Ek Nirnayak Patra : Amarkant

एक निर्णायक पत्र : अमरकांत

उस कस्बानुमा शहर के मास्टर कुमार विनय को आजकल क्यों लग रहा है कि उसके साथ दूसरी बार धोखा किया जा रहा है? पहली बार जब हुआ तो प्रसंग दूसरा था और कारण भी। तब उसको अपने से काफ़ी उम्मीदें थीं, उत्साह और उमंग भी ख़ूब, जिसमें दूसरा शब्द पहले रखकर अपने नाम को नायकत्व की गरिमा भी दे दी थी उसने। परंतु, एम.ए.करने के बाद, नौकरी की सभी मुमकिन प्रतियोगिताओं में बैठने के बावजूद वह सफल नहीं हो सका। विडंबना यह कि इस छोटी-सी जगह में किराए पर एक मकान लेकर रहने तथा हर स्तर के प्राइवेट ट्यूशन करने पर विवश इस अनोखे व्यक्ति के पढ़ाए कुछ छात्र-छात्राएं अच्छी प्रतियोगिताओं में पास होने का सम्मान भी प्राप्त कर चुके हैं।

फिर भी, निरंतर दौड़-धूप करने वाले, अच्छे कद-काठी और सूरत के इस मास्टर ने व्यवस्था द्वारा उसके साथ किए गए पहले धोखे के बाद भी ‘निराशा’ शब्द तक अपने पास फटकने नहीं दिया। वह एक गंभीर, स्वाभिमानी और परिश्रमी व्यक्ति है और उसका अपने संबंध में स्पष्ट विचार है कि देश और समाज की विभिन्न समस्याओं पर उसका दृष्टिकोण आदर्शवादी, सही और प्रगतिशील है। वह साधारण कपड़ों में भी दुरुस्त और स्मार्ट बना रहता, किसी दूसरे का छोटा-सा भी एहसान स्वीकार नहीं करता और हँसी-मज़ाक से कोसों दूर रहता-यहाँ तक कि होली में चुपचाप खड़ा और पतली मूँछों में मुस्कराता, अपनी भाभियों की चुहलबाजी तथा बाल्टी-भरे रंग से सराबोर होता रहता और एक अन्य अनोखी आदत उसकी यह भी थी कि किसी के दुःख-तकलीफ़ में वह झट पहुँच जाता और चल देता फ़ौरन, जहाँ जाने की जरूरत होती।

बात यह है कि प्राप्त ट्यूशन-फ़ीस के अनुपात से काफ़ी अधिक समय उसने नीति को भी दिया था। मॉडल पेपर तैयार किए, लगातार अभ्यास कराया, और जब वह अपने पिता जी के साथ प्री-मोडिकल परीक्षा देने लखनऊ गई तो उन लोगों के आग्रह पर वह भी साथ गया और हर पेपर के लिए अतिरिक्त मेहनत और अभ्यास कराया था उसने।

पास होने की ख़ुशी में डूबी नीति अपनी छोटी बहन प्रीति के साथ मिठाई का डिब्बा लिए चली। सड़क पर एक सहेली के मिल जाने के बाद जब उससे बात करने लगी तो नीति अपनी अधीरता सँभाल नहीं पाई और अकेली ही कुमार विनय के घर पहुँच गई। उज्ज्वल, सरल, हँसमुख चेहरे तथा बड़ी-बड़ी आँखों में कुछ और भी था, ऐसी आत्मीय ज्योति कि जब पहली बार उसके पैर छूने झुकी तो कुमार विनय ने बीच में रोक और उठाकर कहा, ‘तुम्हारी वहाँ जगह नहीं है।’ फिर भी अपने को और अपने कथन का अर्थ ठीक से न समझते हुए भी, उसको अपने हृदय के पास खींच लिया था जैसे वह उसकी कोई नादान बच्ची छात्रा हो। फिर उसका चेहरा, ठुड्डी पकड़कर उठाते हुए कहा था, ‘इस सफलता का श्रेय एकमात्र तुम्हीं को जाता है, तुम्हारी मेधा और कड़ी मेहनत को।’ और वह अतिशय भावावेश में, फिर भी स्पष्ट कुछ भी न समझते हुए दोनों हाथों में मुँह छिपाकर सुबकने लगी।

