Dhuan : Shivani

धुआँ : शिवानी

रामगढ़ के सीमान्त पर बसे छोटे-से नैक ग्राम में, जिस दिन रजुला का जन्म हुआ, दिशाएँ पहाड़ी दमुवे की चोट और तुतुरी की ध्वनि से आनन्द-विभोर हो उठीं। ग्राम आज भी जीवित है, पर उसके मकानों के कक्षगवाक्ष, किसी जर्जर वृद्ध की जीर्ण दन्तपंक्ति की ही भाँति, टूटकर बिखर पड़ने को तत्पर हैं। जो अब दूर से, लासा के दलाईलामा के विचित्र महल-सा दिखता है, किसी समय कुमाऊँं का प्रसिद्ध सौन्दर्यतीर्थ था। छोटे काठ के यही खँडहर, कभी तबले की झनक और घुँघरुओं की रुनक से गूँज उठते थे। हिरणी के-से शत-शत नयन-कटाक्ष, दूर-दूर से तरुण, किशोर, विगलित पौरुष के क्षत्रिय, ब्राह्मण, शूद्र सबको एक अनोखी भावनात्मक एकता की डोर से बाँधकर खींच लाते थे। प्रेम के कुछ अमूल्य क्षणों का मुँहमाँगा दाम देकर, उच्च कुलगोत्र का अस्तित्व मिटा, न जाने कितने पन्त, पांडे और जोशी यहाँ विवेकभ्रष्ट हुए।

सेब की नशीली खुशबू में डूबा रामगढ़ तब और भी मादक था, वहाँ की हवा के हर झोंके में सेब की मीठी खुशबू रहती पर तब रामगढ़, आज की भाँति अपने सेबों के लिए प्रसिद्ध नहीं था, रामगढ़ का मुख्य आकर्षण था नैक ग्राम। वहाँ की देवांगना-सी सुन्दरी उर्वशियाँ शरीर को ऐसी लगन और भक्ति से बेचती थीं, जैसे सामान्य-सी त्रुटि भी उनके जीवन को कलंकित कर देगी। प्रेम के आदान-प्रदान में कहीं भी वारांगना का विलास नहीं रहता, वाणी में, कटाक्षमय अभ्यर्थना में, यहाँ तक कि उनके संगीत के नैवेद्य में भी कहीं पर उनके कलुषित पेशे की छाप नहीं रहती। कभी किसी मनचले ग्राहक को, उनसे ठुमरी या गजल-दादरा सुनाने का आग्रह करने का साहस नहीं होता। सुन्दर ललाट पर पड़ा हल्के-से घूँघट का घेरा, आनत आनन पर भी अपनी पवित्र छाया डाल देता। भजन, कीर्तन और परी चाँचरियांे के पहाड़ी पूजागीत सुना, हाथ में मिट्टी का जला प्रदीप लेकर, सिर झुकाए अलस-पगों से, किसी सौम्य उच्च कुलवधू की भाँति ही वे उर्वशियाँ ग्राहकों के पीछे-पीछे अपने कक्षों में चली जातीं।

पुत्री का जन्म उस बस्ती में सर्वदा बड़े उल्लास से मनाया जाता। इसी से जब उनमें सबसे सुन्दरी मोतिया, अलस होकर नींबू और दाड़िम चाटने लगी तो अनुभवी सखियों ने घेर लिया

‘‘हाय, राम कसम, लड़की होगी, इसी से तो खट्टा माँग रही है, अभी से!’’ धना बोली।
‘‘और क्या!’’ पिरमा चहकी, ‘‘लड़का निगोड़ा ऐसा पीला चटक रंग थोड़े ही ना रहने देता।’’

मोतिया पान के पत्ते-सी फेरी जाने लगी, बत्तीस सुन्दरियों के हृदय प्रतीक्षा में धड़कने लगे, उनके वंश की पल्लवित लता अब सूखती जा रही थी, पन्द्रह वर्ष पहले चन्द्रा के निगोड़ा पूत ही जन्मा था। रजुला का जन्म हुआ तो सखियाँ नाच उठीं। रँगीली बस्ती के तीन-चार पुरुषों को नैनीताल भेजकर, गुरखा बैंड मँगवाया गया, तीन-तीन हलवाइयों ने कड़ाह चढ़ा दिए, एक ओर ब्राह्मणों के लिए दही में गुँधे आटे के पकवान उतरने लगे, दूसरी ओर बड़े-बड़े हंडों में क्षत्रियांे के लिए समूचे बकरे भूने जाने लगे। लाल रुँवाली के पिछौड़ों से अपने रूप की बिजलियाँ गिराती, रजुला की बत्तीस मौसियाँ निमन्त्रिात अतिथिगणों के हृदयों पर छुरियाँ चलाने लगीं। पंडितजी ने, शंख को मुँह में लगाकर, तीन बार नवजात कन्या के कान में नाम फूँक दिया ‘रजुला- राजेश्वरी-राधिका’ और स्वयं लाल पड़कर रह गए।

‘‘यह काम असल में कन्या के पिता को करना था,’’ कहकर वे खिसियानी हँसी हँसने लगे।
‘‘हो न हो, इसमें तुम्हारे ही-से किसी ब्राह्मण का रक्त है पंडित ज्यू, मिला लो रंग,’’ साथ ही खिलखिल करती दो-तीन मौसियों ने पंडितजी को घेर लिया, ‘‘क्या बात कही तुमने भी!’’

