Nutu Mokhtar Ka Sawal Tarashankar Bandyopadhyay

नुटू मोख्तार का सवाल ताराशंकर बंद्योपाध्याय

इन्द्रप्रस्थ में राजसूर्य यज्ञ के समारोह के समय ही कुरूक्षेत्र के युद्ध की भूमिका तैयार हुई थी। त्रेता में लंकाकाण्ड की भूमिका भी रामचन्द्र के युवराज्याभिषेक समारोह में बनी थी। फूल की पंखुड़ियों के अदंर जिस तरह कीड़ा छुपा रहता है, उसी तरह किसी-किसी समारोह के आनन्द-उत्सव की ओट में भावी अशांति की संभावना छिपी रहती है। कंकणा ग्राम में भी एक ऐसी ही घटना हो गई। कंकणा ग्राम के रईस निवासियों के दान व सहायता से एक खैराती दवाखाने की स्थापना हुई। उसी के उद्घाटन अनुष्ठान के समारोह में नुटू मोख्तार के साथ कंकणा के जमींदारों का झगड़ा शुरू हो गया।
कंकणा काफी बड़ा व मशहूर ग्राम है। कंकणा गांव की समृद्धि दूर-दूर तक फैली हुई है। दूर से कंकणा की ओर देखने से वह एक देहात नहीं मालूम पड़ता। ऐसा लगता है मानो वह किसी अच्छे शहर का एक रईस मुहल्ला है। बहुत दिनों से यह कहावत चली आ रही है कि धन की देवी लक्ष्मी कंकणा से बंधी हुई है। कहते हैं कि अतीत में कभी देवी लक्ष्मी उस रास्ते से जा रही थीं। एकाएक उनके हाथ का कंगन खुलकर कहीं रास्ते में गिर पड़ा। उस कंगन की ममता से बंधी आज भी वह कंकणा ग्राम में घूम रही हैं। कंगन (कंकण) से ही ग्राम का नाम कंकणा पड़ा है।
कहावत हमेशा कहावत ही होती है, लेकिन किसी कहावत के चलने के पीछे हमेशा कोई कारण होता है, यहां भी एक कारण है। कंकणा ग्राम का मुखर्जी परिवार बंगाल का बड़ा ख्याति प्राप्त धनी परिवार है। बंगाल के अनेक स्थानों में उनका धन बिखरा पड़ा है। अनेक जमींदार परिवार मुखर्जी के कर्ज में डूबे हैं। और फिर मुखर्जी लोग खुद भी जमींदार हैं।
मुखर्जी परिवार के सदस्यों की संख्या अब बहुत बढ़ गई है, फिर भी उससे उनके धन में कोई कमी नहीं आई है। सन्तति वृद्धि के साथ-साथ ब्याज की रकम भी समान रूप से बढ़ती जा रही है। कहते हैं कि मुखर्जी परिवार के संदूक में रुपयों के भी बच्चे पैदा होते हैं लेकिन यह भी कहावत ही है। कंकणा के बाबुओं के ब्याज का व्यापार लाखों रुपये का है।
लेकिन आश्चर्य की बात है कि ऐसे अमीरों के गांव में न तो एक स्कूल है, न दवाखाना, यहां तक कि हाट-बाजार भी नहीं है। होने को है तो सही, दो-एक मिठाई की दुकानें, लेकिन उनमें भी लाई-गट्टा और बताशे के सिवाय और कुछ नहीं मिलता। दूसरी मिठाई रखने के लिए बाबू लोगों की मनाही है, इसलिये दुकानदार भी कोई नहीं रखते।
बाबू लोगों का कहना है कि मिठाई रहने से बच्चे जरूर खायेंगे, और मिठाई खाने से उनके पेट में केचुए पैदा होंगे।