इसके पश्चात वे एक-दूसरे के निकट आ गए, यहाँ तक कि उन्होंने आपस में कुछ कसमें भी खाई । डॉक्टरी पढ़ने के लिए लखनऊ जाने के पूर्व वह उससे मिलने गई तो उसने कहा, ‘तुम पर काफ़ी जिम्मेदारियां आ गई हैं। मैं चाहता हूँ, तुम ख़ूब तरक्की करो और भारतीय नारी के उच्च चरित्र और आदर्शों पर दृढ़तापूर्वक चलो और महीने में एक बार मुझे भी अपने पत्र द्वारा स्मरण कर लो। पत्र लिखोगी न?’

‘हाँ.... आँसुओं में डूबे होठों के बीच से वह किसी तरह बोली, काँपती- हिलती उँगलियों की वजह से रूमाल से आँखें पोंछने में असमर्थ।

कुमार विनय ने इस तरह की घटना की कल्पना भी नहीं की थी। नौकरी की परीक्षाओं में असफल होने का कारण उस समय समझ में आया था उसे, जब एक में कुछ माँगा गया, किंतु उतनी धनराशि उसके पास थी नहीं, यदि होती भी तो वह इसके लिए तैयार नहीं था। व्यवस्था के भ्रष्टाचार को उसने चुनौती के रूप में स्वीकार करके तत्काल दो फैसले कर लिए, जिनमें एक तो यही है कि कोई नौकरी न करके स्वावलंबन का मार्ग अपनाते हुए नए लोगों को अपनी से भी अधिक योग्य बनाएगा, जिससे वे अपने प्रयासों में जरूर सफल निकल जाएँ। अपने इस चुनौती में वह अवश्य आंशिक रूप से कामयाब हो रहा था, परंतु उसकी दूसरी चुनौती के संबंध में ऐसा नहीं कहा जा सकता, जो यह थी कि संभाव्य अनिश्चित एवं अव्यवस्थित जीवन के कारण वह नारी से दूर ही रहेगा।

आश्चर्य तो यह है कि नीति के जाने के बाद उसके दिमाग़ में अजीब-अजीब ख्याल आने लगे। पहले तो उसे अभूतपूर्व सूनापन और पीड़ा का अनुभव हुआ और कुछ दिनों बाद एक धूमिल ईर्ष्या भाव का भी कि एक प्यारी-सी निरभिमानी लड़की, जो उसी की वजह से आगे बढ़ी, अब उसकी सीख एवं प्यार की नियंत्रण-सीमा के बाहर, एक बड़े शहर तथा उसके स्वच्छंद समाज में चली गई है और एक अनजान-सा हीनता-बोध भी, कि हस्ती और हैसियत से वंचित तथा जीवन की हर परीक्षा में असफल एक मामूली मास्टर के पास एक सफल, आधुनिक और सुंदर लड़की को रिझाने के लिए क्या रखा है?

ऐसे विचार को शीघ्र ही झटक दिया था उसने और उसकी अनेक बातें याद करके पुनः आशा और विश्वास से भर उठा। उसके आँसू, विदा होते समय उसका एकमात्र सहमत चुंबन, व्याकुल प्यार से देखती उसकी आँखें। वह दीवार पर टँगे बड़े आइने के सामने खड़े होकर अपने चेहरे को बार-बार देखने लगा, यह सोचते हुए कि किसी सिने-नायक से कम प्रभावशाली उसका व्यक्तित्व नहीं है और वह एक खूबसूरत दिवास्वप्न में खो गया कि एक दिन उसका भाग्य जरूर चमकेगा और वह नीति को अनंत ख़ुशियों से सराबोर कर देगा।

