Gonu Jha Ki Kahaniyan : (Maithili Story)

गोनू झा की कहानियाँ (मैथिली कहानी)

गोनू झा का जन्म १४ वी शताब्दी में दरभंगा बिहार (मिथिलांचल) के भरवारा गाँव में हुआ था । उनके बारे में कई किद्वान्तिया है । वे चुटकियों में समस्याओं को सुलझा देते थे। उनके चुटकुले सुनकर लोग लोटपोट हो जाते थे।उन्हें मिथिला में वही सम्मान प्राप्त था जो दक्षिण में तेनालीराम और उत्तर भारत में बीरबल को प्राप्त था । चतुराई और बुद्विमता के प्रतीक गोनू झा समाज के हर तबके में लोकप्रिय हैं । गोनू झा के करिश्माई कारनामों और कहानियों को मिथिला में घर-घर सुनाये जाते है ।

1. गोनू झा मरे! गांव को पढ़े!!

ये कहानी गोनू झा के गांव की है। उनके गांव में भी बहुत बड़े वाले रहिते थे। कई लोग उनकी चालाकी से जलते थे, मगर मुंह पर उनके ‘पंखे’ बने फिरते थे। गोनू की छट्ठी बुद्धि को शक था कि ई लोगों के प्यार में कुछ झूठ छिपा है। ऊ बहुत दिन से गांव-घर के लोगों के अनमोल प्यार की परीक्षा लेने का पिलान बना रहे थे। अगर बात सिर्फ गांववालों की होती, तो गोनू अपनी जुगाड़ टेक्नॉल्जी से उन्हें तुरंत फिट कर देते। मगर उन्हें तो अपने घरवालों की बातों में भी मिलावट की बास आती थी। तो उन्होंने सोचा कि क्यों न सबको एक बरी चेक किया जाए।

बहुत सोच-विचार के गोनू एक दिन सुबह उठबै नहीं किए। सूरज चढ़ गया छप्पर पर, मगर गोनू झा बिछौना नहीं छोड़े। ओझाइन को जरा अंदेशा हुआ। गईं। जगाया तो ई का… आहि रे दैय्या… रे बाप रे बाप…!!! झा जी के मुंह से तो गाज-पोटा निकला हुआ था और बेचारे बिछौना से नीचे एगो कोना में लुढ़के पड़े थे। ओझाइन तो लगीं कलेजा पीटकर वहीं चिल्लाने। बेटा भी मां की आवाज सुन कर बाबू के कमरे में आया। नजारा देखकर ऊका कलेजा भी दहल गया। उहो लगा फफक-फफक कर रोये।

इधर ओझाइन कलेजा पर दुहत्थी मार-मारकर चिंघाड़ रही थीं, उधर बेटा कहे जा रहा है कि हमारा सब कुछ कोई ले ले, बस हमरे बाबूजी को लौटा दे। ई महादुखद खबर सुनकर गोनू से उनके मरने पर अपने खर्चा पर गंगा भेजने का वादा करने वाले मुखिया भी पहूंच गए। गोदान का भरोसा दिलाने वाले सरपंच बाबू भी। लगे दुन्नो जने झा जी के बेटा को समझाए। “आ।।हा…हा…! बड़े परतापी आदमी थे। पूरे जवार में कोई जोर नहीं। अब विध का यही विधान था।’

उधर जिंदगीभर झा जी का चिलमची रहा अकलू हज्जाम औरत महाल में ज्ञान बांट रहा था। ‘करनी देखो मरनी बेला! देखा… गोनू झा जैसे उमिर भर सबको बुड़बक बनाते रहे, वैसा ही चट-पट में अपना प्राण भी गया। सारा भोग बांकिए रह गया।’ सरपंच बाबू ओझाइन को दिलासा दिए, ‘झा जी बहुत धर्मात्मा आदमी थे। सीधे सरग गए हैं। अब इनके पीछे रोने-पीटने का कौनो काम नहीं है। कुछ रुपैय्या-पैसा रखे हैं तो गोदान करा दीजिये। बैकुंठ मिलेगा।’

