Babhruvahan Jaishankar Prasad

बभ्रुवाहन जयशंकर प्रसाद

प्रथम परिच्छेद
मणि-प्रभापूर मणिपुर नगर के प्रान्त में एक उद्यान के द्वार पर प्रतीची दिशा-नायिकानुकूल तरणि के अरुण-किरण की प्रभा पड़ रही है। वासन्तिक सान्ध्य वायु का प्रताप क्रमश: उदय हो रहा है, पूर्व दिशा में अपूर्व सुन्दर चन्द्र की मलिन आभा दिखाई दे रही है। अहा! नीलाम्बरवृत विधुबदनी के बदन के समान स्वच्छ नीलाम्बर में यह चन्द्र कैसा सुन्दर दिखाई दे रहा है—

धवल मनोहर दृष्टि सुख दायक हिय अनुराग;
मनहु सुधा के बिम्ब में, लपट्यो नलिन-पराग।
नव घन, सुन्दर श्यामा उर, मनहुँ हीरकाभास;
कालिन्दी जल नील में कै अरविन्द विकास।
अन्धकार का अधिकार तो सर्वत्र हो गया है; परन्तु चन्द्रमुख के समीप कृष्ण केश-भार के अन्धकार के समान ज्योत्सना-सम्मिलित अन्धकार में एक पथिक उसी द्वार पर आया और स्थान के लिए इधर-उधर दृष्टि दौड़ाने लगा।
अकस्मात् एक मनुष्य उसी द्वार से बाहर हुआ और एक अपरिचित मनुष्य को देखकर पूछा—”आप कौन हैं?”—उत्तर मिला—”भ्रान्त पथिक” किन्तु साथ ही उसके—

आयत उज्ज्वल भाल, करिकर गञ्जन कर युगल;
विलुलित कुन्तल जाल, वृषभ-कंध राजीव चरु।
अति ही सुभग सरूप, राजत कोटिहुँ मार-छवि;
मुख बिधु को प्रतिरूप, मिश्रित वीर-शृंगार-रस।
देखत जन हरषाहिं, कलित कलेवर कलभ सम;
अरिगण हिये डराहिं बिकट भृकुटि तट लखे जेहि।
वीर वेश सज्जित कृपाण कटि माहिं सुछाजत;
भरे निषंग तुणीर पृष्ठ कर चाप सुराजत।
अमित स्वेद-कण अंग मांहि मुक्ता झलकावत;
किंधौं नीरधर नीरविन्दु भरि अति सुख पावत।
सकल सुजनता खान सों शील निवास प्रकाश युत;
मुख विनोद बरसत अमल, ममता लहै न सिन्धु सुत।

देखकर उपवन-रक्षक ने प्रणामोपरान्त कहा—”यदि विश्राम करने की इच्छा हो, तो उपवन में चलिए।”
यह सुनकर पथिक मालाकार अनुगामी हुआ।
उपवन में प्रवेश करते मकरन्द-लोभी माहत ने पथिक के मुख-कमल से मधुरालिंगन करके श्रमल व मकरन्दबिन्दु को आहरण कर लिया। फिर वह युवक उपवन की शोभा देखने लगा—

लसै लोनी लता लपटी तरु ते, सुमनावली भारझुकी-सी परै;
छकि मोद मधू त्यों मिलिन्द बधू लुरि फूलन पै अरसी-सी परै।
कल कोकिल कीरन को कलनाद विपञ्ची सुचारु बजी-सी करै ;
मकरन्द सों पूरि रही पुहुमी सुख सौरभ सीसी खसी-सी परै।
यों ही पद-सञ्चालन करते तथा चन्द्रिका में चमत्कृत चञ्चरीक मंज गुञ्जित प्रफुल्ल पुष्पावली पर दृष्टिपात करते हुए युवक पथिक मालाकार के बताये स्थान पर सब वस्त्र और शस्त्र उतारकर सन्ध्यावन्दन के लिए सरोवर के मुख्य तीर पर गया। नित्य कृत्य से कृतकृत्य होकर पथिक प्राकृत सुषमा निरखने लगा—

नील सरसी सलित कंज, सुनील प्रफुलित चारु;
नील नभ उज्ज्वल अनन्त, गम्भीर तासु अगारु।
निशाच्छादित राजही, अति नील तरुवर पुंज;
कोकिला कलरव कलापी, कीर कूजत कुञ्ज।
कौमुदी प्रतिबिम्ब सरसी जल करत सुकलोल;
पवन विचलित जल लहरि, लीला धरति इमि लोल।
मनहु रतनाकर लुटावट रतन गन एहि भाँति;
कबहुँ हीरक पांति पारत कबहुँ नीलम पाँति।
व्योम वारिधि मीन फाँसन निशा महिषी हाल;
तारकावलि ज्यों बिखेर्यो तोरि मुकता-माल।
निशाकर निज कर पसारि सुधा मधुर परिपूर!
प्रकृति-लीला को हँसावत छिरकि रजत सुचूर।