हर दिन तो वह उसके पत्र की प्रतीक्षा करता रहा और जब सितंबर बीतने को आया तो एक दिन रास्ते में मिलने पर उसकी छोटी बहन प्रीति ने बताया कि उसकी दीदी पहले रैगिंग से परेशान रही, बाद में बीमार पड़ गई और अब इतनी मेहनत पड़ गई है कि गर्मी की छुट्टियों के पहले शायद ही आ पाए। उसको कुछ मलाल तो जरूर हुआ कि कम-से-कम एक पत्र तो उसके पास भेजा ही जा सकता था, किंतु इसको बहुत तूल नहीं दिया उसने, इस विचार के साथ कि वह एक नेक और सच्ची लड़की है और दिए हुए उसके वचन का चरितार्थ न होना अकारण नहीं है तथा उससे मिले बग़ैर किसी काल्पनिक नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सकता।

परंतु, उसके खूबसूरत स्वप्न को एक हल्का आघात उस समय लगा, जब लखनऊ सचिवालय के एक क्लर्क ने, जो उसका पूर्व सहपाठी भी था, अचानक मिलने पर नीति की चर्चा चला दी और व्यंग्यतापूर्वक कहा :

‘बीमारी तो एक बहाना है, मेरे प्यारे दोस्त। एक दिन मेडिकल कॉलेज गया था कि क्या देखता हूँ, मेडिकल कॉलेज के छात्रों के झुंड के बीच में नखरे से चमक-उछल कर खिल-खिल कर रही है। एक बात तो कहूँगा कि हमारे- तुम्हारे घरों की लड़कियाँ ऐसी बेशर्मी पर नहीं उतर सकतीं, चाहे मेडिकल पढ़ाई के लिए उन्हें अमेरिका ही क्यों न भेज दिया जाय....।’

कुमार विनय ने संकीर्ण मनोवृत्ति के लिए अपने सहपाठी को फटकारा जरूर, किंतु जब वह एकांत में बैठकर विचार करने लगा तो प्राप्त सूचना का यह अर्थ तेज, विषैले बाण की तरह उसके हृदय के अंदर धँसता गया कि उससे बचने के लिए ही दुनिया-भर के बहाने हैं। क्या सचमुच? काम सिद्ध हो जाने पर अँगूठा दिखाने वाली कहावत को क्या वह चरितार्थ कर रही है अपने सच्चे, आदर्शवादी, पुरुष प्रेमी पर? एक ठगे जाने वाले निर्दोष व्यक्ति की तरह सहसा उसे महसूस हुआ कि घोर अवज्ञा, उपेक्षा एवं अपमान से उसका माथा और कान गरम होकर जलने लगे हैं।

उसके अंदर हीनता-बोध फिर प्रबल होने लगा। हाँ, इस अर्थ में तो वह सचमुच बेकार है कि उसके पास कोई ऐसी पक्की नौकरी नहीं है, जिसमें तरक्की, प्रॉविडेंट फंड, ग्रेच्युटी, छुट्टियाँ तथा अन्य सुविधाएँ मिलती हैं। वह चाहे भी तो रविवार छोड़कर एक दिन के लिए भी कहीं जा नहीं सकता। अपने घर में और बाहर भी, काम पड़ने तक ही उसकी पूछ है अन्यथा कोई भी उसे गंभीरता से नहीं लेता। लंबी बीमारी उसके भविष्य के लिए विघातक है और यह भी सच है कि एक दिन वह अशक्त हो जाएगा, जिससे वह सादे ढंग और कंजूसी से रहता है, एक-एक पैसा दाँत से पकड़ते हुए।

लेकिन, नीति से तो उसने कुछ भी नहीं छिपाया था। ऐसी ही बात है तो उसने पहले ही मना क्यों नहीं कर दिया? उसने तो कभी उसके प्यार का फ़ायदा नहीं उठाया, बल्कि प्यार दिया दूरी तथा इज्जत के साथ और सोचने-समझने का समय भी। फिर उसी समय कसम खाकर वचन क्यों दे गई वह? क्या कृतज्ञता का नाटक? नहीं, वह उस पर अविश्वास नहीं करेगा और स्वयं लखनऊ जाकर उससे मिलेगा। इस फ़ैसले से वह ख़ुश हो गया और उसका प्यारा-सा चेहरा देखने को व्याकुल भी।