उधर मुखिया जी गोनू के बेटे को बोले, ‘जल्दी करो भाई, घर में लाश ज्यादे देर तक नहीं रहना चाहिए। ऊपर से मौसम भी खराब है। प्रभुआ और सीताराम को तुम्हरे गाछी में भेज दिया है पेड़ काटने। जल्दी से ले के चलो।’ फिर दो आदमी झा जी को पकड़कर कमरे से बाहर निकालने लगे, लेकिन गोनू झा की कद-काठी जितनी बड़ी थी, उनके घर का दरवाजा उतना ही छोटा था। अपना जिनगी में तो झा जी झुककर निकल जाते थे, लेकिन अभी लोग बाहर करिए नहीं पा रहे थे। तभी मोहन बाबू कड़ककर बोले, ‘अरे सुरजा बढ़ई को बुलाओ। दरवाजा काट देगा।’

सूरज तुरंत औजार-पाती लेकर हाजिर भी हो गया। तभी झा जी का बेटा बोल पड़ा, ‘रुको हो सूरज भाई! बाबू जी तो अब रहे नहीं। ऊ बड़ा शौक से ई दरवाजा बनवाये रहे। ई का काटे से ऊ की आत्मा को भी तकलीफ होगा। अब तो ऊ दिवंगत होय गए। शरीर तो उनका रहा नहीं। सो उनका पैर बीच से काटकर छोटा कर देयो। फिर आराम से निकल जाएंगे।’

‘हूं’ करके सूरज बढ़ई जैसे ही झा जी के घुटना पर आरी भिड़ाया कि गोनू झा फटाक से उठकर बैठ गए और बोले, ‘रुको! अभी हम मरे नहीं हैं। ऊ तो हम तुम सब लोगों का परीक्षा ले रहे थे कि मुंह पर ही खाली अपने हो कि मरे के बाद भी।’ अब तो सरपंच बाबू, मुखिया जी, अकलुआ हज्जाम, सूरज बढ़ई और उनका अपना बेटा… सब का मुंह बसिया जलेबी की तरह लटक गया। आखिर सबकी कलई जो खुल गई थी। गोनू झा तो नकली मर के असली जी गए, लेकिन तभी से ई कहावत बन गया कि ‘गोनू झा मरे! गांव को पढ़े!!’ मतलब बुरे वक्त में ही हित और अहित की पहचान होती है।

2. गोनू झा की बिल्ली वाली कहानी

एक बार मिथिला राजा ने अपने दरबारियों की बुद्धि की परीक्षा लेने की सोची। राजा ने सभी को कहा एक-एक बिल्ली देता हूं। बिल्ली को दुध पिलाने के लिए एक भैंस भी देता हूं। इन दोनों को आप अपने घर ले जाइए और बिल्ली को खूब खिलाइए-पिलाइए। एक साल बाद जिसकी बिल्ली सबसे मोटी होगी, उसे इनाम दिया जाएगा।

सभी दरबारी भैंस और बिल्ली लेकर अपने घर आ गए। बिल्ली को खूब खिलाने-पिलाने लगे। गोनू झा भैंस को खूब खिलाते थे और भैंस भी खूब दूध देती थी, पर सारा दूध बिल्ली पी जाती थी। गोनू झा को ये बात अखरने लगी। सोचे कि भैंस को इतनी मेहनत से खिलाते हैं और सारा दूध बिल्ली पी जाती है। लेकिन, बिल्ली को दूध नहीं पिलाया तो बिल्ली पतली हो जाएगी। राजा उन्हें दंड देंगे। सोचे कि कुछ ऐसा उपाय करते हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

गोनू के दिमाग में एक उपाय आया। उन्होंने एक कटोरे में उबला दूध रखा और बिल्ली को बुलाया। बिल्ली ने जैसे ही कटोरे से मुंह लगाया, उसका मुंह जल गया और वो वहां से फटाक से भाग निकली। ये सिलसिला तीन-चार दिनों तक चला। अब बिल्ली का ये हाल हो गया कि कटोरा देखकर ही भाग जाती थी।