युवक पथिक दृश्य के सौन्दर्य-सागर में निमग्न था, और प्रसन्न मन से देख रहा था कि अकस्मात् उसके कर्ण कुहर में किसी कामिनी का एक कण्ठरव सुनाई पड़ा—

बिकसहु कमलिनि कली-निकर निज सौरभ सो भरि;
उठहु कुसुम सर साधि कुसुम धनु निज कटि दृढ़ करि।
मुदित होहु चकई के युगल दृगञ्चल चञ्चल;
उदय भयी है प्रिय दर्शन दर्शन अवसर भल।

विपञ्चीध्वनि विमोहित मन्त्र मृग के समान उसी मधुर स्वर का अनुसरण करके वह युवक एक मत्त मिलिन्द-मिलित मालती-लता-मन्दिर के समीप पहुँचा, और लता की ओट से देखने लगा, तो उसे दो सुन्दरी उसमें बैठी दिखाई दीं, जो परस्र कुछ हँस-हँसकर वात्र्तालाप कर रही थीं।
एक बोली—सखि! चन्द्रमा क्यों इतना सुन्दर है? और उसी से रात्रि की शोभा क्यों होती है? देख—

मल्लिकादिक सुमन ते सुचि रच्यो धरनि वितान;
जटित हीरक-तार नभ पट सखी ओढि़ समान।
शीत सुरभित मलय मारुत विजन साचि चचैन;
सुधाकर सों मिलन बैठी स्वच्छ राका रैन।
दूसरी, जो कुछ उससे वयस्क थी, बोली-सखि! तुम्हें अभी इसका पूर्ण ज्ञान नहीं है। अभी तुम्हारे लिए सब वस्तु आनन्दमय है। देख—

शीतलाई सुधाकर में है नहीं सुनु साँच;
सखी! याके किरण में सुअनोखिये है आँच।
जौं न ऐसी होय तो क्यों विमल सरवर वारि;
बीच सरसिजि मुरझि के गिरि जाय लखु सुकुमारि।
अब तो युवक से न रहा गया! वह बोल उठा—