पंडितजी स्वयं भी हँसने लगे गहरी दक्षिणा, रसीली चुटकियों और मछली-सी लम्बी आँखों के कटाक्षों ने उन्हें रससागर में गले तक डुबो दिया था। ‘‘माया तो देखो भगवान् की, कल कुंडली बनाई, तो बस देखता रह गया, रत्नांजलि योग है इसका पिरमा, हाथों से रतन उलीचे तो फिर भी हथेली रत्नों से भरी रहे!’’ उन्होंने काल्पनिक रत्नों की ढेरी में हथेली की अँजुली भरकर निकाली और हवा में बिखेर दी। ‘‘ऐसे, समझी? बाप रे रत्नांजलि योग,’’ वे स्वयं ही अविश्वास से बुदबुदाने लगे।

‘‘वह योग तो हम सबका है यार पंडित ज्यू’’, रसीली पिरमा चहकी और खिलखिलाकर हँसी के मंजीरे बन गए।
बत्तीस मातृत्व-वंचिता नारियों के अभिशप्त दग्ध हृदयों का मलहम बन गई रजुला। सन्ध्या को सब अपने शृंगार-कक्षों में चली जातीं तो सयानी देवकी रजुला को गोद में नचाती
आजा मेरी चम्पाकली
सोजा मेरी चम्पावती

ऐसे ही देवी ने मोतिया को नचाया था, ऐसी ही थी भीमू, लछमी, परु और न जाने कितनी रूपसियों का स्पर्श अभी भी उसकी गोद में सिंचकर रह गया था और सब एक-एक कर ताल में पकड़ी मछलियों की ही भाँति, उसकी हथेली से फिसलकर फिर ताल ही में जा गिरी थीं। स्वयं वह भी प्रभु के भजन को घर से निकल गई थी! जोगिया कपड़े रँग के, सिर मूँड, वह एक नैपाली बाबा के दल में बद्रीनाथ की यात्रा को निकल गई थी, पति लाम में मारा गया और क्रूर सास ने उसकी कोमल पीठ, गर्म लोहे की सलाखों से दाग-दागकर रख दी थी, इसी से घर-द्वार की माया-ममता छोड़, वह अलख कहकर निकल पड़ी थी। पन्द्रह वर्ष की बालिका वैराग्य के भूलभुलैये में भटककर, न जाने कब विलास की नगरी में जा गिरी। अब तो उसने सातों नरक देख लिए थे, उसकी पहली पुत्री, बाईस वर्ष में ही भीषण रोग से सड़-सड़कर मर गई थी, तब उसने कसम खाई थी कि वह अब मनुष्यमात्र से माया-ममता नहीं करेगी, पर इकहत्तर वर्ष में फिर बन्धन में पड़ गई। मोतिया भी उसी की पुत्री थी। मोतिया, जैसे-जैसे गतयौवना होती जा रही थी, वैसे ही उसका भाव भी चढ़ता ही जा रहा था।

‘‘शहद जितना पुराना हो उतना ही मीठा भी होता है मोतुली, तू हमारे कुल का खरा शहद है,’’ देवकी ममत्व से उसे निहारकर कहती। नन्दादेवी का डोला उठता तो मोतिया की ही पुकार होती। वही डोले के आगे-आगे नाचती। मखमली लहँगा, बढ़िया लाल गोट लगा अतलसी पिछौड़ा और हाथ में इत्र की खुशबू से तर लाल रेशमी रूमाल लेकर वह नाचती और कुमाऊँ के रँगीले जवानों के दिल नाच उठते। मजाल है, किसी कुमाऊँनी लखपती के नौशे की डोली बिना मोतिया के नाच के उठ जाए! सिर से पैर तक सोने से लदी मोतिया जिधर कदम उठाती, फूल खिल जाते। मोतिया की रजुला जब आठ साल की हुई तो बड़े आनन-फानन से उसकी संगीत की बारहखड़ी आरम्भ की गई। एक बकरा काटकर, उस्ताद बुन्दू ने उसकी नागफनी के फूल-सी लाल जिह्ना पर सरस्वती बनाई। कुछ दिन बाद, उस्ताद ने भैरवी की एक छोटी-सी बन्दिश रजुला के गले पर उतारी तो उसने खिलखिलाकर इस बारीकी से दुहरा दी, कि बुन्दू मियाँ दंग रह गए, और रजुला के पैर छूकर लौट गए, ‘‘वाह उस्ताद, आज से तू गुरु और मैं चेला, मोतिया बेटी इस हीरे को गुदड़ी में मत छिपा। देख लेना एक दिन इसके सामने बड़े-बड़े उस्ताद पानी भरेंगे। देस भेज इसे, वरना इसकी विद्या गले ही में सूखकर रह जाएगी।’’

‘हे राम, देस! जहाँ लू की लपटें आदमी को जल-भुनकर रख देती हैं और ऐसी फूल-सी बिटिया...’ बत्तीसों मौसियों के हृदय भर आए। पर बुन्दू मियाँ कभी ऐसी-वैसी बातें नहीं करते थे। कैसी-कैसी विद्या उनके गले में भरी थी।