इसी तरह एक साल बीत गया। राजा ने अपने सभी दरबारियों को बुलवाया। सबकी बिल्ली मंगवाई गई। सबकी बिल्लियां मोटी-ताजी थीं, लेकिन गोनू झा की बिल्ली दुबली-पतली थी। राजा ने गोनू झा से इसका कारण पूछा। वो बोले, ‘महाराज, इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। मेरा तो भाग्य ही खोटा है। मेरी बिल्ली तो दूध पीती ही नहीं।’ राजा भौंचक्के रह गए ये सुनकर कि बिल्ली दूध नहीं पीती है। राजा ने कहा कि आप मुझे ठग रहे हैं। गोनू झा ने तपाक से कहा, ‘महाराज, आप चाहें तो जांच कर सकते हैं।’ तुरंत एक कटोरा दूध लाया गया। दूध देखते ही बिल्ली भाग गई। कई बार लोगों ने कोशिश की पर बिल्ली नहीं मानी। फिर एक थाली भात लाया गया तो बिल्ली ने भात झट से खा लिया।

राजा गोनू की चालाकी समझ गए। बोले, ‘मैं समझ गया कि गोनू झा बुद्धि के तेज हैं और इन्होंने बिल्ली के साथ कुछ करामात किया है।’ राजा ने गोनू झा से कहा ‘आप अपनी परीक्षा में सफल हुए, लेकिन दरबार ये जानना चाहता है कि आपने ऐसा क्या किया और क्यों किया, जिससे बिल्ली दूध देखते ही भागने लगती है।’ गोनू झा ने सारी बात राजा को बता दी। राजा गोनू झा की बुद्धि के कायल हो गए। उनको दान विभाग का अध्यक्ष बना दिया गया। सारे दरबारी उनकी तारीफ करने लगे।

3. गोनू झा की चतुराई

मिथिला नरेश की सभा में उनके बचपन का मित्र परदेश आया था। नरेश उन्हें अपने अतिथि कक्ष में ले गए। उन्होंने अपने मित्र की खूब आवभगत की। अचानक मित्र की नजर दीवार पर लगे एक चित्र पर गई, चित्र खरबूजे का था।
मित्र बोला - कितने सुंदर खरबूजे हैं। वर्षों से खरबूजे खाने को क्या, देखने को भी नहीं मिले। अगले दिन मित्र ने यही बात दरबार में दोहरा दी।
मिथिला नरेश ने दरबारियों की तरफ देखकर कहा- क्या अतिथि की यह मामूली-सी इच्छा भी पूरी नहीं की जा सकती?
सारे दरबारी, मंत्री, पुरोहित खरबूजे की खोज में लग गए। बाजार का कोना-कोना छान मारा। गांवों में भी जा पहुंचे। गांव वाले उनकी बात सुनकर हंसते कि इस सर्दी के मौसम में खरबूजे कहां।
जब सब थक गए तो एक दरबारी ने व्यंग्य से कहा- महाराज, अतिथि की इच्छा गोनू झा ही पूरी कर सकते हैं। सच है इनके खेतों में इन दिनों भी बहुत सारे रसीले खरबूजे लगे हैं।
मिथिला नरेश ने गोनू झा की तरफ देखा। नरेश की आज्ञा मानते हुए गोनू झा ने कुछ दिन का समय मांगा फिर कुछ उपाय सोचते हुए दरबार से चले गए।

कई दिन बीतने पर भी गोनू झा दरबार में नहीं आए। पुरोहित ने कहा- कहीं डरकर गोनू झा राज्य छोड़कर तो नहीं चले गए।
एक सुबह जब मिथिला नरेश अपने मित्र के साथ बाग में टहल रहे थे तो गोनू झा कई सेवकों के साथ आए।सबने मिथिला नरेश को प्रणाम किया। सेवकों के साथ लाए टोकने जमीन पर रख दिए। उसमें खरबूजे थे।