नवंबर मास के आरंभ में, जब वस्तुतः सर्दी आई भी नहीं थी, साफ़ आसमान और मंद हवा के ख़ुशनुमा मौसम में वह लगातार दो रविवारों को लखनऊ गया। प्रथम बार उसके छात्रावास के कई चक्कर लगाने के बाद भी वह मिल नहीं सकी। उस अवसर पर कई लड़कियों ने किंचित ऊँचाई और संशय से घूरकर संक्षिप्त उत्तर दिया, ‘मुझे पता नहीं।’ एक अन्य से सूचना मिली कि किसी परिचित से मिलने गई है, किंतु पता-ठिकाना नहीं मालूम। शाम और गाड़ी का समय होने पर वह स्टेशन लौट गया। वह थक गया था और निराशा तथा गुस्से में पता नहीं कैसे उसे संत कवि तुलसीदास की एक कविता-पंक्ति याद आ गई, जिसका अर्थ है ‘जैसे स्वतंत्र होकर नारी बिगड़ जाती है।’

दूसरे रविवार को, एक दूसरी ही लड़की ने शहर में रहने वाली सहपाठिनी सहेली का पता बताया, जिसके यहाँ वह छुट्टी के दिन जाती है और शाम को खा-पीकर ही लौटती है। वहाँ जाने पर सहेली तो मिल गई, लेकिन नीति नहीं। सहेली ने संदेह से घूरकर कहा, ‘आती तो है यहाँ, लेकिन आज नहीं आई। कभी-कभी अपनी एक मौसी के यहाँ जाती है, उनका पता नहीं मालूम। आप अपना परिचय दे दीजिए, प्लीज काम भी बता दीजिए, मैं कल जब कॉलेज जाऊँगी तो बता दूँगी।’

उसे यह समझ में नहीं आया कि मेडिकल कॉलेज की छात्राएं ऐसा व्यवहार क्यों करती हैं, जैसे किसी मातहत से बात कर रही हों। कुछ क्षणों के लिए ऐसा भी लगा था उसे कि उसकी सहेली जबान को कुछ ऐंठकर बोल रही है और एक-दो बार वह व्यंग्य से मुस्कराई भी थी। उसने सिर झुकाकर ऊपर-नीचे अपने को उड़ती दृष्टि से निहारा। हाँ, वह तो स्टेशन पर उतरने के बाद नहा-धोकर और प्रेस किए हुए साफ़-सुथरे कपड़े पहनकर ही चला था, लेकिन अपनी भावनाओं को नियंत्रित करके अत्यंत धीमे स्वर में बोला वह‒

‘मैं उन्हीं के कस्बे से आया हूँ। हाँ, यदि आपके घर के अंदर हों तो जाकर उनसे कह दीजिए कि जरूरी काम है, कुछ देर के लिए मिलकर चली जाएँ....’

‘मैं उसे क्यों छिपाऊँगी, प्लीज। मैं सचमुच समझ नहीं पा रही हूँ कि आप अगर उसके कस्बे के और परिचित भी हैं तो आप स्वयं अपना परिचय क्यों नहीं दे पा रहे हैं और वह आपसे क्यों नहीं मिलना चाहेगी?’

उसने कुछ क्षणों तक उसकी सहेली को देखा। फिर, कुछ न बोलकर और कहीं न जाकर स्टेशन पर ही लौट गया, और एक सस्ते होटल में बेमन से कुछ खाकर, प्लेटफ़ार्म पर जाकर एक बेंच पर बैठ गया। वह निराशा की अतल गहराइयों में लुढ़कने लगा। उसका चेहरा लटक आया, उस गदहे की तरह, जिस पर उसकी मालिक की मार पड़ी हो। वह अपने को बहुत छोटा, बेग़ैरत और असहाय महसूस करने लगा। फिर ऐसा आभास हुआ उसे, गोया सब उस पर हँस रहे हों‒नीति और उसकी सहेलियाँ, मेडिकल कॉलेज के आस-पास के दुकानदार तथा बाशिंदे और स्वयं उसके कस्बे वाले दोस्त भी, जो उसके बार- बार लखनऊ जाने से आश्चर्यचकित थे। हाँ, यही वह रीढ़हीन व्यक्ति है, जिसने अपने को हिम्मती पुरुष समझकर दुनिया को चुनौती दी थी और आजीवन शादी न करने की शपथ भी खाई थी और आज एक मामूली लड़की के चक्कर में दर-दर भटक रहा है।