सुमुखि सुन्दर शील रूप सुवाल सुनु धरि कान;
यहै तो सबही कहै निज भाग्य है जु प्रधान।
सुधा सों परितृप्त हिय जाकी रहै अविराम;
ताहि निशि में निशानाथ अमन्द देत अराम।
इस अपरिचित शब्द को सुनकर प्रौढ़ा बाहर आई; परन्तु युवक को देखकर सहम कर खड़ी हो गयी, और कुछ क्रोधित होकर बोली—आप कौन हैं?
युवक—एक भ्रान्त पथिक।
प्रौढ़ा—इस उपवन में कैसे आये? क्या आपको यह नहीं ज्ञात कि राजकुमारी इस समय यहाँ हैं?
युवक—क्या यह मणिपुर की राजकुमारी हैं? यदि ऐसा हो, तो क्षमा कीजिये। सरले! भ्रान्त पथिक इस सम्वाद से अवगत नहीं था।
प्रौढ़ा—नहीं, आप अवश्य दण्डनीय हैं।
युवक—(हँसकर)—यदि ऐसा है, तो अधिकारी के समक्ष ले चलिए।
प्रौढ़ा—यह वाक्चातुरी रहने दीजिए......
राजकुमारी से न रहा गया, वह बोल उठी—सखी, क्या है?
युवक को साथ में लेकर प्रौढ़ा उस लता-मन्दिर के द्वार पर पहुँची। वास्तव में अधिष्ठात्री लता-मन्दिर ही की नहीं,—सुन्दरी सौन्दर्य-उपवन की अधिष्ठात्री वन देवी के समान थी।
उसका यौवन निविड़ कादम्बिनी में सौदामिनी के समान, अलक-पाश में हीरखण्ड के समान, मधुकर निकर अनास्वादित प्रफुल्लराजीव के समान, उज्ज्वल मधुर तथा मनोहर था।
किन्तु युवक का मनोहर अवयव भी अपनी समता न रखता था। जालबद्ध चकोर के समान सुन्दरी के युगल नेत्र निस्पन्द, निर्निमेष हो रहे थे। इधर मन्त्रमुग्ध के समान युवक उस नैसर्गिक सौन्दर्यमयी बाला का मुख निरीक्षण कर रहा था। सखी दोनों का यह अपूर्व दृश्य देखकर चकित हो गई, और हृदय दृढ़ करके बोली—राजकुमारी! देखो, यह महाशय निर्भय इस स्थान तक चले आये हैं, हमें ज्ञात होता है कि यह कोई चतुर व्यक्ति हैं, क्योंकि—
सूधे देखन में बने करत अटपटी बात। कपटी नाहर के मनहुँ छिपी नखन की पाँत।।
यदि आपकी आज्ञा हो, तो इन्हें प्रहरी की आज्ञा में भेज दिया जाय।
युवक (हँसकर)—
अलक-पाश सों बाँधि चहै राखि तो रहि सकै। किधौं रखैं अवराधि नतु हम बन्धन योगु नहिं।।
सखी (सक्रोध)—राजकुमारी की आज्ञा हो, तो तुम्हारी प्रगल्भता का फल तुम्हें अभी मिले।
युवक—उन्हीं की आज्ञा की अपेक्षा तो मुझे भी है, क्योंकि अब हम विश्राम करना चाहते हैं।
राजकुमारी—सखी! व्यर्थ वाद से क्या लाभ, पहले तुम्हें इनसे पूर्णरूप से परिचय ले लेना चाहिये।
युवक—राजकुमारी! जो कुछ पूछना हो, पूछा जाय, हम स्पष्ट उत्तर देंगे।
प्रौढ़ा—आप अपना वंश-परिचय दीजिए।
युवक—सुन्दरी! समय के अनुरोध से हम केवल इतना कह सकते हैं कि यह तुम्हारा अतिथि पौरववंश का क्षत्रियकुमार है, तीर्थ-पर्यटन करते-करते यहाँ तक आ पहुँचा है।
प्रौढ़ा—आप हमारे अतिथि कैसे? क्या आप यहीं पर ठहरे हैं?
युवक—
कमलिनि-मधुलोभी मधुप लहि मरंद की आस।
कुमुद-काननहिं छोड़ि के कहाँ सकै करि बास।।
प्रौढ़ा—पुन: वे ही व्यर्थ की बातें!
युवक—तो आपने नहीं समझा, इसका तात्पर्य यह है कि उपवन-रक्षक ने श्रान्त पथिक जानकर अपने गृह-समीप में मुझे रहने का स्थान दिया है, इसी से हम आप लोगों के अतिथि हैं। आवश्यक वस्तु सब प्रस्तुत है, अब यदि आज्ञा हो, तो हम विश्राम करें, क्योंकि हमने यहाँ तक आकर आप लोगों को बड़ा कष्ट दिया।
राजकुमारी के इंगित करने पर सखी ने पूछा—आप कब तक ठहरेंगे? क्या आप हम लोगों के आतिथ्य से असन्तुष्ट हैं?
युवक—पथिक का क्या ठिकाना!
प्रौढ़ा—तो भी कुछ दिन ठहरना होवेही गा?
युवक—जैसी राजकुमारी की आज्ञा।
प्रौढ़ा—अच्छा, अब कल भेंट होगी।
युवक—कल तो मेरी इच्छा है कि यहाँ का नगर-निरीक्षण करें , और महाराज का भी दर्शन करें।
प्रौढ़ा—अवश्य।
इतना कहकर राजप्रासाद की ओर, राजकुमारी के पीछे-पीछे चली। पर , युवक उस मरालगति में मुग्ध खड़ा था।

द्वितीय परिच्छेद

विस्तृत कुन्तल भार पूर श्रम अम्बु कनी के।
रति श्रम जल लव मण्डित श्रान्त वदन रमनी के।।
लखि लजाई मन माँहि सहित तारा सहचर गन।
चहत छिपन पश्चिम में यह लाञ्छित शशि लाञ्छन।।
ऐरावत करि कुम्भ अरुण-सिन्दूर-विभूषित।
सम लखात प्राची में तरणि-विश्व अरुणाञ्चित।।
मलिन चन्द्र सह नखत-पाँति पश्चिमहिं सिधारत।
नव ऊषापट ओढि़ धरा नव रूप सुधारत।।
शिशिर-किरण सों पूरि रह्यो हरियाली उपवन।
विहरत वायु मनोहर लहि परिमल सरोज बन।।
तरणि-किरण करि करि प्रवेश सम्पुट सरोज में।
विकसावत हरषावत मधुकर गणहिं ओज में।।
मलयानिल सौरभित सुबरसत सुमन कली बहु।
मृदुल कण्ठ सों गावत द्विज कुल शाखा में कहुँ।।
सरिता मन्द प्रवाह लहर लै चलत लहर सों।
विकच नलिन सह नाल हिलत मकरन्द झहर सों।
काञ्चनीय रवि-किरन डारि निज आभा सुन्दर।
पीत करत है सित सरोज गण को अति मनहर।।
साँचहुँ कामी मधुप समान मधुप नलनी सह।