जब वे ही रजुला से हार मान गए तो देश ही तो भेजना पड़ेगा। बुन्दू मियाँ की बुआ की लड़की लखनऊ में रहती थी। सुना, रियासतों में ही शादी-ब्याह के मुजरों का बयाना लेती थी। ‘‘ग्रामोफून के डबल रिकार्डों में उनका गाया मेघ, पचास-पचास रुपयों में बिकता है,’’ बुन्दू मियाँ बोले, ‘‘अब तुम क्या समझो मेघ! तुमने बहुत हुआ तो गा दिया सीधे-सादे ठेके पर कोई भजन या काफी की होली, अरे बड़े-बड़े उस्तादों का गाना सुनोगी तो पसीना आ जाएगा। तबलेवाला है कि सम पै आता ही नहीं और मुरकियों के गोरख-धन्धों में तबलची को फँसाकर छोड़ दिया कि लो बेटा चरो। आखिर तबलेवाला हारा, गिड़गिड़ाया और गानेवालियों ने तान आलाप की रस्सी छोड़ी, सम पै आई और तबलेवाले की जान बची, समझी, ये है गायकी।’’ बुन्दू संगीत का ऐसा विकट चित्र खींच देते कि बत्तीस जोड़ी सरल पहाड़ी आँखें फटी-फटी ही रह जातीं।

‘‘तब तो मैं जरूर रजुला को देस भेजूँगी,’’ मोतिया ने दिल पक्का कर लिया, ‘‘उस्ताद ज्यू, जैसे भी हो तुम इसे लखनऊ पहुँचा आओ, छोकरी नाम तो कमाएगी।’’ उसने बुन्दू मियाँ के पैर पकड़ लिए।

बुन्दू मियाँ रजुला को लखनऊ पहुँचा आए। बुन्दू मियाँ की बहन बेनजीर ने रजुला को पहले ही दिन से शासन की जंजीरों में जकड़कर रख दिया। जंगली बुलबुल को सोने के पिंजड़े में चैन कहाँ? कहाँ पहाड़ी आलूबुखारे, आड़ई और सेब के पेड़ों पर अठखेलियाँ और कहाँ तीव्र और कोमल स्वरों की उलझन और रियाज! बत्तीस मौसियों के लाड़ और देवकी के दुलार के लिए बेचारी तरस-तरसकर रह गई। कठोर साम्राज्ञी-सी बेनजीर की एक भृकुटी उठती और वह नन्हा-सा सिर झुका लेती।

‘‘मुझे मेरी माँ के पास क्या कभी नहीं जाने दोगी?’’ एक दिन बड़े साहस से नन्हीं रजुला ने पूछ ही लिया। प्रश्न के साथ-साथ उसकी कटोरी-सी आँखें छलक आईं।

‘‘पगली लड़की, हमारे माँ-बाप कोई नहीं होते, समझी? तेरा पेशा तेरी माँ, और तेरा हुनर तेरा बाप है। खबरदार जो आज से मैंने तेरी आँखों में आँसू देखे।’’
रजुला ने सहमकर आँखें पोंछ लीं।
चन्दन का उबटन लगाकर तीन-तीन नौकरानियाँ उसे नहलातीं। बादाम पीसकर, गाय के घी में तर-बतर हलुवा बनाकर उसे खिलाया जाता और वह रियाज करने बैठती। हिंडोले पर बेनजीर उसके एक-एक स्वर और आलाप का लेखा रखती, जौनपुरी, कान्हड़ा, मालगुंजी, शहाना, ललित, परज जैसी विकट राग-रागिनियों की विषम सीढ़ियाँ पार कर, वह संगीत के जिस नन्दनवन में पहुँची, वहाँ क्षणभर को बत्तीस मौसियों के लाड़-भीने चेहरे स्वयं ही अस्पष्ट हो गए, वह धीरे-धीरे सबको भूलने लगी। अब वह सोलह वर्ष की थी, कई बार उसके घर से माँ ने चिट्ठियाँ भेजीं, पर उसे घर जाने की अनुमति नहीं मिली। तंग चूड़ीदार का दिलपसन्द रेशम, उसकी पतली किशोर टाँगों की पिंडलियों को स्पष्ट कर देता, रेशमी कुर्ते के हीरे के बटन जगमगाकर देखनेवाले की दृष्टि बरबस उस सलोने चेहरे पर जड़ देते। किशोरी बनाते-बनाते जैसे विधाता ने उसे फिर बचपन लौटा दिया था। छरहरे शरीर पर उभार और गोलाई नाममात्र को थी, जैसे नवतारुण्य स्पर्शमात्र कर लौट गया हो। आँखें बड़ी नहीं थीं, किन्तु काले भँवरे-सी पुतलियाँ, चंचल तितलियों-सी थिरकती रहतीं, गालों की दोनों हड्डियों ने बड़े ही मोहक ढंग से उठकर चेहरे को कुछ-कुछ मंगोल-सा बना दिया था। नाक भी छोटे-से चेहरे के ही अनुरूप थी, एकदम छोटी-सी। बादाम रोगन और बटेर का शोरबा भी छरहरे शरीर को अधिक पुष्ट नहीं कर सका था, किन्तु उस सुन्दरी बालिका का सौन्दर्य ही उसके उड़नछू व्यक्तित्व में था। लगता था, यह मानवी नहीं, स्वर्ग की कोई स्वप्न-सुन्दरी अप्सरा है, हाथ लगाते ही उड़ जाएगी।

बेनजीर, इसी से उसे बड़े यत्न से रुई की फाँकों में सहेजकर रखती थी, वह उसका कोहनूर हीरा थी, जिसे न जाने कब कोई दबोच ले। रजुला भी उसका आदर करती थी किन्तु स्नेह? भयंकर प्रतिहिंसा की ज्वाला की भभक थी उसके हृदय में, बस चलता तो छुरा ही भोंक देती।