हलवाई कहते हैं, बिक्री बट्टा तो सब उधार में चलता है, मिठाई रखने से क्या फायदा। मालगुजारी में से कितना कटाया जा सकता है? और फिर, हमारी दुकान में बकाया बढ़ने के साथ ही साथ बाबू लोगों के बही-खाते में हम पर ब्याज की रकम बढ़ने लगेगी।
हाट की बात उठने पर कंकणा के बाबू लोग कहते हैं- हाट का मतलब तो लक्ष्मी को लेकर व्यापार, उससे तो लक्ष्मी देवी चंचल हो जाएंगी। स्कूल की बात से वे चौंक उठते हैं, कहते हैं, 'अरे राम! मां लक्ष्मी की सौत को घर लाएं? लड़के बाहर जाकर पढ़-लिख आवें, कोई हर्ज नहीं, लेकिन कंकणा में सरस्वती जी का आसन नहीं बिछाया जाएगा।'
दवाखाने के बारे में भी ऐसे ही तर्क अवश्य उठाये होंगे, परन्तु जिला मजिस्ट्रेट साहब के सामने यह तर्क नहीं चल सका। साहब के आदेश पर बाबुओं के चन्दे से एक खैराती दवाखाना की स्थापना हुई।
उसी खैराती दवाखाने के उद्घाटन का दिन था। बड़े धूम-धाम से कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। दवाखाने की नई इमारत के सामने शामियाना लगाकर देवदार की पत्तियों और रंग-बिरंगी झंडियों से मंडप सजाया गया था। थाने के जमादार बाबू से लेकर जिले के जज-मजिस्ट्रेट तक सभी पधारे थे। सदर व महकमे के वकील-मोख्तार लोगों में भी अनेक लोग उपस्थित थे। भालकुटी ग्राम के मोचियों का अंग्रेजी बाजा तक किराये पर लाया गया था। आवाहन, वरण, पुष्प वर्षा, माल्यदान, प्रार्थना-गान खत्म होते-होते तालियों की गड़गड़ाहट के असर से कार्यक्रम खूब जम उठा था। सभा मंडप में एक तरफ शेरवानी, पगड़ी, अंगूठी, घड़ी, सोने की जंजीर से सजे-धजे मुखर्जी बाबू लोग बैठे थे। उनमें कुछ नौजवान उम्र वालों ने हैट, कोट, टाई पहन रखा था। उनकी आंखों पर चश्मे थे। बाबू लोग हर कार्यक्रम के अन्त में सर हिलाकर हल्के-हल्के मुस्कुरा रहे थे।
इसके बाद भाषण का मौका आया। किंतु अब सभा मुरझा सी गई। ऐसा लगने लगा कि आयोजन में सिर्फ तालियां बजाने वाले लोग ही हैं- भाषण देने वाला कोई नहीं। आखिरकार फौजदारी अदालत के एक वकील साहब उठे और उन्होंने लक्ष्मी देवी के आश्रित उस वंश की तुलना कल्पतरु के साथ करते हुए कुछ देर तक बोलकर सभा की इज्जत बचाई। उनका भाषण खत्म होते ही तालियों की गड़गड़ाहट से सारा मंडप गूंज उठा।
इसके बाद सभा में फिर वही पहले जैसी चुप्पी छा गई। सभापति थे जिला के जज साहब। उन्होंने चारों ओर देखकर पुकारा, 'आइए, कोई कुछ बोलिये!'
किसी ने जवाब नहीं दिया।
सभापति जी ने फिर कहा, 'बोलिये, बोलिये, कोई अगर कुछ बोलना चाहें तो बोलें।'
रामपुर महकमे के बुद्ध मुन्सिफ साहब ने अबकी बार नुटू बाबू से अनुरोध किया, 'नुटू बाबू, आप कुछ बोलिये?'