झूमि झूमि गुंजार मधुर आलाप मनहुँ कहं।।
ऐसी प्राभातिक शोभा देखता हुआ वह पथिक मणिपुर के राजमार्ग से चला जा रहा है। इस युवा का वह वीरवेश नहीं है; किन्तु वह गायकवेश में राजकीय मन्दिर के समीप पहुँचा। वहाँ की शोभा में उसका मन मुग्ध हो गया। वहाँ उसे वीणा, मृदंग के साथ स्तुति-स्वर सुनाई पड़ा।
युवक यह जानकर कि राजकीय शिवालय में प्राभातिक पूजन हो रहा है, उसी ओर चला। शिवालय के सुविस्तृत प्रांगण में मनोहर मन्दिर मध्यवर्ती मूर्ति को प्रणाम कर युवक भी आनन्द से अपनी वीणा बजाकर गाने लगा—

हे शिव, धन्य तुम्हारी माया।
जेहि बस भूलि भ्रमत हैं सबही सुर अरु असुर निकाया।
भानु भ्रमत अरु बहत समीरन प्रकट जीव समुदाया।।
तव महिमा को पार न पावत जेहि पर करहु न छाया।
दास दीनता देखि दयानिधि बेगि करहु अब दाया।।

युवक ने ऐसे भक्तिपूरित स्वर से गाया कि मन्दिर में के सब मनुष्य मोहित हो गये। युवक तो गा चुका; किन्तु वीणा की झंकार जो उसके कल-कण्ठ से मिश्रित गूँज रही थी, मन्दिर को स्वर-मय किये हुई थी।
इसी समय दो दीर्घकाय उज्ज्वल वर्ण पुरुष सामने से आते हुए दृष्टिगत हुए और क्षणभर में निकट आ पहुँचे। युवक को देखकर एक ने समीपस्थ व्यक्ति से पूछा—मन्त्रिवर, यह कौन व्यक्ति है?

लै बीणा कर माहिं बजावत यदपि अहै यह।
तदपि कहत कर-चिह्न धनुष को आकर्षक यह।।
विद्याधर सम कान्ति जउ मुख सहज बतावत।
तबहु यह राजन्य कुमार सरिस मोहिं भावत।।

मन्त्रिवर—मणिपुर के राजवंश में प्राय: एक ही सन्तान होता हुआ आया है........
राजा—(जो वास्तव में मणिपुर के महाराज थे)—इससे क्या तात्पर्य है?
मन्त्रिवर—कुमारी चित्रांगदा जब उत्पन्न हुई थीं, उस समय आप बहुत दु:खी हुए थे। उस समय महर्षि ने आपसे कहा कि—राजन् चिन्तित मत हो, यह कुमारी बड़े उच्च राजवंश को स्वयं वरण करेगी, और उसका साक्षात् पहले उसी पुरुष से होगा, उससे एक सुन्दर पुत्र राजकुमारी को होगा, जो कि आपके वंश को उज्ज्वल करने-वाला होगा—अस्तु, मुझे उन्हीं महर्षिजी के बताये हुए प्रत्येक लक्षण इस युवक में दिखाई पड़ते हैं।
यह सुनते ही महाराज को पूर्व की कथा का स्मरण हो आया। उन्होंने सहर्ष उस युवक के समीप आकर पूछा—
निज सुखमय आगमन सों दियो प्रमोद अनन्द। केहि कुल उडुगन के अहौ कहौ मनोहर चंद?
युवक ने प्रणाम करके कहा—राजन् , इस समय तो मैं एक गायक हूँ।
कुछ विचारकर युवक को लिये हुए महाराज राजमन्दिर में आये, और एक सुन्दर गृह में बैठकर वार्तालाप करने लगे।
महाराज—वत्स, अब अधिक न छिपाओ।
धनु आकर्षण के युगल कर में चिह्न लखात।
बिना सव्यसाची नहीं, दूजे में यह बात।।
युवक (नम्रभाव से)—यदि आप जान गये कि मैं अर्जुन हूँ, तो बारम्बार क्यों लज्जित करते हैं?
महाराज—केवल इसलिए कि इस वेश में आप कैसे यहाँ आये? धर्मराज तो सकुशल हैं न?
युवक—
गोरक्षण के हेतु जब, बिप्रन करी पुकार।
हौहूँ तब तुरते गयो, जहँ मम शस्त्रागार।।
नृप कुल चूड़ामणि तहाँ, धर्मराज आसीन।
कृष्णा के संग लख्यो हम, कियो प्रतिज्ञाहीन।।
करन हेतु तेहि पाप को, उत्कट प्रायश्चित।
तीरथ के पय्र्यटन में ठान्यों तब निज चित्त।।
महाराज—
सहि के दु:ख अनेक, तजत नाहिं निज धर्म को।
राखत को अस टेक, बिना चन्द्र कुल चन्द के।।
तो यहाँ आप कहाँ निवास करते हैं और कब राज्य को पवित्र किया?
अर्जुन—राजन् , अभी कल ही तो मैं यहाँ आया हूँ , और नगर के समीप ही एक उद्यान में ठहरा हूँ।
महाराज—पर अब मैं आपसे दो बातें चाहता हूँ, आशा है कि आप उसे मान लेंगे?
अर्जुन—कौन कार्य है? यदि मेरे किये हो, तो मैं सहर्ष करने के लिए तैयार हूँ।
महाराज—प्रथम आप हमारा आतिथ्य स्वीकार करें, और दूसरे इस राज्य की रक्षा करें।
अर्जुन—पहला तो हम सहर्ष स्वीकार करते हैं। और मणिपुर-राज्य पर मेरे रहते कोई आपत्ति नहीं आ सकती।
महाराज—यह तो ठीक है; पर हम आपसे निवेदन करते हैं कि इस राजवंश में प्राय: एक सन्तति होती आई है, किन्तु अब केवल एक राजकुमारी ही है, फिर राज्य का उत्तराधिकारी कौन होगा? इसी हेतु मेरा विचार है कि—

