Icchapuran/Icchapurti Rabindranath Tagore

इच्छापूर्ण रबीन्द्रनाथ टैगोर

सुबलचन्द्र के बेटे का नाम सुशीलचन्द्र है. लेकिन हमेशा नाम के अनुरूप व्यक्ति भी हो ऐसा कतई ज़रूरी नहीं. तभी तो सुबलचन्द्र दुर्बल थे और उनका बेटा सुशीलचन्द्र बिलकुल भी शांत नही बल्कि बहुत चंचल था.
उनका बेटा सुशील पुरे मोहल्ले को परेशान कर रखता था इसलिए कभी-कभी पिता, पुत्र को नियंत्रण में रखने के लिए भाग कर आते लेकिन पिता के पैर में गठिया का दर्द और बेटा भागता था हिरन जैसा. नतीजा थप्पड़, लात, मार कुटाई कुछ भी सही जगह पर नहीं पड़ता था. लेकिन सुशीलचन्द्र जिस दिन पकड़ में आता उस दिन उसके पिता के हाथों से बचा पाना किसी के सामर्थ्य में नहीं रहता.
आज शनिवार के दिन स्कूल में दो बजे ही छुट्टी हो जाती है लेकिन आज सुशील का किसी भी तरह स्कूल जाने का मन नही हो रहा था. इसके बहुत सारे कारण थे. पहले तो आज स्कूल में भूगोल की परीक्षा है दूसरे, मोहल्ले के बोस निवास में आज पटाखे फोड़ने का कार्यक्रम तय है. सुबह से ही वहाँ धूमधाम चल रही है. सुशील की इच्छा है आज सारा दिन वहीँ बिताये.
बहुत सोचने के बाद सुशील स्कूल जाने के समय अपने बिस्तर पर जा कर लेट गया. उसके पिता ने आकर पूछा- ‘क्या रे, इस समय बिस्तर पर पड़ा है, आज स्कूल नही जाना क्या?’
सुशील बोला, ‘मेरे पेट में मरोड़ उठ रहे है, आज मैं स्कूल नहीं जा पाऊंगा.’
पिता सुबल उसके झूठ को समझ गये, मन-ही-मन बोले, ‘रुक! आज तेरा कुछ उपाय करना ही होगा.’ सुशील से बोले, ‘पेट में मरोड़ उठ रहे है?’ फिर तो आज कहीं जाने की ज़रूरत नहीं. बोस निवास में पटाखे देखने हरि को अकेले ही भेज देता हूँ, तुम यहाँ चुपचाप पड़े रहो मैं अभी तुम्हारे लिए पाचक तैयार कर के लाता हूँ.’
सुशील के कमरे से निकल कर बाहर सांकल लगा दिया और बहुत कड़वा सा एक पाचक तैयार करने चले गये. सुशील तो अब भारी मुश्किल में पड़ गया. लेमनचूस खाना उसे जितना ही अच्छा लगता था उतना ही बुरा पाचक खाने में लगता था उसे तो अब मुसीबत नजर आने लगी थी. उधर बोस निवास जाने के लिए तो कल रात से ही उसका मन छटपटा रहा था, लेकिन....
सुबलचन्द्र जब एक बड़े से कटोरे में कड़वा पाचक ले कर कमरे में आये तो सुशील तुरंत बिस्तर से उतर गया और बोला, ‘मेरा पेट दर्द एकदम ठीक हो गया है. मैं आज स्कूल जाऊंगा.’
पिता बोलें, ‘न ना! आज जाने की ज़रूरत नहीं.तुम पाचक खा कर चुपचाप सोये रहो.’ ये बोल कर सुबलचन्द्र जबरदस्ती सुशील को पाचक खिला कर बाहर से कमरे में ताला लगा कर चले गये.
सुशील बिस्तर पर पड़े रोते-रोते सारा दिन केवल मन-ही-मन यही कहता रहा, ‘काश, मैं अगर बाबा के जितनी उम्र का होता तो कितना अच्छा होता जो मेरे इच्छा होती वही करता और कोई मुझे ऐसे कमरे में बंद कर के नहीं जा पाता.’
उसके पिता सुबल चन्द्र बाहर अकेले बठे बैठे सोच रहे थे, ‘मेरे माता पिता मुझे बहुत ज्यादा ही प्यार दुलार देते थे इसलिए मैं अच्छी तरह पढाई लिखाई कुछ भी नहीं कर पाया. काश, यदि फिर से बचपन मिल जाता तो फिर कुछ भी हो जाए पहले की तरह समय बर्बाद नही कर के , मन लगा कर पढाई करता.’