तीसरे रविवार को वह दृढ़ निश्चय के साथ आ गया, चाहे तीन-चार दिन ही क्यों न लग जाएँ। काफ़ी कष्टों से बचाए गए पैसों में से कुछ अधिक निकालने में और भी कष्ट हुआ था। मेडिकल कॉलेज के पास चौक के एक होटल में पहुँचकर, नहाने-धोने तथा एक कप चाय पीने के बाद वह अपने कमरे की कुर्सी पर चुपचाप बैठ गया। वह बेहद गंभीर था, चेहरा सख्त। वह देर तक सामने देखता रहा, फिर उँगली हिला-हिलाकर घृणा से होंठ संचालित करते हुए बुदबुदाने लगा, जैसे सामने खड़े किसी शत्रु को फटकार रहा हो।

आकाश पर कुछ बादल तथा सर्दी की हवा में भी तेजी और बदलाव। वह पैंट-कमीज तथा अधबँही स्वेटर पहनकर होटल के नीचे उतर आया और सड़क पकड़कर मेडिकल कॉलेज की दिशा में जाने लगा। अचंभे की बात तो यह है कि जब वह कई दिन रुकने का इरादा लेकर आया है, पास पहुँचने पर नीति छात्रावास से निकलती हुई दिखाई पड़ गई। वह सिर झुकाए हुए थी और सड़क पार करके बस-स्टैंड पर खड़ी हो गई।

वह क्रीम रंग की साड़ी पहने हुए थी और उसी रंग के ब्लाउज के ऊपर एक स्लीवलेस स्वेटर भी। उसके चेहरे पर एक कस्बाई लड़की का सहमा-सहमा भाव नहीं था, बल्कि अभूतपूर्व आत्मविश्वास तथा समझदारी की प्रखर आभा। पहले उसे देखकर कुमार विनय का हृदय धक-सा कर गया। पता नहीं कैसा महसूस होने लगा उसे, उसका सलोना मुखड़ा देखकर विवश प्यार की दुबर्लता, किंतु यह क्षणिक ही था और इस बस-यात्रा के दूसरे अर्थों पर ध्यान जाते ही उसका क्रोध दूने वेग से लौट आया और चेहरे पर सख्ती और तमतमाहट भी।

‘अरे आप? यहाँ कैसे? कोई बीमारी तो नहीं?’ कुमार विनय के अचानक सामने आकर खड़े होने पर नीति का चेहरा फक पड़ गया।

‘बताऊँगा। अगर तुम जरूरी काम से नहीं जा रही हो तो क्या मुझसे कुछ देर के लिए मिल सकती हो? इस समय फुरसत न हो तो बताओ कब संभव है?’ नीति ने अपने को सँभाल लिया था इस बीच। अब वह प्रफुल्लित होकर प्यार-ज्योतित आँखों से उसे एकटक देखती हुई बोली, ‘आप क्यों ऐसे हो रहे हैं? मैं तो एक सहेली के यहाँ जा रही हूँ...छुट्टी के दिन उसके पास चली जाती हूँ, कभी-कभी अमीनाबाद में रहने वाली अपनी मौसी के पास भी। आप आ गए हैं तो वहाँ जाने का सवाल ही नहीं है। चलिए उधर, पहले चाय पीते हैं, फिर बातें होंगी...’

‘मैं यहीं चौक में एक होटल में रुका हूँ। अगर तुम्हें कोई आपत्ति न हो तो वहीं चलते हैं, मैं तुम्हें चाय पिलाऊँगा।’
नीति ने अचंभे से उसे देखते हुए पूछा, ‘होटल में रुके हैं? खैर, चलिए वहीं सारी बातें होंगी।’

बड़े पार्क के पास चौराहे पर स्थित वह होटल साधारण ही है। ऊपर का कमरा भी छोटा, जिसके मध्य किसी दीवान पर बिस्तरा, सफ़ेद चादर, सफ़ेद गिलाफ़ वाला तकिया तथा ओढ़ने के लिए लपेटकर रखा हल्का कंबल। दरवाजों की दिशा में नाश्ते की एक मेज और अगल-बगल रखी दो कुर्सियाँ।
‘कुर्सी पर बैठ जाओ, चाय के साथ क्या लोगी?’
‘मैं तो सिर्फ चाय....आप अपने लिए...’