जग ज़ाहिर जग बन्द चन्दकुल को सब जानत।
ता कुल के तुम हौ कुमार लखि हिय सुख मानत।।
तुमको कन्या देई कौन बड़भागी अस।
सब विधि को सुख अहै और यहि में है बहु यस।।
पै शुल्क-रूप हम लेइहैं ता सुत को यह जानिहौं।
मणिपुर सुराज्य को वहै भावी राजा मानिहौं।।
अर्जुन—जैसी आपकी आज्ञा।
निदान महाराज के आज्ञानुसार शुभ समय में वैवाहिक आयोजन हुआ, और अर्जुन और चित्रांगदा विवाह-मण्डप में दिखाई देने लगे।
हवन धूम के ओट में जोड़ी भली लखाय।
मनहुँ जलद के पटल में युग थिर चंद लखाय।।
यथा रीति वैवाहिक कार्य सम्पन्न होने पर ब्राह्मण लोग आशीर्वाद देने लगे—
युग-युग यह जोड़ी जिये, अविचल होवै राज।
प्रेमलता तुम दुहुँन की, फलै सुफल सुख साज।।

तृतीय परिच्छेद

पिया बिसरायो कौने हेत?
तन मन धन सर्बस जेहि सौंप्यो, से करत नचेट।।
जेहि के रंग रंग्यो है हिय-पट लियो सुखाय संवारि।
देखि परत नहिं जाहि उढ़ाओं कुसुम विसिख अनुहारि।।
बिना मेघ दामिनि नहीं रहती चांदनिहु बिन चंद।
आओ जीवन मूरि मिलो अब भुज भरि-भरि स्वच्छन्द।।

मणि-जटित पर्यंक पर लेटी हुई एक सुन्दरी दोनों हाथों से अपने वक्ष-स्थल को दबाये हुए कातर दृष्टि से आवरण-मुक्त द्वार की ओर निहार रही है। उसके कुञ्चित केशकलाप वातायन से आ रहे मलयानिल की प्रेरणा से उस रमणी के हृदय की भाँति कभी-कभी काँप उठते हैं।
सामने बैठी हुई एक स्त्री कोकिल-कण्ठ से अलापती हुई ऊपर लिखा गीत गा रही है, और दूसरी, वीणा का स्वर, उसी संगीत की लय में मिला रही है। संगीत समाप्त होते-होते वह रमणी वातायन के समीप खड़े होकर कलनादिनी नदी के मन्द प्रवाह को निरखने लगी। नदी की चञ्चल तरंगभंगी देखकर उसका चित्त और भी चञ्चल होने लगा। यद्यपि वह अपनी आन्तरिक अभिलाषा को तलस्थायी मुक्ताफलों की भाँति गुप्त रखना चाहती है, तथापि वह अश्रुरूप से निकल ही पड़ती है। रमणी के नेत्रों से निकले हुए अश्रु-बिन्दुओं को कमल-क्रीड़ा करने वाला मलय पवन मकरन्दबिन्दु जानकर हर ले जाता है।
वसन्त की मनोहर सन्ध्या, उसकी तारा-मल-मण्डित मनोहर मूर्ति और तारापति की क्षीण दीप्ति चित्रांगदा को पूर्व स्मृति की झलक दिखा देती है। स्रोतस्विनी के अपर तट के कुञ्जों से ऊपर उठता हुआ चन्द्र जगत् को रजत-रञ्जित बना रहा है, परन्तु चित्रांगदा का हृदय अन्धकारमय है।
अर्जुन से वियोग हुए कई वर्ष बीत गये, चित्रांगदा ने कभी दर्शन भी नहीं पाया।