इच्छापूरण देव उस समय उनके घर के सामने से जा रहे थे. वो पिता और पुत्र के मन की इच्छा जान कर सोचने लगे. ‘अच्छा कुछ दिन इन लोगों की इच्छा पूरी कर के देखा जाये.’
ये सोच कर वो पिता से बोले, ‘तुम्हारी इच्छा पूरी होगी. कल होते ही तुम तुम्हारे बेटे की उम्र प्राप्त करोगे.’ बेटे से जा कर बोले, ‘कल होते ही तुम तुम्हरे पिता के उम्र के हो जाओगे.’ सुन कर दोनों ही बहुत खुश हो गए.
वृद्ध सुबलचन्द्र रात में ठीक से सो नहीं पाते थे भोर के वक्त थोड़ी नींद आ जाती थी. लेकिन आज पता नहीं क्या हुआ उन्हें भोर होते ही एकदम कूद कर बिस्तर से नीचे उतर आये . उन्होंने देखा कि वो बहुत छोटे हो गये है. उनके दांत जो गिर गये थे सब अपनी जगह पर आ गये हैं, दाढ़ी मूंछ सब गायब. रात में जो धोती और कुरता पहन कर सोये थे वो इतना बड़ा हो गया है की उसकी आस्तीन झूल कर ज़मीन छू रही थी. कुरते का गला छाती तक उठ आया है और धोती इतनी बड़ी की ज़मीन पर ठीक से पाँव रख कर चल भी नहीं पा रहे.
हमारे सुशील बाबू रोज उठते ही दुरात्मा की तरह दौड़ते फिरते है, लेकिन आज उनकी नींद ही नहीं टूट रही; जब अपने पिता सुबल चन्द्र के चिल्लाने की आवाज़ से उसकी नींद खुली तो देखा उसके पहने हुए कपड़े इस तरह छोटे हो कर चिपक गये हैं की उसके चीथड़े हो कर शरीर से अलग हो जायेंगे. पूरा शरीर बढ़ गया है, काले सफ़ेद दाढ़ी-मूंछ के कारण आधा चेहरा दिखाई ही नहीं देता; उसके सर पर कितने बाल थे लेकिन आज हाथ फेर कर देख रहा सामने से गंजा हो गया जो की दिन के उजाले में चमक रहा है. आज सुशील चन्द्र कई बार उठने के प्रयास में इस तरफ उस तरफ करते हुए बार बार सो जा रहा है लेकिन अंत में अपने पिता के इतनी चीख पुकार के मारे उसे उठना ही पड़ा.
दोनों के ही मन की इच्छा पूरी हुई लेकिन बहुत मुश्किलें भी खड़ी हो गयी. पहले ही बताया था कि सुशील चन्द्र की इच्छाएँ थी यदि अपने पिता की उम्र का हो जायेगा तो स्वाधीन होगा, पेड़ पर चढ़ कर तालाब में कूदेगा, कच्चे आम खायेगा, चिड़ियों के बच्चे पकड़ेगा, पूरी दुनियां घुमेगा- फिरेगा और जब इच्छा होगी घर में आ कर जो इच्छा हो वही खायेगा कोई उसे कुछ नहीं कहेगा. लेकिन आश्चर्य! उस दिन सवेरे से उसे पेड़ पर चढ़ने की इच्छा ही नहीं हुई, पानी देख कर कूदने की इच्छा तो दूर उसे लग रहा था की अगर कूदा तो उसे बुखार आ जायेगा. वो चुपचाप बरामदे में एक चटाई बिछा कर बैठ सोचने लगा.
एकबार मन में आया खेल-कूद एकदम से छोड़ देना ठीक नहीं होता, एक बार कोशिश कर के ही देखा जाये. ये सोच कर पास ही एक आमड़ा पेड़ था उसी पर चढ़ने की कोशिश करने लगा. कल तक जिस पेड़ पर वो गिलहरी की तरह झटपट चढ़ जा रहा था आज इस बूढ़े शरीर के साथ किसी भी तरह संभव नहीं हो रहा था. पेड़ की एक नाजुक डाल पर शरीर का भार देते ही वो डाल भारी शरीर का भार वहन ना कर पायी और टूट कर ज़मीन पर गिर गयी, साथ में बूढा सुशील चन्द्र भी धड़ाम से गिर पड़ा. पास के सड़क पर लोग जा रहे थे उन्होंने जब एक बूढ़े को बच्चे की तरह पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करते देखा तो हँसते हँसते बेहाल हो गये. सुशील शर्म से सर नीचा किये हुए फिर से उसी चटाई पर आ कर बैठ गया. नौकर से बोला, ‘सुनो, बाज़ार से एक रूपये का लेमनचूस खरीद लाओ.’