यह देख नरेश खुश हो उठे। उनके मित्र ने कहा कि आज वर्षों बाद इतने अच्छे खरबूजे देख रहा हूं।मिथिला नरेश ने सेवकों से छुरी और थाली लाने को कहा तो गोनू झा बोले- क्षमा करें महाराज, हमारे अतिथि ने कहा था कि वर्षों से खरबूजे नहीं देखे इसलिए ये खरबूजे खाने के लिए नहीं, देखने के लिए हैं। ये मिट्टी के बने हैं। नरेश सहित सभी दरबारी गोनू झा की चतुराई पर दंग रह गए। गोनू झा की चतुराई पर मित्र भी जोर से हंसा- वाह गोनू झा, समझो हमने खरबूजे देखे ही नहीं, खा भी लिए।

मि‍थिला नरेश ने गोनू झा को उसकी चतुराई के लिए ढेर सारा इनाम देते हुए उसको शाबाशी दी कि तुम सचमुच इस दरबार के अनमोल रत्न हो, तुम्हारी सूझबूझ से आज मेरे मित्र की इच्‍छा पूरी हो सकी।

4. गोनू झा की कुश्ती

एक बार मिथिला के राजदरबार में दिल्ली का एक पहलवान आया।
वह सात फुट ऊँचा भारी डील-डौल वाला, मजबूत शरीर वाला पहलवान था जिसकी बांहों की मछलियां देखते ही बनती थी।
मिथिलानरेश कला के बहुत प्रेमी थे। पहलवान को दरबार में बड़े आदर के साथ लाया गया।
महाराज ने उसका स्वागत किया।
मिथिला नरेश! पहलवान गर्वीली वाली में बोला - मैं दिल्ली से आया हूँ और मेरा नाम ज्वालासिंह है।

दिल्ली में मेरे मुकाबले का कोई भी पहलवान नहीं है। मैं आसपास के राज्यों के सभी पहलवानों को कुश्ती में पछाड़ चुका हूँ और अब मिथिला आया हूँ। मैंने सुना है कि आपके राज्य में एक से बढ़कर एक मल्ल है।
तनिक मैं भी तो देखू कि मुझे कोई टक्कर दे सकता है या नहीं।
मल्ल ज्वालासिंह, हमें यह जानकर तो ख़ुशी हुआ कि तुम्हें अपनी शक्ति का घमंड है।
तुम यह क्यों भूल जाते हो कि संसार में हर कला का एक से बड़ा एक मर्मज्ञ पाया जाता है।
मिथिला नरेश ने कहा।

महाराज द्वंद्वकला में मुझे आज तक कोई ऐसा नहीं मिला जो मुझे पराजित कर सके। ज्वालासिंह बोला। अवश्य ऐसी ही बात होगी पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि तुम कभी भी पराजित नहीं हो सकते . मुझे तो यही लगता है। फिर ठीक है कल प्रातः अखाड़े में तुम्हारी भुजाओं की शक्ति और पैतरों का आकलन होगा। मिथिला नरेश ने कहा। और अगले दिन अखाड़े में ज्वालासिंह गरज रहा था।
मिथिला के कई मल्ल उससे द्वंद्वयुद्ध को तैयार थे। राजा के आते ही पहली कुश्ती शुरू हो गई।
ज्वालासिंह वास्तव में गजब का पहलवान था। उसने क्षण भर में प्रतिद्वंद्वी को चित कर दिया।
और उसके बाद तो मिथिला के चार और पहलवान उसके सामने घुटने टेक चुके थे।
अब मिथिला सम्मान खतरे में था। राजा चिंतित थे। उसे दिन ज्वालासिंह को राजा की आज्ञा से शाही मेहमान बनाकर भांति-भांति का भोजन कराया गया।
दूसरे दिन तो और भी गजब हुआ। मिथिला का कोई भी मल्ल ज्वालासिंह से भिड़ने को तैयार ही नहीं था। अब महाराज समझ गए कि मिथिला का सम्मान कोई नहीं बचा सकेगा।
उनके चेहरे पर उदासी छा गई और वह सब दरबारियों की तरफ देखने लगे।