रहे बनबास सहे बहु कष्ट।
कियो निज बैरिन को मन्द नष्ट।।
लयो सुख राज मिले सब भ्रात।
नहीं हिय माहिं अनन्द समात।।
व्यतीत भये बहु बासर जात।
न पारथ पूछत हैं इक बात।।
सुधीरज हाय धरें किमि प्रान।
लियो नहिं खोज अहो सुखदान।।

इसी से चित्रांगदा का हृदय व्यथित हो रहा है। चित्रांगदा ने निश्वास ले कर सखी से कहा—सखी! कुछ और ऐसा ही गाओ। सखी ने यह पद्य गाना प्रारम्भ किया—

मधुकर प्रीति की रीति नई।
निज दिन देखत हौ गुलाब को कलियाँ कलित नई।
काँटन से उरझत घूमत हो सुधि बुधि बिसरि गई।
खिलत न मलयानिल सों जौ लौं तौ लौं ढिग ठहरावो।
लेई पुहुप रस निज स्वारथ रत फिर नहिं मुंह दरसावो।।
कोकिल-कण्ठ-विनिर्गत वह मधुर राग घर भर में गूँज गया और चित्रांगदा की हृदय-विपञ्ची पञ्चम स्वर से बज उठी। उसकी आनन्द-स्मृति-सुधा उसके नयन-निर्झर से अश्रुरूप होकर झरने लगी। उसने उसी आवेश में कहना प्रारम्भ किया—
सखि!
यौवन ऊषा प्रथम प्रकट जब हिये भई है।
शैशव तारानिकर मलिनता धाय लई है।।
नवल राग सों रंग्यो गयो हियनभ-पट ऐसो।
सह्यो चण्डकर ताप तदपि सन्ध्या में तैसो।।
हाय प्रणय-स्मृति-सूर्य उदय नित हिय-नभ होवै।
पूर्व राग बिस्तारि अलौकिक रंग संजोवै।।
पुनि धरि तीछन किरन बरसि बिरहागिनि ज्वाला।
शान्त होत लहि अश्रुवारि धाराहिं विशाला।।
तब पुनि धारत राग वहै जो प्रथम भयो है।
मधुर करुण सुख-रूप हृदय सौरभित कियो है।।
नव बसन्त की सान्ध्य महा सुखमा-सी सोहै।
सहै यदपि बहु कष्ट तदपि मन वहि महं मोहै।।

“सखि! देखो तो, इतने दिन हुए, प्राणनाथ ने इस दासी का कुछ भी ध्यान नहीं किया। यद्यपि अपना चिह्न-स्वरूप लोचनानन्ददायक हृदयमणि यह सुकुमार कुमार बभ्रुवाहन हमें दे गये हैं; पर, क्या उन्हें इसको भी देखने के लिए न आना चाहिए! हाँ! जीवनाधार! तुमको कुछ भी दया नहीं है?”
ज्योंही इतना कहकर वह चुप हो रही कि मृगया-वेश से सुसज्जित एक सुन्दर कुमार आता हुआ दीख पड़ा। चित्रांगदा ने अञ्चल से आँसू पोंछते हुए उस कुमार को उठाकर गोद में ले लिया।
कुमार बभ्रुवाहन उस समय एक अनिर्वचनीय आनन्द से हँस रहा था, उसे यों हँसते देखकर चित्रांगदा ने पूछा—वत्स, आज क्या है, जो इतना हँस रहे हो?
कुमार—माता, आज बड़े आनन्द का समाचार है।
चित्रांगदा—वह क्या?
कुमार—पाण्डवों के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा हमारे राज्य के समीप पहुँच गया है, कल सवेरे हम उसे पकड़ लावेंगे।
चित्रांगदा—(प्रसन्न होकर) अच्छा बेटा—
कुमार (अपनी धुन में)—माता, सुना है कि वह अश्व बहुत सुन्दर है।
चित्रांगदा—कैसा अश्व, वत्स?
कुमार—वही-वही पाण्डवों के अश्वमेध का।
चित्रांगदा—(चिहुँककर)—पाण्डवों का? कैसा? अश्वमेध का?
कुमार—आपने नहीं सुना? धर्मराज अश्वमेध कर रहे हैं?
चित्रांगदा—वत्स, उसमें युद्ध करना होगा।
कुमार—माता, फिर तुम्हारे पुत्र को और क्या करना चाहिए?
चित्रांगदा—(हँसकर) अच्छा वत्स, यह तो कहो कि अश्व का रक्षक कौन है?
कुमार—सो तो अभी नहीं मालूम। कोई भी हो, जो होगा उससे युद्ध कर अश्व को अवश्य ले आऊँगा।
चित्रांगदा—अच्छा, प्रात:काल—
पुत्र, तुम्हें पहनाय कवच निज हाथन ही ते।
साजि वस्त्र सब अंग देई आशीष सुही ते।।
गोरोचन को तिलक भाल मंगलमय दैके।
लखिहौं बीर प्रसूती ह्वै आनँद हिय लैके।।