लेमनचूस का सुशील चन्द्र को विशेष लोभ था. स्कूल के पास के दूकान में वो रंग बिरंगे लेमनचूस सजाया हुआ देखता; दो-चार पैसे जो भी मिलते उसी से लेमनचूस खाता था. सोचता था जब पिता के जितना बड़ा हो जायेगा तब पॉकेट भर भर कर लेमनचूस खरीदेगा और जी भर कर खायेगा. आज नौकर एक रुपये में ढेर सारा लेमनचूस खरीद कर ला दिया उसी में से एक उठा कर उसने अपने दन्त विहीन मुंह में डाल कर चूसने लगा लेकिन बूढ़े मुंह में बच्चों की पसंद का लोजेंस स्वाद मुताबिक नहीं बल्कि बेस्वाद लग रहा था. एक बार सोचा ; ये सब छोटे हो गये बाबा को खिलाया जाये, लेकिन दुसरे ही पल सोचा, ‘ ना! देना ठीक नहीं होगा, ये सब खा कर तबियत ख़राब हो जाएगी.
कल तक जो लड़के छोटे सुशील चन्द्र के साथ कबड्डी खेलने आते थे आज वो बूढ़े सुशील चन्द्र को देख छिटक कर दूर चले गये.
सुशील सोचा करता था पिता की तरह आज़ाद होने पर वो सारा दिन अपने लड़के-दोस्तों के साथ डू-डू आवाज़ करते हुए कबड्डी खेलता रहेगा. लेकिन आज राखाल, गोपाल, निवारण,अक्षय, हरीश को देख कर मन-ही-मन खीज उठा, सोचा, अभी चुपचाप यहाँ बैठा हूँ अभी लड़के आयेंगे और अचानक ही हुडदंग मचाने लगेंगे.
पहले ही बताया है, सुबलचन्द्र अपने बरामदे में बैठ कर रोज़ सोचा करते थे मैं जब छोटा था शैतानी कर-कर के केवल समय ही बर्बाद किया है, अगर बचपन दुबारा मिल जाये तो एक बार शांत और अच्छे बच्चे की तरह सारा दिन कमरे का दरवाज़ा बंद कर के सिर्फ पढाई-लिखाई करूँगा.यहाँ तक कि शाम को दादीमाँ के पास कहानी सुनने भी नहीं जाऊंगा, रात दस-ग्यारह बजे तक प्रदीप जला कर पढाई पूरी करूँगा.
लेकिन बचपन वापस पा कर वो किसी भी तरह स्कूल जाने को तैयार नही. सुशील तंग हो कर बोलता, ‘बाबा स्कूल नहीं जायेंगे क्या?’ सुबलचन्द्र मुंह नीचे कर सर खुजाते हुए धीरे-धीरे कहते, आज मेरे पेट में मरोड़ उठ रहे हैं, आज स्कूल नही जा सकूँगा. सुशील चन्द्र नाराज़ हो कर बोला, जायेंगे कैसे नहीं? स्कूल जाते समय मेरा भी इस तरह खूब पेट दर्द हुआ है, मैं ये सब खूब जानता हूँ.’
छोटा सुशील नित नये उपाय निकाल कर स्कूल से अनुपस्थित रहता था कि इस वक्त सुबल चन्द्र का उसे झांसा देने का कोई भी उपाय व्यर्थ था.सुशील ज़बरदस्ती छोटे पिता को स्कूल भेजने लगा. स्कूल से लौट कर छोटा पिता खेलने-कूदने और उधम मचाने लग जाता लेकिन, उसी समय वृद्ध सुशील चन्द्र एक रामायण की किताब ले कर सस्वर पाठ करना आरम्भ कर देते. सुबल चन्द्र के उधम मचाने के कारण वृद्ध पुत्र के पढने में व्यवधान उत्पन्न होता था इसलिए छोटे पिता को नियंत्रण में रखने के लिए उसे एक स्लेट पकड़ा देता जिसमें बहुत कठिन-कठिन गणित के सवाल होते. इतने कठिन सवालों में से एक ही हल करने में छोटे पिता का एक घंटा निकल जाता. शाम को बूढ़े सुशीलचन्द्र के कमरे में और कई बूढ़े मिल कर शतरंज खेला करते. उस समय सुबलचन्द्र को ठंडा रखने के लिए सुशीलचन्द्र ने एक मास्टर रख दिया, मास्टर रात दस बजे तक उसे पढ़ाता रहता.