बेनजीर की हवेली के बगल में सटी एक और हवेली थी, सेठ दादूमल की। ठीक रजुला के कमरे के सामने ही, छोटे सेठ का कमरा था। बहुत वर्षों तक सेठजी मारवाड़ में रहने के पश्चात् हाल ही में पुत्र का विवाह कर हवेली में लौट आए थे। एक दिन रजुला ने देखा छोटे सेठ के कमरे का नीला पर्दा ऊपर उठा है और एक काली भुजंग-सी औरत, अपनी मोटी कदलीस्तम्भ-सी जंघा पर, एक साँवले युवक का माथा रखकर, उसके कान में तेल डाल रही है। युवती इतनी काली और मोटी थी कि रजुला को जोर से हँसी आ गई। हड़बड़ाकर युवक उठ बैठा, हँसी का अशिष्ट स्वर आवश्यकता से कुछ अधिक ही स्पष्ट हो गया होगा, इसी से उसने लपककर खिड़की जोर से बन्द कर दी। सेठ दादूमल का बेटा है यह, रजुला सोचने लगी। सेठजी बेनजीर के खास मिलनेवालों में थे। कोई कहता था कि हवेली भी उन्होंने बेनजीर को भेंट दी थी। उनका पुत्र माँ की मृत्यु हो जाने से ननिहाल ही में पलकर बड़ा हुआ था, इसी से पहले कभी उसे देखा हो ऐसी याद रजुला को नहीं थी। ‘हाय हाय, यही थी सेठ कक्का की बहू’ वह सोचने लगी और बेचारे छोटे सेठ पर उसे तरस आ गया। सुना, वह किसी बहुत बड़े व्यवसायी की इकलौती पुत्री थी और उन्होंने एक करोड़ रुपए का मुलम्मा चढ़ाकर यह अनुपम रत्न, छोटे सेठ को गलग्रह रूप में दान किया था।

रजुला को उस दिन सपने में भी छोटा सेठ ही दिखता रहा। कैसा सजीला जवान था, फिनले की मिही धोती ही बाँधे था, ऊपर का गठीला बदन नंगा था और गले में थी एक सोने की चैन। और कोई ऐसे सोने का लॉकेट पहन लेता तो जनखा लगता, पर कैसा फब रहा था! सोलह वर्ष में पहली बार पुरुष के रहस्यमय शरीर की इस अपूर्व गठन ने रजुला को स्तब्ध कर दिया। हाय-हाय, छाती पर कैसे भालू के-से बाल थे, जी में आ रहा था वह अपनी चिकनी हथेली से एक बार उस पुष्ट वक्षस्थल को सहला ले। कलाई कैसी चैड़ी थी, जैसे शेर का पंजा हो।

फिर तो रोज ही छोटा सेठ उसे दिखने लगा। जान-बूझकर ही वह खिड़की के पास खड़ी होकर चोटी गूँथती, कभी सन्तरे की रसीली फाँक को चूस-चूसकर अपने रसीले अधरों की लुनाई को और स्पष्ट कर देती। पुरुष को तड़पा-तड़पाकर अपनी ओर खींचने की ही तो उसे शिक्षा दी गई थी। जैसे काली कसौटी पर सोने की लीक और भी अधिक स्पष्ट होकर दमक उठती है, बदसूरत नई सेठानी को नित्य देखती, छोटे सेठ की तरुण कलापारखी आँखों की कसौटी में रजुला सोने की लीक-सी ही दमक उठी। वह सन्तरा चूस-चूसकर, नन्हें-से ओंठ फुला-फुला एक फाँक छोटे सेठ की ओर बढ़ाकर, दुष्टता से आँखों ही आँखों में पूछती ‘खाओगे?’ वह दीन याचक-सा दोनों हाथ साधकर, फाँक पकड़ने खड़ा हो जाता तो वह चट से फाँक अपने मुँह में डाल, उसे ठेंगा दिखाकर खिड़की बन्द कर देती। छोटा सेठ खखारता, खाँसता, गुनगुनाता और उसकी हर खखार, खाँसी और गुनगुनाहट में उसके प्रणयी चित्त की व्याकुलता स्पष्ट हो उठती; जैसे कह रही हो ‘खिड़की खोलो, वरना मैं मर जाऊँगा।’

आईने में अपने हर नैन-नक्श को सँवारकर धीरे-धीरे खिड़की का मुँदा पट खोलकर रजुला मुस्कराती और बादलों में छिपी स्वयं चन्द्रिका ही मुस्करा उठती। प्रणय का यह निर्दोष आदान-प्रदान छोटी सेठानी और बेनजीर की जासूसी दृष्टियों से बचकर ही चलता। जिस किशोरी के लावण्य को बेनजीर के यूनानी नुस्खे भी पुष्ट नहीं बना सके थे, उसे छोटे सेठ की मुग्ध दृष्टि ने ही जादू की छड़ी-सी फेरकर अनुपम बना दिया। गालों पर और ललाई आ गई, आँखों में रस का सागर हिलोरें लेने लगा, जाने-अनजाने कटाक्ष चलने लगे और रसीले अधर किसी के निर्मम स्पर्श तले कुचलकर अपना अस्तित्व खो बैठने को व्याकुल हो उठे।