चतुर्थ परिच्छेद

चित्रांगदा उद्यान में घूम रही है। उद्यान की शोभा देखते-देखते चित्रांगदा ने सखी से कहा—सखि! कुछ इस उद्यान का वर्णन कर।
सखी कहने लगी—
दिनकर किरन प्रभात में। कुसुम कलिन की घात में।।
निरखत ऊषा-ओट ते। अम्बर पट में लोटते।।
तरु बहु कुसुमन भावते। भरि सुगन्ध रस-भार ते।।
मोद भरे हैं झूमते। धरा धाय कै चूमते।।
दूर्वादल अति श्यामले। शिशिर सिक्त छबि सों भले।।
पाँयन सों मिलि जात हैं। तब अति सुखद जनात हैं।।
क्यारी कुसुमित कुञ्ज की। पपिहा परिमल पुंज की।।
मलयानिल मिलि मोहते। सुखद सरस ह्वै सोहते।।

चित्रांगदा—वाह सखी, वाह! (थोड़ी देर चुप रहकर)—हाँ सखी, यह तो बता कि अश्वरक्षक कौन है, कुछ पता लगा?
सखी (सिर झुकाकर)—महाराज धनञ्जय हैं।
चित्रांगदा—क्या प्राणनाथ?
सखी—हाँ देवी, वह देखो कुमार भी चले आ रहे हैं।
चित्रांगदा—आह, अब मैं क्या करूँ?
कुमार—माता के चरणों में प्रणाम। अब शीघ्र आज्ञा कीजिए, क्योंकि अनुचरों ने अश्व को बाँध लिया है और यह समाचार पाकर पाण्डवों ने युद्ध का उद्योग किया है। मैं युद्ध-यात्रा से पहले आपका आशीर्वाद लेने के लिये आया हूँ।
चित्रांगदा—(कम्पित स्वर से)—अब तो मैं तुमको यही आशीर्वाद देती हूँ कि तुम अपने पिता से भी आशीर्वाद पाओ।
कुमार—क्या माँ, क्या कहा?
सखी—कुमार, आपके पिता मध्यम पाण्डव धनञ्जय ही उस घोड़े के रक्षक हैं?
चित्रांगदा—हाँ वत्स, जाओ, देव-भक्ति से अपने पिता का पूजन कर प्रसन्न करो।
कुमार—जैसी आपकी आज्ञा।
यों कहकर कुमार चल दिये, और मांगलिक वस्तु व पूजनोपचार लेकर मन्त्री के साथ युद्ध-भूमि में पहुँचे।
सेना के मध्य से खड़े हुए अर्जुन ने उस तेजस्वी कुमार को आते हुए देखा—
वीर बदन महं विभा, गमन जनु केहरि शावक।
कर कृपाण झलमलै, तेज जनु ज्वाला पावक।।
भृकुटी विकट विलोल, केश कंधर पै छाजै।
जनु ज्वाला कहँ धूम, घेरिकै अतिशय राजै।।

पूजन की सामग्री लिए हुए मन्त्री और कुमार ने विजय को दण्डवत् किया और मन्त्री ने कहा—
राज्य आपको ही अहै या में संशय नाहिं।
छमहु चूक अनुचरन की जाते शंका जाहि।।
अर्जुन—अच्छा मन्त्रिवर, आपने यह अच्छा सोचा। ऐसे ही चतुर मन्त्रियों से राज्य की रक्षा होती है। पर, यह तो कहो, यह कुमार कौन है? इसका क्या नाम है?
मन्त्री—महाराज, यह आपही के चिरञ्जीव बभ्रुवाहन हैं, और यही मणिपुर राज्य के उत्तराधिकारी हैं।
अर्जुन—(चौंककर) क्या चित्रांगदा का पुत्र?
कुमार—हाँ पिताजी।
इतना कह दौड़कर कुमार अर्जुन के गले से लिपट गये, और अर्जुन ने भी वात्सल्य-स्नेह से कुमार को अंक में ले लिया।
फिर सावधान होकर जब दोनों सामने खड़े हुए, तब अर्जुन ने मन्त्री से कहा—मन्त्री, तुम वास्तव में मणिपुर राज्य के मन्त्री होने के योग्य हो। यदि तुम पाण्डवों के मन्त्री होते, तो कुमार को कभी ऐसी शिक्षा न देते।
इस पर कुमार ने चिढक़र कहा—क्यों पिताजी, कैसी शिक्षा?
अर्जुन—
"क्षात्रधर्म महँ होय गुरुहुँ सों करी लड़ाई।
देवव्रत से गये जौन कुल लही बड़ाई।।
तेरो पितु हौं सोई धर्म महँ दिक्षित ह्वै कै।
करी लड़ाई महारुद्र सों साहस कै कै।।
तू सोई निज जनक को आरति कै रिझवन चहै।
धिक्कार अहै तव मातु को लाज अजौं तू ना गहै।।
सुनिकटु वचन अमरष-भरे, तब कोपि कठिन कुमारने।
आज्ञाकरी रथ लावने को, तीर धनु जो दृढ़ बने।।
पुनि कहो टेरि सुपाण्डवहिं, " सन्नद्ध संगर को रहौ।
यद्यपि पिता तुम हो तदपि, हौं मैं तुम्हारी सुत अहौं।।