भोजन के विषय में सुशील बड़ा कडक था ,क्योंकि उसके पिता सुबलचन्द्र जब वृद्ध थे उन्हें अपना खाना ठीक से हजम नहीं होता था, थोडा सा भी ज्यादा खा ले तो खट्टे डकार आने लगते थे —ये बात सुशील चन्द्र को अच्छी तरह याद थी इसीलिए वो अपने पिता को कैसे भी अधिक खाने नहीं देता था. इधर सुबलचन्द्र के छोटे हो जाने के बाद से पेट में जैसे आग लगी रहती हमेशा ही भूख लगती जैसे पत्थर भी खाये तो हजम हो जाये ऐसी स्थिति हो गयी थी. सुशील उन्हें इतना कम खाने देता कि भूख के मारे वो छ्टपट करते. अंत में सूख कर उनके शरीर की हड्डियाँ बाहर दिखने लगी. सुशील सोचा, ज़रूर कोई गंभीर बीमारी हुई है इसलिए वो तरह-तरह की दवाइयां खिलाने लगा.
बूढ़े सुशील को भी रोज़ मुश्किलें आने लगीं. वो अपने पहले की आदत अनुसार जो भी करने जाता उसे सह्य नहीं हो रहा था. पहले मोहल्ले में कहीं भी नाटक-नौटंकी की खबर सुनता तो घर से भाग कर ठीक पहुँच जाता था, चाहे जाड़ा-बरसात कुछ भी हो. आज का सुशील ऐसा करते हुए सर्दी लग कर खांसी शरीर दर्द के साथ तीन सप्ताह के लिए बिस्तर पकड लिया. हमेशा से ही वो तालाब में नहाता है लेकिन आज भी वही करने से हाथ-पाँव में गठिया का दर्द और सुजन उभर आया, जिसकी चिकत्सा करने में छह महीने लग गये. उसके बाद से ही वो गर्म पानी से ही नहाता है और पिता सुबलचन्द्र को भी तालाब में नहाने जाने नहीं देता. पुरानी आदत मुताबिक भूल कर जब भी पलंग से कूद कर उतरने जाता तो हाथ पैर की हड्डियाँ टनटना जाती है. मुंह में एक पूरा पान ठूंस का उसे ध्यान आता है कि उसे दांत नहीं हैं, चबाने में बहुत ही कष्ट है. बाल सवांरने के लिए कंघी सर पर चलाते ही याद आता है कि सर पर तो बाल ही नहीं. जब कभी ये भूल जाता है कि वो अपने पिता की उम्र का हो गया है और पहले की तरह शैतानी करते हुए बूढी आनंदी बुआ की मटकी पर पत्थर मारने लगता तो लोग बूढ़े को बच्चों की तरह शरारत करते देख मारो-मारो, चिल्ला कर मारने दौड़ते. तब वो खुद ही संकोच में पड़ कर चुपचाप घर में घुस जाता.
सुबल चन्द्र भी कभी-कभी भूल जाता कि वो अब बूढ़ा से छोकरा हो गया है और जा कर वहां बैठ जाता जहाँ और बूढ़े लोग ताश-पासा खेल रहे होते और बूढों की तरह ही बातें करता तो वहाँ लोग उसे भगाने लगते कहते, ‘ जाओ-जाओ जा कर खेलो यहाँ बैठ कर बड़ों के बीच बड़ा बनने को चेष्टा मत करो.’ अचानक भूल कर मास्टर से भी बोल पड़ता, ‘ज़रा तम्बाकू दो तो, तलब लगी है’ सुन कर मास्टर जी उसे एक पाँव पर बेंच पर खड़ा कर देते. इसी तरह एक दिन नाई को बोला, ‘कितने दिन हो गये तू मेरी दाढ़ी बनाने नहीं आया?’नाई भी उसकी ओर देख कर जवाब दिया, ‘आऊंगा और 10 साल बीतने दो फिर आऊंगा.’ फिर कभी-कभी आदत मुताबिक जा कर अपने बेटे सुशील को पिटता तो सुशील उनसे कहता, ‘पढाई लिखाई कर के यही शिक्षा मिली है, एक रत्ती लड़का और बड़ों पर हाथ उठाना?’ वैसे आस-पास लोग जमा हो जाते और कोई थप्पड़ तो कोई डांट तो कोई समझाने लगता.