एक बार शहर में बहुत बड़ी सर्कस कम्पनी आई थी। बेनजीर ने अपने दल के लिए भी टिकट खरीदे, पर्दे तानकर फिटन जोत दी गई। बिना पर्दे के बेनजीर की हवेली का परिन्दा भी हवा में नहीं चहक सकता! तब चैक की कोठेवालियों की आँखों में भी ऐसी सौम्यता थी, जो अब दुर्भाग्य से उच्च कुल की वनिताओं की दृष्टि में भी नहीं रही है। उनकी वेशभूषा की शालीनता, बड़े-बड़े घर की बहू-बेटियों की शृंगार-शालीनता को मात करती थी। मजाल है कि कुर्ते का गला जरा-सा भी नियत सीमा को लाँघ जाए! गर्दन की हड्डियाँ तक परदे में दुबकी रहतीं। ऐसे ही शालीन लिबास में, बेनजीर ने रजुला को सजा दिया। उसकी छोटी-छोटी असंख्य गढ़वाली चोटियाँ कर, उसकी न्यारी ही छवि रचा दी। वह पहाड़ी हिरनी थी, पहाड़ी दिखने में ही उसका सौन्दर्य सार्थक हो उठेगा। चूड़ीदार के बदले, उसने आज सोलहगजी मग्जीदार ऊँचा लहँगा पहना था, जिसकी काली मग्जी से पाजेब छमकाते उसकी लाल-लाल एड़ियोंवाले सफेद पैर दो पालतू कबूतर-से ही ठुमक रहे थे। कानों में बड़े-बड़े कटावदार झुमके थे और गले में भी पहाड़ी कुन्दनिया चम्पाकली। इस शृंगार के पीछे भी बेनजीर की शतरंजी चाल थी। आज वह वलीअहद, ताल्लुकेदार और मनचले रईसजादों की भीड़ के बीच रजुला के रूप की चिनगारी छोड़कर तमाशा देखेगी। कौन होगा वह माई का लाल, जो मुँहमाँगे दाम देकर इस अनमोल हीरे को खरीद सकेगा!

वह रजुला को लेकर सर्कस के तम्बू में पहुँची कि साइकिल चलाता भालू, चरखा चलाता शेर और नंगी जाँघों के दर्पण चमकाती सर्कस-सुन्दरियाँ फीकी पड़ गईं। सबकी आँखें रजुला पर गड़ गईं।

रजुला ने पहले कभी सर्कस का खेल नहीं देखा था, इसी से खेल शुरू हुआ तो वह जोकर के सस्ते मजाक देखकर, पेट पकड़-पकड़कर हँसती-हँसती दुहरी हो गई। कभी शेर की दहाड़ सुनकर, भय से काँपती बेनजीर की गद्दीदार ऊँची छाती पर जा गिरती और शेर को मार गिराने को, कितने ही तरुण कुँवरों की भुजाएँ फड़कने लगतीं।

सेठ दादूमल का बेटा भी अपनी भोंड़ी भुजंगिनी को लेकर तमाशा देखने आया था, पर उसकी दृष्टि सर्कस के शेर-भालुओं पर नहीं थी, वह तो रजुला को ही मुग्ध होकर देख रहा था। रजुला ने भी देखा और मुस्कराकर गर्दन फेर ली। छोटा सेठ तड़प गया, कहाँ लाल बहीखातों के बीच उसका शुष्क जीवन और कहाँ यह सौन्दर्य की रसवन्ती धारा! वह घर लौटा तो रजुला की खिड़की बन्द थी। मन मारकर लौट गया और जब उसकी सेठानी अपनी पृथुल तोंद हिलाती, खर्राटे भरने लगी तो वह फिर ऊपर चला आया। रजुला के कमरे में नीली बत्ती जल रही थी, खिड़की खुली थी, एक-एक कर अपने पटाम्बर उतारती वह गुनगुना रही थी। छोटे सेठ का दिल धौंकनी-सा चलने लगा। कैसी गोल-गोल बाँहें थीं, शंख-सी ग्रीवा पर पड़ी लाल-लाल मूँगे की माला किस बाँके अन्दाज से उठ-उठकर गिर रही थी, उसने ओढ़नी भी उतार दी। छोटा सेठ सौन्दर्य-सुषमा की इस अनोखी पिटारी को आँखों ही आँखों में पी रहा था। वह थोड़ा और बढ़ा और पर्दा हटाकर निर्लज्ज प्रणय-विभोर याचक की दीनता से खड़ा हो गया। रजुला भी पलटी, उसका चेहरा कानों तक लाल पड़ गया ऐसी मुग्ध दृष्टि से उसका यह पहला परिचय था। आज ठेंगा दिखाकर वह खिड़की बन्द नहीं कर सकी...

‘‘बड़े बदतमीज हैं जी आप।’’ कृत्रिम क्रोध से गर्दन टेढ़ी कर उसने कहा, ‘‘क्या नाम है आपका?’’

‘‘क्यों, क्या थाने में रपट लिखवानी है? तो यह भी लिखवा देना कि इसे फाँसी के तख्ते पर झूलना भी मंजूर है, पर यह इस खिड़की को नहीं छोड़ सकता।’’ आधा धड़ ही उसने खिड़की से इस तरह लापरवाही से नीचे को लटका दिया कि रजुला अपनी हथेली को ओठों पर लगाकर हल्के स्वर में चीख उठी, ‘‘हाय-हाय, करते क्या हैं? गिर जाइएगा तो?’’