फ़ोन द्वारा ऑर्डर देकर बिस्कुट और दो कप चाय आने पर वे पीने लगे चुपचाप। कुमार विनय इतना गंभीर था कि नीति को कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई। वह बेहद परेशान भी थी, क्योंकि वह उसकी तरफ़ देख भी नहीं रहा था। सहसा उसे अपनी सहेली की बात याद आई, लेकिन उसने सब-कुछ ऐसे विद्रूपात्मक ढंग से बताया था कि कुमार विनय होने की बात एक क्षण के लिए भी उसके दिमाग़ में नहीं आई थी।

‘शुरू में मुझे काफ़ी परेशान होना पड़ा। अब काफ़ी मेहनत करनी पड़ रही है। आपका पूरा पता भूल रहा था.... और सच कहती हूँ, समझ में नहीं आया कि कैसे लिखूँ...’

वह उखड़े ढंग से बोल रही थी और छत को देखकर उसका चेहरा भी तमतमा गया था शर्म से। इसी समय बैरा आकर कप-प्लेट ले गया। दो-एक मिनट की चुप्पी के बाद कुमार विनय ने सहसा उठकर भीतर से दरवाजा बंद कर दिया, फिर लौटकर बिस्तरे पर बैठते हुए बोला‒ ‘अब सुनाओ कि क्या कहना चाहती हो...’

वह बेहद डर गई, क्योंकि उसके पूर्व शिक्षक तथा वर्तमान प्रेमी की आँखें कपार पर चढ़ गई थीं और चेहरा किसी घुन्ने व्यक्ति की तरह गुस्से में अंगुर के समान लाल हो गया।
‘मैं पत्र के बारे में....’
‘और हाँ, यह भी बताओ कि पिछले दो रविवारों को तुम अपनी सहेली के यहाँ छिपी बैठी थीं, तो तुम्हें ढूँढ़ते हुए कोई भी नहीं पहुँचा था।’
‘ग़लत है यह। मैं दोनों रविवारों को मौसी के यहाँ थी...’ वह रुआँसी हो गई।

नीति की बात कुमार विनय के कानों में अंदर गई ही नहीं। उसकी लाल-लाल आँखें और चढ़ गई और उसकी हालत लगभग उस मानसिकता तक पहुँच गई, जिसमें एक पुरुष स्त्री के साथ उन तीन तरीकों पर उतर आता है, जिनमें वह अपने को सक्षम और एकाधिकारी भी समझता है। वह विषधर की तरह फुफकारने लगा‒

‘तुम एक झूठी, पाखंडी, बेग़ैरत, नाटकबाज और दग़ाबाज़ औरत हो। तुम्हारी यह हिम्मत? तुम जैसी औरतें तो मेरे यहाँ नौकरानियाँ हैं। चलो हमारे गाँव और देखो कि हमारी भाभियाँ पढ़ी-लिखी होने पर किस तरह शालीन और सभ्य तरीके से रहती हैं। तुम हमारे खानदान के पुरुषों को नहीं जानतीं, वे स्त्रियों की इज्जत तो करते हैं, लेकिन उनको सिर पर नहीं चढ़ाते। तुमको अपने रूप, यौवन, आधुनिकता और मेडिकल पढ़ाई का घमंड हो गया है? यह मजाल तुम्हारी कि जिसने तुम्हारे साथ उपकार किया, तुमको आगे पहुँचाया और अपनी शपथ तोड़ने का साहस करके प्रेम का हाथ बढ़ाया, उसके साथ वादाखिलाफी करो और यह उम्मीद भी करो कि तुम्हारे प्यार में वह दर-दर भटका करे। तुमने क्या सोचा है कि ऐसी दग़ाबाजी मैं बरदाश्त कर लूँगा? मेरे अंदर जो तुम्हारी छवि थी, वह तो धूल में मिल ही गई है, लेकिन आज मैं तुम्हारी ही नजर में, तुम्हारी ही इज्जत मिट्टी में मिलाकर रख दूँगा। यहाँ गुलछर्रे उड़ाकर दूसरों के सामने सती-सावित्री बनती हो, उठो, खड़ी हो जाओ...’