तब सुबल एकनिष्ठ हो कर प्रार्थना करने लगता, आहा! अगर मैं अपने बेटे सुशील की तरह बुढा हो जाऊं और आजाद रहूँ तो कितना ही अच्छा हो!’
इधर सुशील भी मन ही मन हाथ जोड़ कर प्रार्थना करता, ‘ हे देवता, मुझे मेरे पिता की तरह छोटा कर दो कितना अच्छा होगा मैं पहले की तरह ही खेल-कूद, घूमना-फिरना कर सकूँगा!’
पिता जी जिस तरह शैतानी करने लगे हैं उन्हें अब और मैं संभाल नही सकता. पहले ही तो अच्छा था.
तब इच्छापूरण देव आ कर बोले, ‘कैसा लग रहा है, तुम दोनों की इच्छा पूरी हुई न! शौक मिटा या नहीं?’
दोनों ही साष्टांग हो कर देवता से बोले, ‘दुहाई हो! हम जैसे थे हमें फिर से वैसा ही बना दीजिये. सब शौक मिट गये.
देवता बोले, ‘ठीक है कल सुबह नींद से जागने पर तुम दोनों पूर्ववत हो जाओगे.’
दुसरे दिन सुबल चन्द्र फिर से बूढ़े और सुशील फिर से बच्चा बन गया. दोनों को लगा जैसे कोई सपना देख कर अभी नींद से जागे हों.
सुबल चन्द्र आवाज़ भारी कर के आवाज़ लगाये, ‘सुशील, व्याकरण याद नहीं करना है.’
सुशील सर खुजाते हुए मुंह नीचा कर के बोला, ‘पिताजी, मेरी व्याकरण की किताब खो गयी है.’

(अनुवाद: रत्ना रॉय)

अनुवाद भेद: इच्छा पूर्ति रबीन्द्रनाथ टैगोर

सुबलचंद्र के लड़के का नाम सुशीलचंद्र था। लेकिन अब ऐसा तो होता नहीं है कि जैसा नाम हो, आदमी भी वैसा ही हो। ‘सुबल’ का मतलब है ‘ताक़तवर’, लेकिन वह तो कुछ दुबला-पतला ही था, और ‘सुशील’ का मतलब है ‘अच्छे स्वभाव वाला’, पर, वह तो ऐसा नहीं था।
सुशील अपनी करतूतों से पड़ोस में सभी को परेशान किये रखता था। पर, उसके पिता भी उसको कुछ नहीं कह पाते थे क्योंकि वह उनकी पकड़ में नहीं आता था। वे ठहरे गठिया के रोगी भागना-दौड़ना उनके लिए आसान न था, और सुशील था फुर्तीला, जब देखो तब चंपत हो जाता था।
वह शनिवार का दिन था, स्कूल जल्दी बंद हो जाता था। पर, सुशील स्कूल नहीं जाना चाहता था क्योंकि उस दिन क्लास टेस्ट था। इसके अलावा, वह सारा दिन शाम होने वाली पटाखेबाज़ी की तैयारी में बिताना चाहता था।
जब स्कूल जाने का समय हुआ तो उसने अपने पिता से कहा कि वह स्कूल नहीं जायेगा क्योंकि उसके पेट में दर्द हो रहा है। सुबल को पता था कि उसका पेट-दर्द कैसे भगाया जा सकता है, सो उसने कहा, ”फिर तुम घर पर ही रह सकते हो। हरि पटाखेबाज़ी देख आयेगा। मैं तुम्हारे लिए कुछ टॉफियाँ भी लाया था पर, अब तो तुम उन्हें नहीं खा सकोगे। हाँ, मैं तुम्हारे लिए कड़वी दवा ले आता हूँ!” यह कहकर उसने दरवाज़े पर ताला लगाया और बाहर चला गया।
अब सुशील अजीब उलझन में था। वह टॉफियों से जितना प्यार करता था, दवा से उतनी ही नफ़रत थी। और अब तो वह पटाखेबाज़ी देखने भी नहीं जा सकेगा।
जब सुशील के पिता कप में दवाई लेकर लौटे तो वह झट से उठ खड़ा हुआ, और बोला, ”मैं अब ठीक हूँ। मैं सोच रहा हूँ स्कूल चला जाऊँ।” उसके पिता ने उसे ज़बरदस्ती दवा पिला दी, आराम करने के लिए कहा, और फिर दरवाज़े पर ताला लगाकर चले गए।
सुशील दिन भर रोता रहा और यही सोचता रहा कि अगर मैं अपने पिता जितना बड़ा होता, तो मैं भी जो चाहे कर सकता था, और मुझे कोई कमरे में बंद नहीं कर सकता था। सुशील का पिता भी बाहर बैठा हुआ सोच रहा था, मेरे माता-पिता के लाड-प्यार ने मुझे बिगाड़ दिया था। मैंने ठीक से पढ़ाई नहीं की। अगर मुझे मेरा बचपन वापस मिल जाए तो मैं समय बिल्कुल बर्बाद नहीं करूंगा और ठीक से पढाई करूंगा।