‘‘आपकी बला से यहाँ सारी-सारी रात खिड़की से लटक-लटककर काट दी है।’’ सचमुच ही उसने दुर्दमनीय साहस से उचककर खिड़की की मुँडेर पर आसन जमा लिया और दोनों लम्बी-लम्बी टाँगें बाहर को झुला दीं। रजुला की खिड़की और उसकी खिड़की के बीच कोई दो-एक गज का फासला था, किन्तु बीच में थी भयानक खाई, कोई गिरे तो चुनकर भी हड्डियाँ न मिलें।

रजुला की खिड़की पर बाहर को निकली एक चौड़ी-सी सीमेंट की पाटी-सी बनी थी। उसने बड़े शौक से ही उसे अपने पालतू कबूतरों के लिए बनवाया था। वह उसी पर झुक गई। ‘‘क्या नाम है जी आपका छोटे सेठ?’’ हँसकर रजुला ने अपने पेशे का प्रथम कटाक्ष फेंका।
‘‘लालचन्द, और तुम्हारा?’’
‘‘हाय-हाय, जैसे जानते ही नहीं।’’
‘‘मैं तुम्हारा एक ही नाम जानता हूँ और वह है रज्जी, तुम्हारी अम्मी तुम्हें पुकारती जो रहती है, कभी आओ ना हमारे यहाँ!’’

‘‘आपके यहाँ!’’ रजुला जोर से हँसी, ‘‘सेठानी मुझे झाड़ई मारकर भगा देगी, आप ही आइए न!’’ रात्रि के अस्पष्ट आलोक में उसका यह मीठा आह्नान लालचन्द को पागल कर बैठा, ‘‘सच कहती हो? आ जाऊँ? लगा दूँ छलाँग?’’

‘‘आए हैं बड़ी छलाँग लगानेवाले, पैर फिसला तो सड़क पर चित्त ही नजर आएँगे।’’ रजुला ने अविश्वास से अपने होंठ फुला-फुलाकर कहा। वह इतना कहकर सँभली भी न थी कि छोटा सेठ सचमुच ही बन्दर की-सी फुर्ती से उसकी बित्तेभर की मुँडेर पर कूदा और लड़खड़ाकर उसी पर गिर पड़ा।
रजुला के मुँह पर हवाइयाँ उड़ने लगीं ‘हाय-हाय, अगर यह गिर जाता तो’, वह सोच-सोचकर काँप गई। उसका सफेद चेहरा देखकर लालचन्द ठठाकर हँस पड़ा, ‘‘कहो, लगाई न सर्कसी छलाँग?’’

‘‘हाय-हाय, कितनी जोर से हँस गए आप, अम्मी ने सुन लिया तो मेरी बोटी-बोटी कुत्तों से नुचवा देंगी। इतनी रात को मेरे कमरे में आदमी!’’ उसकी आँखों में बेबसी के आँसू छलक उठे।

‘‘लो, कहो तो अभी चल दूँ?’’ वह साहसी उद्दंड युवक फिर छलाँग लगाने को हुआ तो लपककर रजुला ने दोनों हाथ पकड़कर रोक लिया। एक-दूसरे का स्पर्श पाकर दोनों क्षणभर को अवश पड़ गए। रजुला ने आँखें मूँद लीं। यह उसके जीवन का एकदम ही नया अनुभव था। लालचन्द ने उसे बढ़कर बाँहों में भर लिया, ‘‘जानती हो रज्जी, मैं कब से तुम्हारे लिए दीवाना हूँ? जब तुम गाती थीं, मैं इसी खिड़की पर कान लगाए सुनता था, तुम चोटी गूँथती थीं और मैं छिप-छिपकर तुम्हें देखता था, तुम अपनी शरबती आँखों में सुरमा डालती थीं और मैं...’’

‘‘बस कीजिए, उफ’’, काँप-काँपकर रजुला उसकी बाँहों में खोई जा रही थी, गलती जा रही थी, जैसे गर्म आँच में धरी मक्खन की बट्टी हो। ‘‘नहीं-नहीं, आज नहीं यह सब नहीं,’’ वह उसके लौहपाश में नहीं-नहीं कहती सिमटती जा रही थी। एकाएक स्वयं ही लालचन्द ने बन्धन ढीला छोड़ दिया, ‘‘अच्छा रज्जी, कोई बात नहीं, पर याद रखना मैं फिर कल आऊँगा।’’ दोनों हाथों से उसका मुँह थामकर लालचन्द झुका, अधर स्पर्श करने का उसे साहस ही नहीं हुआ। हे भगवान्, यह तो उसकी तिजोरी के ऊपर टँगी स्वयं साक्षात् लक्ष्मीजी का-सा चमकता रूप था। हाथीदाँत-से शुभ्र ललाट को चूमकर वह उचककर खिड़की की मुँडेर पर चढ़ गया।

‘‘हाय-हाय, ऐसे मत कूदिए,’’ विकल-सी होकर रजुला पीछे-पीछे चली आई। बड़ी ममता से, बड़े दुलार से निहारकर, लालचन्द ने एक ही छलाँग में दूरी पार कर ली। पलक मारते ही वह अपने कमरे में खड़ा मुस्करा रहा था।