क्या मिथिला में कोई ऐसा मल्ल नहीं जो ज्वालासिंह के दर्प को चूर-चूर कर सके। क्या हमने अपने मल्लों को व्यर्थ ही घी-दूध आदि खिलाया है। इस प्रकार तो मिथिला का सम्मान नहीं बचेगा।
दरबार में गोनू झा भी थे। उन्हें महाराज की उदासी देखकर अच्छा नहीं लगा। अब उन्हें कुछ सोचना होगा।
महाराज, मैं ज्वालासिंह से मल्ल्युद्ध करूंगा। गोनू झा गरजकर बोले - यद्यपि यह मेरा क्षेत्र नहीं है क्योंकि मैं बचपन में कुश्ती लड़ता था तो मुझ पर कोई जिन्न सवार हो जाता था।

प्रतिद्वंद्वी के हाथ-पैर टूट जाते थे। तन घरवालों ने मुझे कुश्ती लड़ने से रोक दिया। फिर बहुत दिनों बाद एक ज्योतिषी ने मुझे बताया कि मेरे हाथों में मानहत्या की रेखा है जो कभी लड़ते-भिड़ते मेरे हाथों होगी।
इसलिए मैं द्वंद्व नहीं करता पर आज बात मिथिला के सम्मान की है तो मैं अवश्य लडूंगा।
ज्वालासिंह भौंचक्का-सा उस कमजोर से आदमी को देख रहा था जो इतनी गरज के साथ चुनौती स्वीकार कर रहा था।
महाराज समझ गए कि गोनू झा बुद्धि का कोई प्रयोग करके उस पहलवान का गर्व चूर करना चाहता है।
हाँ भाई ज्वालासिंह। गोनू झा बोले - कुश्ती के तो विद्वान हो और सैकड़ों कुसगतियाँ जीती भी होगी। कुश्ती की सरगम तो जानते होंगे।
स....... सरगम! ज्वाला सिंह अचकचाया।
अरे, सरगम नहीं जानते कुश्ती की ? कैसे पहलवान हो ?

जानता हूँ न ! सब जानता हूँ। ज्वाला सिंह को कहना पड़ा। भरे दरबार में वह कैसे कह देता कि वह मल्ल होकर भी कुश्ती की सरगम नहीं जनता। होती होगी कोई ऐसी चीज। उसे क्या ? उठाकर दे मारेगा।
तो फिर कल हमारी कुश्ती पंचम स्वर, द्रुत लय और पटक ताल से होगी।
साथ ही कालभैरब राग में होगी। गोनू झा बोले।

ज्वाला सिंह ने सहमति में सिर तो हिला दिया पर उसका दिल लरज उठा। उसने आज तक उस तरिके से कुश्ती न लड़ी थी, जिस तरीके से उसका प्रतिद्वंद्वी बता रहा था वह तो एक भी न जानता था।
ज्वाला सिंह इसी उधेड़बुन में था। रात्रि का भोजन करने के बाद आराम कर रहा था कि दरबारी बोला-कल तो वास्तव में मजा आ जाएगा।
असली कुश्ती तो कल ही देखने को मिलेगी। गोनू झा पटक ताल में जरा कच्चे हैं पर द्रुत लय में उनका जवाब नहीं .आप पलक भी न झपकेंगे कि आपकी रीढ़ की हड्डी में दरार पद जाएगी। क्या गजब का पैंतरा है उनका।
ज्वाला सिंह ने होंठो पर जुबान फिराई।
आपने कहाँ सीखी यह मल्ल विद्या ? दरबारी ने पूछा।
दिल्ली से ही।