संयोग से, इच्छा पूरी करने वाली देवी उस समय उधर से गुज़र रही थी उसने उन लोगों की इच्छाएँ सुन लीं और मन ही मन कहा, चलो थोड़ी देर के लिए इनकी इच्छाएँ पूरी कर देती हूँ, फिर देखती हूँ कि क्या होता है।
वह पिता के पास पहुँची और बोली अब से वह अपने बेटे जैसा हो जाएगा, उसी की उम्र का और बेटे से उसने कहा कि वह पिता जितनी उम्र का हो जाएगा।
सुबह-सुबह बूढ़ा सुबलचंद्र बिस्तर से उछल कर खड़ा हुआ। उसने पाया कि उसका शरीर छोटा-सा हो गया है, मुँह के सारे दाँत आ गए हैं। रात को उसने जो कपड़े पहने थे, वे उसके लिए बहुत ढीले और बड़े हो गए हैं। नतीज़ा यह था कि उसकी धोती नीचे घिसट रही थी और उसका चलना-फिरना मुश्क़िल हो रहा था।
उधर सुशीलचंद्र जो सुबह उठते ही शरारतें शुरू कर देता था, इस सुबह बिस्तर से उठ भी नहीं सका। अंत में उसके पिता की चीख-चिल्लाहट ने उसे उठने पर मजबूर कर दिया। उसके कपड़े इतने तंग हो गए थे कि पहने नहीं जा रहे थे। उसके सफेद दाढ़ी-मूछ उग आई थीं, और उन्होंने उसके चेहरे को आधा ढँक लिया था, उसके घने बालों की जगह, उसका सिर एक चमकता हुआ-सा सफाचट मैदान हो गया था।
दोनों की इच्छाएँ पूरी हो चुकी थीं, लेकिन इस बदलाव से बहुतेरी गड़बड़ियाँ होनी शुरू हो गई थीं। सुशील अपने पिता की तरह बनना चाहता था जिससे कि वह जो भी चाहे कर सके। उसने सोचा था कि वह पेड़ों पर चढ़ेगा, तालाब में छलांग लगाएगा, हरे-कच्चे आमों का स्वाद लेगा, और बस इधर-उधर घूमता फिरेगा। लेकिन अचरज की बात यह थी कि उस सुबह इनमें से कुछ भी करने का मन नहीं हो रहा था। इनकी जगह, वह बरामदे में एक चटाई बिछाकर न जाने क्या सोचता हुआ बैठा रहा।
फिर उसके ध्यान में यह बात आई कि उसे खेलना-कूदना बिल्कुल छोड़ नहीं देना चाहिए, और उसने पेड़ पर चढ़ने की कोशिश की। एक दिन पहले इस पेड़ पर वह गिलहरी की तरह चढ़ गया था, लेकिन आज तो वह चढ़ ही नहीं पाया। उसने एक कच्ची डाल को पकड़ कर चढ़ना चाहा, पर वह डाल ही टूट गई और वह ज़मीन पर धम्म से गिर पड़ा। उधर से गुज़र रहे लोग उस बूढ़े को बच्चों जैसी हरकतें करते देखकर हँसने लगे। सुशील बिल्कुल जड़ हो गया, वह चटाई पर आकर बैठ गया, और उसने नौकर को पुकार कर कहा,”जाओ मेरे लिए एक रुपये की टॉफियाँ ले आओ।”
सुशील को टॉफियाँ हमेशा से पसंद थीं। जब भी उसके पास पैसे होते वह स्कूल के पास वाली दुकान से टॉफियाँ ख़रीदता था।
उसकी यह इच्छा थी कि जब उसके पास पिता जितना पैसा रहा करेगा तो वह टॉफियों से अपनी जेबें भर लेगा। नौकर उसके लिए पूरे एक रुपये की टॉफियाँ ले आया। उसने एक अपने पोपले मुँह में रखी और उसे चूसने लगा। लेकिन वह तो बूढ़ा था और बच्चों वाली मीठी चीज़ें अब उसे इतना पसंद नहीं आती थीं। उसने सोचा, चलो मैं इन्हें अपने बालक पिता को दे देता हूँ। लेकिन फिर उसने सोचा कि यह ठीक नहीं रहेगा, अगर उसने ज़्यादा टॉफियाँ खा लीं तो वह बीमार पड़ सकता है।
सभी लड़के जो कल तक सुशील के साथ खेल-खेला करते थे उसे बूढ़े के रूप में देखकर भाग खड़े हुए।