इसी सधी छलाँग ने रात, आधी रात, वर्षा, तूफान, ओले सबको जीत लिया। लालचन्द का साहस दिन दुगुना और रात चैगुना बढ़ने लगा। तीन महीने बीत गए, छोटी सेठानी मायके चली गई थी। अब पूरी आजादी थी। दोनों अभी प्रेम से चहकते उन कबूतरों के जोड़े-से थे जिन्हें बन्धन का कोई भय नहीं था, भूत और भविष्य के काले बादलों से उनके निद्र्वन्द्व जीवन का आकाश अभी तनिक भी नहीं घिरा था। खिड़की के पास दोनों बाँहें फैलाए रजुला खिलखिलाकर कभी सहसा पीछे हट जाती और भरभराकर लालचन्द पलँग पर ही औंधा गिर पड़ता। कभी सूने कमरे में उसे न पाकर वह व्याकुल होकर इधर-उधर देखता और वह पलँग के नीचे से पालतू बिल्ली की तरह, मखमली पंजे टेकती मुस्कराती निकल आती।

‘‘कभी तेरी अम्मी पकड़ ले तो?’’ वह अपनी गोदी में लेटी रजुला के सलोने चेहरे से अपना चेहरा सटाकर पूछता।

‘‘तो क्या, कह दूँगी, यह चोर-उचक्का मुझे छुरा दिखाकर कह रहा था खबरदार जो शोर मचाया, बता तेरी अम्मी चाभी कहाँ रखती हैं।’’
‘‘हाँ, यही तो कहेगी तू, आखिर है तो...’’ कहकर वह दुष्टता से मुस्करा उठता। पेशे का अस्पष्ट उल्लेख भी उसे कुम्हला देता। वह उदास हो जाती और लाख मानमनव्वलों में पूरी रात ही बीत जाती। कभी मुल्ला की अजान से ही दोनों अचकचाकर जगते और क्षणभर में छलाँग लगाकर वह लौट जाता।

‘‘कल तेरी अम्मी भी तो मलीहाबाद जा रही है, मैं सात ही बजे आ जाऊँगा रज्जी,’’ उसने कहा।

पर वह कल कभी नहीं आई, लालचन्द के रसीले चुम्बनों के स्पर्श से धुले, रजुला के अधर अभी सूखे भी नहीं थे कि तीन महीने में पहली बार बाँका लालचन्द अपनी सर्कसी छलाँग न जाने कैसे भूल गया। उसकी सधी छलाँग खिड़की तक पहुँचकर ही फिसल गई। धमाके के साथ, वह चैमंजिले से एकदम पथरीली सड़क पर पड़ा और एक हृदयभेदी चीत्कार से गलियाँ गूँज गईं। पागलों की तरह रजुला शायद स्वयं भी खिड़की से कूद जाती पर न जाने कब बन्द द्वार भड़भड़ाकर, चिटकनी सटका स्वयं अम्मी उसे पकड़कर खड़ी हो गई।

‘‘पागल लड़की, मैं जानती थी कि तेरे पास कोई आता है, तेरे बदन से मर्द के पसीने की बू को मैंने सूँघ लिया था। ठीक हुआ अल्लाह ने बेहया को सजा दी, आज ही मैं छिपकर उसे पकड़ने को थी, पर अल्लाताला ने खुद ही चोर पकड़ लिया।’’

तिलमिलाकर, क्रुद्ध सिंहनी-सी रजुला, बेनजीर पर टूट पड़ी। पर बेनजीर ने एक ही चाँटे से उसे जमीन पर गिरा दिया। सेठ की हवेली से आते विलाप के स्वर, उसके कलेजे पर छुरियाँ चलाने लगे कानों में अँगुली डाले वह तड़पती रही। द्वार पर ताला डालकर उसे रोटी-पानी दे दिया जाता। पाँचवें दिन वह बड़े साहस से खिड़की के पास खड़ी हो गई, उसके बुझे दिल की ही भाँति सेठ के कमरे में भी काला अँधेरा था। नित्य की भाँति घुटनों तक धोती समेटे, छलाँग लगाने को तत्पर, हँसी के मोती बिखेरता उसका छैला, छोटा सेठ अब कहीं नहीं था। इसी मुँडेर पर उसके युगल चरणों की छाप, अभी भी धूल पर उभरी पड़ी थी। आँसुओं से अन्धी आँखों ने उसी अस्पष्ट छाप को ढूँढ़ निकाला और वह उसे चूम-चूमकर पागल हो गई। ‘छोटे सेठ’, वह पागलों की भाँति बड़बड़ाती, चक्कर काटती द्वार पर पहुँची। रोटी रखकर, पठान दरबान शायद अफीम की पिनक में ताला-साँकल भूल गया था। रजुला ने द्वार खोला और दबे पैरों सीढ़ियाँ लाँघकर, बदहवास भागने लगी। सुबह बेनजीर ने खुला द्वार देखा तो धक रह गई। रजुला भाग गई थी, बाल नोचती, बौखलाती, बेनजीर अपनी नगाड़े-सी छातियों पर दुहत्तड़ चलाती चीख-चीखकर रोती रही पर रजुला नहीं लौटी। बेनजीर का कोहनूर हीरा खो गया।

जिस कुमाऊँ की वनस्थली ने उसे एक दिन नियति के आदेश से दूर पटक दिया था, वही उसे बड़ी ममता से फिर पुकार उठी। रजुला ने वही पुकार सुन ली थी। ओठों पर पपोटे जम गए थे, एड़ियाँ छिल गई थीं, बालों में धूल की तहें जम-जमकर जटाओं-सी लगने लगी थीं। बत्तीस मौसियों का प्रासाद एकदम ही उजड़ गया था, बाहर एक बूढ़ा-सा चैकीदार ऊँघ रहा था। ‘‘सुनो जी, वहाँ जो नैक्याणियाँ रहती थीं वह क्या कहीं चली गईं?’’ डर-डरकर उसने पूछा।