हूँ। दिल्ली में दांव-पेंच तो सब सिखाए जाते हैं। पर जब तक लय, ताल का पता न चले तो क्या सीखा। गोनू झा तो राग काल भैरब के उस्ताद हैं। और काल भैरब तो आप खुद जानते हैं बड़े ही क्रोधी मल्ल है।
ज्वाला सिंह को तो कुछ सूझ ही नहीं रहा था ।
अब..... मुझे आराम करने दो। वह दरबारी से बोला - प्रातः जल्दी जागना है।
दरबारी हँसता हुआ वहां से चला गया।
सुबह अखाड़े में गोनू झा शेर की भांति गरज रहे थे। चारों तरफ भीड़ का कोलाहल था।
मिथिला नरेश अपनी गद्दी पर बैठे थे। पर दिल्ली के पहलवान ज्वाला सिंह का कहीं अता-पता नहीं था। सारे मिथिला में खोजने पर भी वह कहीं नहीं मिला।
महाराज समझ गए, गोनू झा को विजेता घोषित कर दिया गया और ढेरों पुरस्कारों से नवाजा गया।
महाराज के पूछने पर गोनू झा ने हँसते हुए बताया कि उन्होंने ज्वाला सिंह को सुर, लय, ताल की उलझन में तो डाल ही दिया था।
रात को एक विश्वस्त दरबारी द्वारा उसे इतना भयभीत कर दिया गया कि उसने भाग जाने में ही भलाई समझी।
महाराज प्रसन्न हो गए। मिथिला का सम्मान जो बच गया था।

5. गोनू झा और सच्ची गप्प

बात उन दिनों की है जब गोनू झा राजदरबार में नियुक्त नहीं हुए थे। तब वह गांव में खेती-बाड़ी करते थे और उनकी आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी। वह अपनी बुद्धि के प्रयोग से ही सारा काम करते थे। जैसे-तैसे घर-गृहस्थी का पालन-पोषण होता था। उनके गांव में भी हीरन और फीरन नाम के दो ठग थे। वे दोनों अधिक मशहूर तो नहीं थे पर दांव पड़ने पर वह किसी को भी चूना लगा देते थे। अधिकतर लोग तो उनसे बात करने से भी परहेज रखते थे पर कई बार कोई न कोई फंस ही जाता था।

एक बार गोनू झा को कुछ पैसे की आवश्यकता हुई तो वह घर से धान लेकर बाजार गए। धान बेचकर उन्हें एक सौ बीस रुपए मिले। उन्हें सौ रुपए की आवश्यकता थी तो बीस रुपया उन्होंने खर्च कर लेने का विचार किया। सब जानते हैं कि गोनू झा मिठाई के कितने शौकीन थे। जब वह मिठाई खाते तो भरपेट खाते थे। आज भी उन्होने इसी विचार से तीन सेर मिठाई तौलकर ले ली। अभी वह मुड़े ही थे कि सामने हीरन-फीरन खड़े थे।

"प्रणाम पंडित जी!" दोनों ने कहा-"आज तो पैसे का सहारा लगता है।" है तो सही। धान बेचकर आया हूं।"
"अच्छा! गांव चल रहे हैं। हम बैलगाड़ी से आए हैं। आप भी बैठकर चल पड़े। रास्ते में बातें करते चलेंगे।"
"और मिठाई भी खा लेंगे।"
'मिठाई तो खा लेना। पर यह तो बताओ कि तुम दोनों बैलगाड़ी लेकर बाजार में क्यों आए थे।" गोनू झा ने पूछा।
"अब आपसे क्या छुपाना पंडित जी।" हीरन ने कहा-"रात भर खेतों से धान की बालें बीन-बीनकर दो महीने में दो बोरी धान इकट्ठे किए थे। आज उन्हें बेचकर आ रहे हैं।"
"अच्छा! चलो तो अब चलते हैं।"

तीनों जने बैलगाड़ी में बैठ गए। गोनू झा खुले दिल के आदमी थे। मिठाई खोलकर रख दी तो हीरन-फीरन जुट गए। गोनू झा ने भी अपना सारा अनुभव झोंक दिया कि ज्यादा से ज्यादा मिठाई खा सकें।

मिठाई खत्म हुई तो बैलगाड़ी चल पड़ी।
'पंडित जी, आप तो बहुत बुद्धिमान हैं। कोई ऎसा काम बताएं जिससे हम दोनों भी चैन से गुजर कर सकें।"
"भई, परिश्रम से कमाया धन ही अधिक चैन देता है।"
"अब परिश्रम तो हमसे कहां होता है पंडित जी। हम ठहरे उठाईगिरे!"
'तो फिर भैया चैन की बात क्यों करते हो। जैसी कट रही है, कटने दो।'
"पंडित जी, मुझे तो एक बात सूझ रही है।" फीरन बोला।
'तुम भी कहो।"