सुशील ने सोचा था कि अगर वह अपने पिता की तरह अपनी मर्ज़ी का मालिक़ बन जाएगा, तो वह अपने दोस्तों के साथ दिन-दिन भर खेला करेगा। लेकिन आज अपने दोस्तों की ओर देखकर उसे खीझ हुई। उसे लगा, मैं तो यहाँ शांति से बैठा हुआ हूँ और ये धमाचौकड़ी मचाने के लिए आ गए हैं!
पहले चटाई पर बैठा हुआ सुशील इस बात को लेकर चिंता कर रहा था कि अपने बचपन में पढाई-लिखाई न करके उसने कितना समय बर्बाद किया है, और अगर उसे बचपन वापस मिल जाए तो वह अपनी भूल सुधार लेगा।
लेकिन अब, जब सुबल की इच्छा पूरी हो गई थी तो स्कूल जाने के ख्याल मात्र से उसे कँपकँपी छूटने लगती थी। जब कुछ ग़ुस्से से भरा हुआ सुशील उससे आकर कहता, ”पिताजी, क्या आप स्कूल नहीं जा रहे हो?” तो सुबल अपना सिर खुजाने लगता था और कहता था, ”मेरे पेट में दर्द हो रहा है।”
सुशील इस पर खीझ उठता था, और कहता था- ”स्कूल न जाने के ये सारे बहाने मुझे मालूम हैं। मैं भी ऐसे ही बहाने बनाता था।”
सचमुच, सुशील को ये सब बातें इतनी अच्छी तरह पता थीं कि उसके पिता की सारी बहानेबाज़ी सुशील के आगे बेकार हो जाती। और सुशील अपने नन्हें पिता को स्कूल जाने के लिए मजबूर कर देता। जैसे ही सुबल स्कूल से लौटता, बूढ़ा सुशील ज़ोर-ज़ोर से रामायण का पाठ शुरू कर देता और सुबल को सामने बैठाकर उससे कहता कि वह सवाल हल करे।
शाम को दूसरे बुज़ुर्ग लोग सुशील के पास शतरंज खेलने के लिए आ जाते, सुशील ने, उसी समय सुबल को पढ़ाने के लिए एक ट्यूटर रख दिया, और उसकी कोचिंग देर रात तक चलती रहती।
सुशील को यह भी पता था कि जब उसका पिता बूढ़ा था तो ज़्यादा खा लेने पर उसका पेट ख़राब हो जाता था। इसलिए वह उसे अधिक खाना नहीं खाने देता था। लेकिन इस वक़्त तो सुबल जवान था और ख़ूब भूख लगती थी। वह तो कंकड़-पत्थर भी पचा सकता था। उसे जितना खाने को मिलता था वह बहुत कम था। वह क़ाफ़ी दुबला हो गया और उसकी हड्डियाँ निकल आईं। इससे सुशील को यह लगा कि कहीं वह बीमार तो नहीं हो गया है और उसने उसे कई तरह की दवाएँ और टॉनिक देना शुरू कर दिया।
बूढ़े सुशील को भी कई तरह की समस्याएँ झेलनी पड़ रही थीं। वह लड़कों जैसी जो भी चीज़ें करना चाहता था, अब कर नहीं पाता था। पहले वह किसी नाटक को छोड़ता नहीं था। लेकिन अब अगर वह नाटक देखने जाता तो उसे ठंड लग जाती, वह ज़ुख़ाम-खाँसी से परेशान हो जाता, और शरीर में ऐसी पीड़ा होती कि उसे कई हफ़्तों तक बिस्तर पर रहना पड़ता। वह हमेशा तालाब में ही नहाया करता था। लेकिन अब अगर वह ऐसा करता तो उसके जोड़ों का दर्द बढ़ जाता और ठीक होने में छह महीने लग जाते। इसलिए उसने हर दो दिन बाद नहाना शुरू कर दिया था, वह भी गरम पानी से, और सुबल को भी वह तालाब में नहाने नहीं देता था। अब अगर सुशील बिस्तर से उछल पड़ता था तो उसे हड्डियों का दर्द शुरू हो जाता था और अगर वह पान खा लेता तो पता चलता कि पान को चबाने वाले दाँत तो हैं ही नहीं। अब अगर वह पुरानी आदत के अनुसार आनंदी चाची के मिट्टी के घड़े को पत्थर से फोड़ देना चाहता तो लोग उसकी इस बचकानी हरक़त के लिए उसे फटकारने आ जाते। वह यह नहीं समझ पाता था कि स्थिति को कैसे संभाले!