वह डरकर उठ खड़ी हुई और थरथर काँपती हुई, हाथ जोड़कर रोती हुई बोली, ‘आप ऐसी ग़लत और कड़वी जबान न बोलिए। आपके सभी आरोप असत्य हैं। मैंने आपको ही अपना सब-कुछ माना है। लेकिन अनजाने में या मजबूरी में कोई भूल हो गई हो तो माफ़ कर दीजिए....’

लेकिन इन बातों का भी कुमार विनय पर कोई असर नहीं हुआ और वह उठकर उसे दंड देने के लिए उठ खड़ा हुआ, वह भी अधिकार के साथ और यह कहकर कि ‘अब यह पाखंड करने लगीं? तुम जैसी औरत की इज्जत-आबरू मैं चौपट करके रख दूँगा।’ वह पागल की तरह आगे झपटकर जबरदस्ती उसके कपड़े उतारने लगा। साड़ी, पेटीकोट, पैंटी, स्लीवलेस स्वेटर, ब्लाउज, ब्रेसरी, सब अत्यंत क्रूरता के साथ, बारी-बारी से, डर-आतंक से थरथराती और हिलती-डोलती कोमल देह से खींच लिए उसने। जब कुछ भी निकालने को न रहा तो कुमार विनय के हाथ कुछ देर के लिए निष्क्रिय होकर थम गए, जिसका लाभ उठाकर वह झट नीचे पंजों के बल उकडूँ-सी बैठ गई और आगे दोनों सटे हुए घुटनों पर झुककर, वक्ष को ढकने की कोशिश करने लगी, और अपनी दोनों बाहों को आपस में सटाकर आगे आवरण की तरह इस्तेमाल करती धारोधार गिरते आँसुओं के बीच बोली‒

‘सर, आपको पूरा हक है। इज्जत-आबरू, प्राण, सब-कुछ मैं आपको सहर्ष देने को तैयार हूँ गुरु-दक्षिणा के रूप में।’

क्या नीति के कथन में ही कोई ऐसी बात थी, जिससे कुमार विनय अब सचमुच उसकी तरफ़ देखने लगा, जैसे बेहोश व्यक्ति जल के छींटे देने पर चैतन्य हो जाय? अथवा समर्पण के उसके शब्द, उसकी काया की निर्मम दुर्दशा, लगातार असहाय रुदन, पहले हाथ जोड़कर की गई निर्दोषिता की वकालत तथा क्षमा-याचना, आदि सभी अर्थों के साथ याद आकर, अपने संयुक्त प्रभाव से जैसे प्रतिशोध की भयंकर जलन में शीतल संतोष देकर उसे सजग और सामान्य कर गए हों? और तब उसके अंदर नीति के लिए न मालूम कहाँ से करुणा की गहरी भावना उत्पन्न होती गई और उसने अत्यंत कोमल स्वर में कहा‒

‘मैं बाथरूम में चला जाता हूँ...तुम कपड़े पहन लो....’ इसके बाद वह पीछे की तरफ़ जाकर दृश्य से बोझल हो गया। कपड़े फिर धारण करते समय नीति के आँसू और भी तेजी से गिरे और हिचकियाँ-सी बँधने लगीं, जिन्हें वह अत्यंत कठिनाई से सम्भाल पाई।
बाहर आकर कुमार विनय ने प्यार के स्वर में कहा, ‘चलो, मैं तुम्हें होस्टल छोड़ आता हूँ।’
‘चली जाऊँगी।’
‘नहीं....ऐसा नहीं होगा...।’

छात्रावास के फाटक के पहले विदा के समय कुमार विनय के होंठ कुछ विशेष कहने के लिए आतुर दिखे, किंतु अंततः उसकी हिम्मत नहीं हुई, क्योंकि शायद अनजान में ही लघुता और शर्म की एक अजनबी अनुभूति से वह विवश हो गया। वह जल्दी-जल्दी बोला‒

‘तुम सब-कुछ भूल जाओगी, जैसे कुछ भी न हुआ हो। तुम वैसी ही हो, जैसी मेडिकल पढ़ाई के लिए जाते समय मेरे लिए थी। मैं भी वही हूँ तुम्हारे लिए उसी दिन की तरह। जाओ, आराम करो, मुझे एक जरूरी काम से कहीं जाना है। मैं जल्दी ही तुम्हारे पास विस्तार से लिखूँगा....ठीक है?’