चौंककर बूढ़ा नींद से जग गया, ‘‘न जाने कहाँ से आ जाती हैं सालियाँ। एकादशी की सुबह-सुबह उन्हीं हरामजादियों का पता पूछना था, सती सीता, लक्ष्मी, पार्वती थीं बड़ी! मर गईं सब! और पूछना है कुछ?’’ सहमकर रजुला पीछे हट गई, बूढ़े के ललाट पर बने वैष्णवी त्रिपुण्ड को देखकर उसे अपनी अपवित्रता और अल्पज्ञता का भास हुआ, ‘‘माफ करना महाराज, मुझे बस यही पूछना था जब मर ही गईं तो और क्या पूछूँ!’’ वह मुड़ गई।

‘‘देख छोकरी, सुबह-सुबह झूठ नहीं बोलूँगा। सब तो नहीं मरीं, तीन बच गई थीं, एक तो देबुली, पिरमा और धनिया। तीनों गागर में नेपाली बाबा के आश्रम में हैं। बड़ा बाबा बनता है साला, जनम पातरों की सोहबत में गुजारी बुढ़ापे में फिर हरामियों को बटोर लिया। तीन तो हैं चैथी आज पहुँच जाएगी।’’ घृणा से उसकी ओर थूककर बूढ़ा पीठ फेरकर माला जपने लगा।

कँटीली पगडंडियाँ पार कर वह पहुँच ही गई। वह जानती थी नेपाली बाबा ही उसके नाना हैं, क्या उसे स्वीकार नहीं करेंगे। उनके चरणों में पड़ी ईश्वर-भजन में ही वह भी जीवन काट लेगी। धूनी के धुएँ को चीरकर वह गुफा में जा पहुँची। उसके चेहरे को देखकर ही उसे सबने पहचान लिया।

मोतिया का ठप्पा ही तो था, उसके चेहरे पर। बूढ़ी देबा ने उसे टटोल-टटोलकर ही देखा, उसकी आँखें जाती रही थीं, प्रेमा के सौन्दर्य को समय भी नहीं छीन सका था और धना मौसी को अभी भी रजुला के बचपन की एक-एक घटना याद थी। बाबा गोरखपन्थी थे, इसी से सबको कनफड़ा बालियाँ पहनाकर दीक्षा दे दी थी। जिन कानों में बेनजीर के पन्ना, पुखराज और नीलम झूलते थे, उन्हीं में सींग के बड़े-बड़े कनफड़ा बाले लटकाकर, रजुला ने भी एक दिन जिद कर दीक्षा ले ली। कभी वह धूनी रचाती, कभी प्रसादी बनाती और कभी देवा आमा की बात से लुंजपुंज देह पर, डोलू की जड़ी गरम कर सेंक करती। कभी-कभी नेपाल, गढ़वाल और तिब्बत से आए गोरखपन्थी साधुओं के अखाड़े आ जुटते, दल से गुफा भर जाती और भंडारे की धूम के बाद झाँझ, खड़ताल और मँजीरे के साथ स्वर-लय-विहीन गाने चलते। बड़े अनुनय से नेपाली बाबा एक दिन बोले, ‘‘तू गा ना मेरी लली, एक-आध सुना दे ना, तूने तो लखनऊ के उस्तादों से गाना सीखा है।’’

निष्प्रभ आँखों में बिसरी स्मृतियों का सागर उमड़ उठा। कभी किसी ने उसके कितने गाने छिप-छिपकर सुने थे। फिर कितने गाने उसने सुना-सुनाकर रात ही बिता दी थी, पर उस मनहूस रात को जब उसने ‘चले जइयो बेदरदा मैं रोय मरी जाऊँ’, सुनने की फरमाइश की थी तो उस करमजली ने कहा था ‘‘उँह, आज नहीं कल सुनिएगा, मैं कहीं भागी थोड़े ही जा रही हूँ।’’ भाग तो वे ही गए थे। अब वह किसके लिए गाएगी?

‘‘क्यों बेटी, नहीं सुनाएगी?’’ नेपाली बाबा का आग्रह कंठ में छलक उठा। पर स्वर-लय नटिनी तो वहाँ होकर भी नहीं थी। वह तो धूनी को एकटक देखती, न जाने किस अतीत के चिन्तन में डूबी थी। बाबा का आदेश सुनकर चैंकी, ‘‘मुझे गाना नहीं आता बाबा’’, कहकर उसने उठकर धूनी में लकड़ियाँ लगाईं और आग फूँकने का उपक्रम करने लगी। ‘‘अरे राम-राम, बड़ा धुआँ है’’, बड़ी ममता से बाबा ने कहा, ‘‘तेरी आँखों से तो पानी बहने लगा। अरी पिरमा, तू मार दे तो फूँक, इस बेचारी की तो आँखें ही लाल हो गईं।’’ उदास हँसी हँसकर पिरमा उठी और आग फूँकने आई, पर वह तो रजुला की आँखों के पानी का इतिहास जानती थी, वह क्या लकड़ी के धुएँ का पानी था?

भोले बाबा से वह कैसे कहे कि इस धूनी को फूँक-फाँककर तो वह धुआँ मिटा देगी, पर जो उस छोकरी के हृदय में निरन्तर एक धूनी धधक रही है, उसका धुआँ भी क्या वह फूँक मारकर हटा सकेगी?

 
 
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