देखिए, अभी गांव तो हमारा दूर है। बैल भी बेचारे सुबह के भूखे हैं और धीरे-धीरे चल रहे हैं। रास्ता लम्बा हो जाएगा। अब इस तरह तो समय कटेगा नहीं। क्यों न हम समय बिताने के लिए कुछ गप्प हांक लें।
गप्प हांकने में तो गोनू झा बड़े ही माहिर थे।
'ठीक है भाई! मुझे क्या परेशानी हो सकती है।"
"तो शुरुआत हीरन ही करेगा।'
"वो तो ठीक है पर खाली गप्प हांकने से भी तो कोई लाभ नहीं। क्यों न हम कोई शर्त रख लें।" गोनू झा ने प्रस्ताव रखा।
"शर्त! पंडित जी आपसे शर्त रखने में हमें भय लगता है।"
"भय कैसा! पहले शर्त तो सुन लो। यदि भयभीत करने वाली शर्त हो तो मत रखना। कोई जोर-जबरदस्ती थोड़े ही है।'
"ठीक है। तो सुनाइए अपनी शर्त!"

"देखो, हम गप्पें सुनाएंगे। जैसा कि तुम जानते हो कि गप्प तो गप्प होती है। सच से उसका कोई लेना-देना नहीं होता। पर हममें से कोई एक-दूसरे की गप्प को झूठी नहीं बताएगा। जो ऎसा करेगा, उसे सौ रुपया हर्जाना देना होगा।"
दोनों ने विचार किया कि इस शर्त में तो कोई हानि नहीं है। उन्हें क्या जरूरत है गोनू झा की गप्प को झूठी बताने की।
"ठीक है पंडित जी, हमें मंजूर है।"
"तो फिर शुरू करो फीरन।" फीरन ने कुछ देर सोचा और अपनी गप्प तैयार कर ली।

'सुनो जी, बात उन दिनों की है जब मेरे परदादा होते थे। कहते हैं कि मेरे परदादा के पास इतनी बड़ी चारपाई थी कि उस पर सारा गांव चैन से सो सकता था। गांव में जितनी भी बारातें आती थीं मेरे दादा की अकेली चारपाई पर ही सो जाती थीं।"
"भई!" गोनू झा ने कहा-"यह तो मैंने भी सुना था। यहां तक कि यह भी कहा जाता है कि उस चारपाई को बुनने में दस मन रस्सी लगती थी।"

"और मैंने तो यह भी सुना है कि फीरन के परदादा की चारपाई को बुनने वाले मेरे परदादा थे।" हीरन ने भी गप्प की पुष्टि की-"और वह बीस दिन में उस चारपाई को बुन देते थे।"
फीरन की गप्प तो खत्म हो गई। उसकी पुष्टि भी हो गई। दोनों श्रोता में से किसी ने भी उसे झूठी नहीं कहा था। अब हीरन की बारी थी।
"अब तुम बोलो हीरन भाई।" गोनू झा ने कहा।

'मैं भी अपने परदादा के बारे में ही गप्प हांकूंगा।" हीरन ने कहा-"बात तब की है जब सूत काता जाता था। मेरे परदादा ने एक रात में बाइस मन सूत कातकर उसका एक कम्बल बुना था और जब सर्दियां आई तो फीरन के परदादा की चारपाई पर सारा गांव उसी कम्बल में ढककर सोता था।"

"बिल्कुल ठीक।" गोनू झा ने कहा-"मेरे परदादा बताते थे कि उस कम्बल का कुछ हिस्सा फिर भी बाकी बच जाता था तो उसमें पशु बांधकर ढक दिए जाते थे। ग्यारह भैंसे तो हमारी ही बंधती थी।"