नीति ने सिर हिलाया। वह उड़ती दृष्टि से उसे देखते हुए घूमकर जल्दी- जल्दी चला गया, जैसे सचमुच उसे जरूरी काम से कहीं जाना ही हो। उसके बाद नीति एक ऐसे धुंध से घिर गई, जिसमें वह कुछ भी सोच-समझ नहीं पा रही थी। यह सब क्यों और कैसे हो गया। हिम्मत, ईमानदारी, संघर्षशीलता तथा दूसरों के लिए जान देने को तैयार रहने के पुरुष गुणों के कारण ही वह उसे प्यार करने लगी। यह सही है कि वह पत्र नहीं लिख सकी, जिसका एक कारण तो संबोधन में उसका संकोच-भरा अनिश्चय भी है। क्या इसी वजह से तथा कुछ अन्य दुर्योगों के कारण ही कोई इतनी अधीरता तथा नासमझी से वह सब जबरदस्ती छीन लेगा, जो उसने स्वयं सौंपा था और नीति के लिए भी जो जीवन-मरण का प्रश्न है? फिर भी, कभी-कभी आशा की इज्जत, स्वाभिमान और परिणामस्वरूप प्यार भी, तो उसने होटल के कमरे में अपहृत कर लिया था। वह रोज ही उसके पत्र का इंतजार करने लगी और एक दिन पत्र पाकर जल्दी- जल्दी पढ़ने लगी‒

‘उस दिन तुम्हें बहुत निकट से देखने का मौका मिला और मैं तुम्हारे और भी निकट आ गया हूँ। तुम्हारे जिन गुणों को नहीं समझ सका था, आज बताना चाहता हूँ। भारतीय नारी का एक सर्वोत्तम गुण है तुम्हारे अंदर‒ वह है विवेकपूर्ण सहनशीलता। तुम दुर्लभ स्त्री हो, जो घटिया स्तर पर नहीं उतर सकती और उदारता, सच्चाई और अपने वचन पर अटल रहती है। गरिमापूर्ण समर्पण तथा आँसुओं में तुम्हारी जैसी खूबसूरत स्त्री इस दुनिया में कोई नहीं है। इसकी तो मैं प्रशंसा कर सकता हूँ कि तुम कसी ब्रेसरी पहनती हो, फिर भी मैं चाहता हूँ कि तुम एक सही आकार की ले आओ। वक्ष नारी की शोभा है, उन पर अनुचित और अतिरिक्त दबाव नहीं होना चाहिए और न ही बेसहारे होने चाहिए और मैं तुम्हें यह भी बताना चाहता हूँ कि तुम स्वास्थ्य और सफ़ाई के प्रति लापरवाह नहीं हो, उन स्त्रियों की तरह जिनकी साँसों से दुर्गंध आती रहती है। मैं ख़ुश हूँ, परम संतुष्ट हूँ और इन्हीं प्यार-भरे विचार के साथ तुम्हें जल्दी से जल्दी अपना बनाना चाहता हूँ...’

पत्र समाप्त होते ही नीति के आगे वहीं धुंध पसरने लगा और जल्दी ही गाढ़ा होकर अंधकार की तरह उसके भीतर भी गया। उसने पत्र के काग़ज़ को एकटक देखा, लेकिन अब कोई भी अक्षर दिखाई न पड़ा। फिर उसे कोने से पकड़कर खिड़की से आती हवा में फड़फड़ाते निहारती रही और अंत में छोड़ दिया, जो हवा में उड़कर कोने में रखी रद्दी की एक टोकरी में जा गिरा और पड़ा रहा....।

 
 
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