Chatoron Ki Vyatha: Swapnil Srivastava Ishoo

चटोरों की व्यथा (व्यंग्यात्मक लेख): स्वप्निल श्रीवास्तव (ईशू)

नमस्कार! आज आपका ध्यान उन कुछ मुद्दों पर जो समाज़ ने नकार रखा है….न तो मीडिया में कवरेज मिलेगी न सोशल मीडिया में। घरों को पलायन करते कामगार मज़दूर हो, बिगड़ती अर्थव्यवस्था हो, चाइना हो या पेट्रोल के दाम, हर मुद्दे पर बात करने के लिए दसियों बुद्धिजीवी बैठे है टीवी चैनलों पर।

पर आज बात एक ऐसे मुद्दे की जो भले ही इतना ज्वलंत न लगें पर समाज़ के एक वर्ग के लिए काफी मायने रखता है । खैर किसी न किसी को तो पक्ष रखना ही था , मीडिया न सही हमारी कलम सही । उम्मीद करता हूँ, उस वर्ग के दर्द को आप तक पहुंचा पाऊंगा।

आज बात उस वर्ग की जो बिना किसी स्वार्थ या हीनभावना के समाज में स्वाद की परिभाषा का विस्तारीकरण करता रहा है। जी हां बात जंक-फूड , स्ट्रीट-फूड के उन निष्ठावान उपभोक्ताओं की जिन्हें हम आम बोल चाल की भाषा में “चटोरे” बोलते आये हैं।

वैश्विक महामारी क्या आई बेचारे स्वाद ही भूल गए ….क्या बच्चे, क्या आदमी और क्या औरतें, चटोरों की बिरादरी पर ऐसी गाज़ गिरी कि दर्द भी बयां न कर सके। सरकार ने तो खानापूर्ति कर दी, बोल दिया कि टेक-अवे चालू हैं। अब सरकार को भला कौन समझाए कि पानीपुरी की दुकान पर सी-सी करते बोलना कि “भईया, एक सूखी पापड़ी देना मीठी चटनी के साथ”, ये वाली फीलिंग कौन से टेक- अवे में आती है।

कहां रोज़ शाम ऑफिस से लौटते समय ट्रांस्पेरेंट थैली में अखबार के लिफ़ाफ़े में रखे समोसे…..लिफ़ाफ़े पर उभरने वाले तेल के निशान बता दिया करते थे कि समोसे गरम हैं। गेट की आवाज़ सुनते ही बीवियां चाय चढ़ा दिया करतीं थी। अब तो वर्क फ्रॉम होम है। अच्छा, ऐसा नहीं है कि कोशिश न की हो पर समझ ही न आया कि समोसा खा रहे है या आलू भरी पूरी। अब कहाँ प्रोफेशनल हलवाई और कहाँ यू-ट्यूब के नौसीखिये। अरमान दिल के दिल में ही रह गये।

ऐसी ही हालत कुछ लाल , नीली , पीली मोटरसाइकिल पर उसी रंग के हेलमेट में आने वाले दूतों का इंतज़ार करने वालों की है। अब तो ऐसा लगता है जैसे आंखे पत्थर हो गयी हो। एक समय था कि सोसाइटी में विज़िटर के नाम पर सिर्फ डिलेवरी बॉय ही दिखते थे। हालत ये थी कि सोसाइटी का वॉच मैन मोटरसाइकिल का रंग देख कर बता देता था कि किस फ्लैट का आर्डर है….। क्या पिज़्ज़ा, क्या बर्गर, क्या हक्का नूड्ल्स सारे स्वाद छिन गए। अब कहां बाज़ार का स्वाद और कहां घर का, लगता ही नहीं वही डिश खा रहे हों।

एक और दर्द इसी वर्ग की महिला शाखा का जिनकी सारी सहूलियत ही छीन ली इस लॉकडाउन ने। कहां हर चौथे दिन स्पीड डायल पर पती को फ़ोन किया और बोला, “सुनो! आज कुछ बाहर से आर्डर कर लेते है….।” पती भी बेचारा, कौन दिमाग खपाए, अभी मना कर दो तो दो दिन ख़राब। ऐसे पीड़ित पतियों को तो जैसे बदले का मौका मिल गया हो। टेक-अवे तो था पर करोना -करोना बोल कर सारा हिसाब पूरा कर लिया। ऊपर से रोज़ नया वीडियो पकड़ा देते हैं कि, “जानू! आज ये वाली डिश ट्राई करते हैं।” यू-टयूबर्स का क्या है सब्सक्राइबर बढ़ाने के लिए बोल दिया बाज़ार जैसा कबाब घर पर बनाएं , कभी ट्राई किजिए और बोलिये क्या है वही स्वाद? अजी कितनों ने तो मन्नत मांग ली है कि, करोना ख़तम हो और ये वर्क फ्रॉम होम की बला टले।

अब समाज़ को कौन समझाये कि, एक भोलेनाथ थे जिन्होंने पृथ्वी बचाने के लिए हलाहल पी लिया था, और एक ये चटोरे है जो जंक फ़ूड खा खा कर न सिर्फ अपना पेट भरते है बल्कि लोकल से ले कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कितने ही कर्मचारियों का पेट पालते हैं।

एक जिम्मेदार लेखक कि तरह मैंने तो चटोरों की व्यथा आप तक पहुंचा दी। अब दुआ कीजिए कि जल्द करोना खत्म हो और बाज़ारों में वापस वही रौनक लौटे।

 
 
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