"हां।" फीरन ने भी पुष्टि की-"बताया जाता है कि उस कम्बल में इतनी गर्मी लगती थी कि मेरे परदादा की जेब में रखी भांग की चिलम सुलग गई थी। बड़ी मुश्किल से जान बची सबकी।'
हीरन की भी गप्प पुष्टि के साथ समाप्त हुई।
"अब आपकी बारी है पंडित जी।"
'सुनो भई! बात मैं भी परदादा की ही कहूंगा। इतना तो तुमने सुना ही होगा कि मेरे परदादा एक बहुत लम्बे-चौड़े आदमी थे।'
'सुना है। क्यों नहीं सुना। हमारे बुजुर्ग बताते थे।' दोनों ने हामी भरी।

"पर यह नहीं पता होगा कि वे थे कितने लम्बे-चौड़े। वह एक डग में भरौरा से मिथिला पहुंच जाते थे। घर बैठे हाथ बढाकर जंगल से लकड़ियां तोड़ते रहते थे। फीरन के दादा की चारपाई की रस्सी को उन्होंने दो बार में नाप दिया था। हीरन के परदादा के कम्बल को वही धूप में उठाकर सुखाते थे और तह करके रखते थे।"
'हां जी। यह बात बिल्कुल सत्य है।"
'तो यह भी सत्य है कि उनकी खोपड़ी का आकार बीस बीघा खेत के बराबर था, जिस पर एक भी बाल नहीं उगता था।'
"हां हां। यह भी हमने सुना है।" दोनो ने फिर पुष्टि की।

"तो भैया, फिर तो वह भी सुना होगा जब भीषण अकाल पड़ा था और खाने के लाले पड़ गए थे। तब मेरे दादा कलकत्ते से नवाब के यहां से पचास मन धान उधार लाए थे अपने सिर पर रखकर। तब वह धान गांव के लोगों में इस शर्त पर बांटा गया कि सब लोग समय पर नवाब का धान चुकाएंगे। बताओ, यही बात थी न! गोनू झा ने पूछा।
'बिल्कुल सही। यही तय हुआ था।"
'सबके घर नवाब का धान गया। दो-दो मन धान सबने लिया। तुम्हारे परदादा ने तो कम्बल पर सुखाया था। बताया होगा तुम्हें।'
'बताया था। आज तक याद है।"
'और तेरे परदादा ने चारपाई के नीचे आधी धूप आधी छांव में सुखाया था।'
'हां भई। दादाजी ने बताया। बहुत कठिन दिन थे।"

"सारे गांव में समय पर वर्षा होने पर फसल काटी और नवाब के धान वापस कर दिए पर तुम्हारे दोनों के परदादा उसी साल स्वर्ग सिधार गए। तब से वह धान किसी ने लौटाया ही नहीं। मेरे दादा ने अपनी फसल में से वह कर्ज चुकाया। आज तक तुम्हारी तीन पीढियों में किसी माई के लाल का कलेजा न हुआ कि वह कर्जा चुका दे। और यही कारण है कि तुम लोग दाने-दाने को मोहताज हो। अभी भी समय है कर्जा चुका दो। शायद तुम दोनों के दिन बहुर जाएं।" गोनू झा ने चेतावनी दी।
दोनों हक्का-बक्का रह गए। गोनू झा ने उनकी तीन पीढियों को आरोप लगा दिया था।
'यह सब झूठ है।' दोनों ने प्रतिवाद किया-'ऎसा कुछ भी नहीं था।"
'झूठ! शर्त के अनुसार तुम हार गए। मेरी गप्प को झूठ बताने पर तुहें, मुझे सौ-सौ रुपए देने थे न! लाओ।'

दोनों का मुंह उतर गया। क्यों उन्होंने तैश में आकर उस गप्प को झूठी बताया। बेचारें को अपनी जेब में रखे सौ-सौ रुपए निकालकर देने पड़े। कहां तो खुश थे कि आज गोनू झा की मिठाई खाई है और कहां खुद उनके वाक्जाल में फंस गए। गोनू झा ने दो सौ रुपए जेब में रखे। गांव समीप आ गया था। गोनू झा वहीं उतर गए। हीरन, फीरन लुटे-पिटे एक-दूसरे का मुंह देख रहे थे।

 
 
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