कई बार सुबलचंद्र यह भूल जाता कि वह तो लड़का है। अपने को पहले जैसा बूढ़ा मानकर वह वहाँ पहुँच जाता जहाँ बुज़ुर्ग लोग बैठे ताश या चौपड़ खेल रहे होते थे, और बड़ों की तरह की बातें करने लगता था। वे लोग उसका कान उमेठ देते और कहते, ”बहुत हुई तुम्हारी बदमाशी, अब जाकर खेलो।”
किसी मौक़े पर वह अपने शिक्षक से कहता, ”मुझे हुक्का दीजिए, मैं पानी पीना चाहता हूँ।” शिक्षक उसे बिल्कुल ही वाहियात लड़का समझकर, उसे बेंच पर खड़े रहने की सज़ा देते।
अगर वह नाई से इस बात की शिक़ायत करता कि वह दस दिन से उसकी दाढ़ी बनाने क्यों नहीं आया, तो नाई पलटकर कहता, ”मैं दस साल बाद आऊंगा।”
पुरानी आदत की मुताबिक़ कई बार वह सुशील को सबक सिखाने के लिए मार भी बैठता। सुशील ग़ुस्से से भर उठता, और चिल्ला कर कहता,”तुम्हें बूढ़े आदमी को मारने की हिम्मत कैसे हुई? क्या तुम्हें स्कूल में यही सिखाया जाता है?” लोग आकर बीच-बचाव करते और उसके बेहूदा व्यवहार के लिए उसे झाड़ देते।
अंत में सुबल ने ज़ोर-ज़ोर से यह मनाना शुरू कर दिया कि मैं अपने लड़के सुशील जैसा बूढ़ा हो जाऊँ और जो कुछ चाहूँ अपनी इच्छा से कर सकूँ।
इस तरह सुशील भी यह प्रार्थना करने लगा- ”हे! ईश्वर, मुझे फिर से अपने पिता की तरह जवान बना दो, जिससे कि मैं जी भरकर खेल सकूँ। मैं अपने पिता को अपने वश में नहीं रख पा रहा। मुझे इस बात की चिंता बनी रहती है कि न जाने वह कब कौन-सी शरारत कर बैठें!”
इच्छा देवी फिर उनके सामने उपस्थित हुई, और उसने पूछा- ”क्या तुमने अपनी इच्छाओं का मज़ा पूरी तरह से ले लिया है?” उन दोनों ने सिर झुकाकर देवी को प्रणाम किया और बोले- ”माँ, बहुत हो चुका। अब हमें पहले जैसा बना दो।”
इच्छा देवी ने कहा, ”ठीक है। कल सुबह से तुम दोनों फिर पहले जैसे हो जाओगे।”
अगली सुबह, सुबल बूढ़े के रूप में ही उठा, और सुशील ने पाया कि वह पहले जैसा लड़का बन गया है। उन दोनों को लगा जैसे उन्होंने कोई सपना देखा था। सुबल ने गंभीरतापूर्वक कहा, ”क्या तुम व्याकरण का पाठ याद नहीं करोगे?”
सुशील ने अपना सिर खुजलाते हुए कहा, ”पिताजी, मेरी किताब खो गई है।”

 
 
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