लज्जा उनकी भी लज्जा नहीं बन जाएगी?

‘‘ सौभाग्य से उन्हीं दिनों किशोर अपने व्यवसाय के सिलसिले में नाइजीरिया जा रहा था, उन दिनों वैसे हममें बोलचाल लगभग बन्द ही थी। मैंने अपना बेडरूम अलग कर लिया था। और उस बे-बात की सजा को बेचारा किशोर झेल नहीं पा रहा था।

‘‘ उसका मेरा ज्वाइंट एकाउन्ट था, उसी में से पर्याप्त धन-राशि निकाल मैं नीता को अपनी एक मित्र के यहाँ यह कहकर छोड़ आई कि मैं अपनी बीमार माँ को देखने भारत जा रही हूँ। लौटते ही किशोर समझ गया होगा कि मैं अब कभी लौटूँगी नहीं क्योंकि मेरी माँ तो मेरे विवाह से पहले ही गुजर चुकी थी। फिर उस अज्ञात विशेषज्ञ के अज्ञात क्लिनिक में मैं स्वयं ही प्रिया का पिंडदान कर आई। वहाँ से सीधी भारत...

‘‘ मुझे अपने घर चलने को नहीं कहोगी?’’ उसका भर्राया कंठस्वर मुझे भय से कँपा गया, इसी सखी का यही आह्नान सुन शायद मैं उसे कभी हाथ पकड़कर घर खींच लाती, पर उस दिन उसका वह अनुरोध सुन मैं सिहर उठी। मैं बिना कुछ कहे तेजी से बढ़ने लगी कि उसने मुझे बाँहों में भींच लिया।

मैं नहीं जानती उस दिन किस दैवी शक्ति ने मेरे अंग-प्रत्यंग में वह स्फूर्ति, वह साहस भर दिया मैंने एक झटके से उस लौह बाहुपाश से अपने को छुड़ा उसे एक धक्का दिया। वह उस आकस्मिक आघात के लिए शायद प्रस्तुत नहीं था। कटे पेड़-सा वह नीचे गिरा और मैं हवा के वेग से भागी। कभी कॉलेज की रिले रेस में, मैं एक कदम आगे बढ़ा अपनी इसी सखी की प्रलम्ब भुजा की प्रतीक्षा में खड़ी सहसा ऐसे ही भागने लगती थी। नहीं जानती अपनी उस अवस्था में भी मैं उस दिन कैसे तेजी से भाग पाई। मैं घर पहुँची तो मेरे चिन्तातुर पति हाथ में टार्च लिये मुझे ढूँढ़ने ही निकल रहे थे।

‘‘कहाँ रह गई थीं तुम? इतनी बार समझाया है, इस कब्रिस्तान की पगडंडी से मत आया करो, फिर वहीं से आ रही हो। रात-भर अब डरती रहोगी।’’

मैं प्रायः ही उस पगडंडी से आती थी और कभी-कभी रात को उन्हीं कब्रों के सपने देख बुरी तरह चीख पड़ती थी। दिन में जिस कब्रिस्तान में बैठना मुझे अच्छा लगता था, रात को वही भयावह लगने लगता। 1855 की उन कब्रों पर खुदे कई नाम मुझे कंठस्थ हो गए थे। अधिकांश कब्रों पर संगमरमरी पत्थर की बनी फरिश्तों की खंडित मूर्तियों के साये में मैंने न जाने कितनी कहानियाँ लिखीं, किन्तु उस दिन जिस अनूठे कथानक को मुट्ठी में बाँध मैं उसी कब्रिस्तान की पगडंडी के औदार्य से चटपट घर पहुँची, उसे क्या आज तक लिपिबद्ध कर पाई? वह कथानक केवल मेरे और मेरे पति तक ही सीमित पुष्प-सा बिखरकर धरा में मिल जाता। पर दो वर्ष पूर्व, लन्दन के आब्जर्वर में मैं मृत्यु-सूचनाएँ पढ़ रही थी। पूरा अखबार चाटकर जब कुछ भी पढ़ने को नहीं रह जाता था तो मैं इसी स्तम्भ की जुगाली करती थी। अनचीन्हे उन मृत्युपथ के यायावरों के नाम, व्याधि, जन्म-मृत्यु के अन्तराल से उनकी वयस का शरसन्धान मुझे बड़ा अच्छा लगता। कभी दुख होता कि हाय, ऐसी अकाल मृत्यु हुई। कभी दीर्घ जीवन की अवधि देख आश्चर्य होता। साथ में रहता उनकी सन्तान, पत्नी, जनक-जननी का नाम और कभी कोई सुन्दर-सी कविता। उसी में वह नाम अचानक दिख गया था।

‘‘मिस्टर प्रिय दामले,
मृत्यु, धैर्य से भोगी गई लंग कैंसर की दीर्घ व्याधि से
जन्म: 17 नवम्बर, 1921, मृत्यु: 5 अप्रैल, 1983,
दयालु परम पिता की बाँहों में
दाई विल बी डन।
मारग्रेट दामले के परमप्रिय पति
टोनी और नेली के स्नेहशील पिता
कृपया फ्यूनरल में पुष्प न लाएँ, चैरिटी चेक इस पते पर भेजें...’’

कैंसर सोसायटी का नाम-पता देकर, उस चर्च का भी पता, समय दिया गया था जहाँ सर्विस होगी। ट्यूब स्टेशन मेरे घर के पास ही था, चाहती तो बड़े आराम से जा सकती थी। न्यूकासल था ही कितनी दूर! निश्चय ही वह प्रिया ही थी। उस जन्मतिथि को मैं कैसे भूल सकती थी, जिस तिथि को मैंने वर्षों तक उसे उपहार भेजे थे!

पर जाकर करती भी क्या वहाँ पहुँचकर क्या मैं मारग्रेट दामले से कह पाती कि उसका परम प्रिय पति कभी किसी की उतनी ही प्राणप्रिया पत्नी थी? क्या टोनी-नेली से कह पाती कि उसका स्नेही पिता किसी की उतनी ही स्नेहशीला जननी भी थी?

विधाता ने उससे निकृष्ट कोटि का परिहास किया था, अब वह स्वयं वहीं जाकर उससे निबटेगी।
प्रिया ने क्या आज तक कभी किसी से हार मानी थी?

 
 
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