रथ आ गया। युद्धवेश से सज्जित कुमार ने अर्जुन के सामने आकर प्रणाम किया, और फिर धनुष टंकारा।

धाये धरि धनु सायक सपच्छ। सब वीर जुरे देखत सुलच्छ।।
तब चले तीर तरवार भल्ल। करि दर्प दाबि भिड़ि गये मल्ल।।
इत विजय और उनको कुमार। दौरे दुहुँ पै दुहुँ गक बार।।
दुहुँ की सेना पूरन उमंग। तब करन लगी मिलि युद्ध रंग।।
कह टेरि सारथी सों कुमार। दाबहुँ दुष्टन को एक बार।।
हौं तुम्हें दिखाओ कला कोटि। नाचैं कबन्ध शिर परैं लोटि।।
इमि कह्यौ जबै कोपित कुमार। सैनहिं दाव्यो सारथि सुधार।।
लाग्यो पहिरावन तब हजार। बानन के बीरन-गले हार।।
सो कपट मित्र से कण्ठ माहि। लगि कै काटत हिय सों उछाहि।।
पुनि तीखे शर जालहि पसार। पाण्डव कुमार किय अन्धकार।।
तब तिन्हैं काटि दीन्हों सुबीर। मध्यम पाण्डव बहु छोड़ि तीर।।
तुरतहि शर जालन दीन्ह छाय। पाण्डव कुमार पुनि पितहि धाय।।
सब काटत हैं अर्जुन सुशस्त्र। शिर धारि अनुपम स्वर्ण-छत्र।।
मनु जलद-पटल बेगिहिं संवारि। दिननाथ प्रकट ह्वै जात टारि।।
तुरतहि छावत शर जाल डारि। कौशल कुमार करिकै विचारि।।
तब क्रोधित ह्वैके विजय वीर। मार्यो कुमार के कठिन तीर।।
मूर्च्छित ह्वै बालक दण्ड एक। पुनि उठ्यो शस्त्र धरिकै सटेक।।
छाड़्यो तीछन इक महाभल्ल। गिरि पर्यो धनंजय महा मल्ल।।
तब कोलाहल भी कटक माहं। सब चकित भये यह दृश्य चाह।।
तुरतहि इक सुन्दर रमणि रूप। लखि चकित भये दुहुँ दल अनूप।।

विमुक्त-कुन्तला उज्ज्वल कान्तिमयी रमणी ने तत्काल आकर उस गिरे हुए वीर धनञ्जय को उठा लिया और रथ पर आरोहण कर सबके देखते-देखते उस सेना से निकल गई।
कुमार भी चकित होकर निहारने लगे। इतने में मन्त्री ने आकर कहा कि चलिये, महारानी ने आपको बुलाया है।
कुमार और मन्त्री दोनों राजभवन की ओर पधारे। सेनापतियों के न रहने के कारण सेनाएँ अपने-अपने स्थान को लौट गईं।
सुसज्जित प्रकोष्ठ में पर्यंक पर अर्जुन लेटे हुए हैं, और चित्रांगदा उनके मुख पर सुगन्धित सलिल सिञ्चन कर रही है। कुमार ने भयभीत भाव से माता को प्रणाम किया।
धनञ्जय को चेत हुआ, उन्होंने अपने को एक विचित्र-मणिमय भवन में पाया, सामने देखा तो चित्रांगदा विराजमान है। अर्जुन ने गद्गद् कण्ठ से कहा—प्रिये! क्षमा करना।
चित्रांगदा ने तत्काल प्रणाम करके कहा—आर्यपुत्र, यह आप क्या कहते हैं, इस बालक के अपराध को क्षमा कीजिए।
अर्जुन ने हँसकर कहा—
चिरजीवी सब भाँति यह,
रहे राज सुख पाइ।।
निज कुल कहँ उज्जल करै।
तीन लोक यश छाइ।।

 
 
 Hindi Kavita