नूटू बाबू-नुटबिहारी बंद्योपाध्याय, रामपुर महकमे के मोख्तार हैं। मुन्सिफ साहब उनके हमउम्र न थे, फिर भी दोनों में काफी घनिष्ठता थी। नुटू बाबू ने हाथ जोड़कर कहा, 'मुझे माफ करें।'
लेकिन सभापति जी ने उन्हें माफ नहीं किया। उन्होंने अनुरोध करते हुए कहा, 'नहीं-नहीं, आप कुछ बोलिये न।'
अब नुटू बाबू ने अपने दो मोटे सूती चद्दर कुर्सी पर रखे और उठ खड़े हुए। उन्होंने बोलना शुरू किया, 'सभापति महोदय, और सज्जन वृन्द, शायद आप सभी जानते हैं कि बच्चा पैदा होने के बाद उसके मुंह में सबसे पहले शहद दिया जाता है। कहते हैं कि मेरी मां ने मुझे नीम के फूल का शहद दिया था। मेरी बातें बहुत कड़वी होती हैं। इसीलिए मैं कुछ बोलना नहीं चाहता था। लेकिन भरोसा इसी बात का है कि सब्जियों में करेले का भी एक स्थान है, शरीर में रस की मात्रा बढ़ जाने पर कड़वी चीज खाने का नियम है। इसी वजह से बसंत के मौसम में नीम की पत्ती खायी जाती है। कंकणा ग्राम में हमारे धनी मुखर्जी परिवार के दान से खैराती दवाखाने की स्थापना हुई, यह बड़ी खुशी की बात है, आनन्द की बात है- इसे अच्छा काम अवश्य कहा जा सकता है। लेकिन मुझे बार-बार यही प्रतीत हो रहा है कि गाय मारकर जूता दान हो रहा है और जूता भी उस मरी हुई गाय के चमड़े से ही बना है। इन्हीं बाबुओं के इस इलाके की सिंचाई के लिए तालाब का पानी बंद कर दिया है। इसकी वजह से फसल नहीं पैदा हो पाती, जिससे भूख से मरता किसान कमजोर और रोग का सहज शिकार बन गया है। ब्याज का ब्याज- उसका भी ब्याज उनसे वसूलकर, उन्हें पूरी तरह तबाह कर...'
सारी सभा में खलबली मच गई। सभा में उपस्थित मुखर्जी बाबू लोग बैठे-बैठे पसीने से तर होने लगे। उनकी मुस्कुराहट गायब हो चुकी थी। एक-दूसरे का मुंह ताकते हुए वे पत्थर की मूर्ति की तरह निश्चल होकर बैठे थे। उनकी ओर देखकर सभा की भद्र मण्डली एक अजीब परेशानी का अनुभव करने लगी।
नुटू बाबू तब तक काफी आगे बढ़ चुके थे। वे कह रह थे, 'मुझसे पहले के वक्ता ने कल्पतरु के साथ उनकी तुलना की है। मुझे लगता है कि उन सज्जन ने इनके साथ थोड़ी ठिठोली की है, क्योंकि वास्तविक संसार में कल्पतरु काल्पनिक वस्तु है- आकाश-कुसुम की पुष्पांजलि के समान ही वह मजाक की चीज है। सच्चाई से उसका कोई वास्ता नहीं है। मेरे ख्याल से इनकी तुलना सिर्फ खजूर के पेड़ से की जा सकती है- मेसोपोटेमिया के खजूर का पेड़ नहीं, हमारे बंगाल के निखालिस गुठलीदार खजूर के पेड़ के साथ। उस पेड़ के नीचे बैठकर कभी किसी को छाया नहीं मिल सकती, फल वह भी सिर्फ गुठली ही है, और उस पेड़ का आलिंगन करने जाएं तो बाप रे बाप। एकदम श्रमाया ही है। इनके ब्याज का दर चक्रवृद्धि की रफ्तार से चलता है। इनके रियायों के लिए निर्दिष्ट दुकान का अधेले का चबेना, अधेला का बताशा- यह कोटा बंधा है। अगर ब्याज माफ कर देने के लिए कोई इनसे विनती कर इनसे लिपट जाता है, तो इनकी बातों के कांटों से उसे शर-शय्या ही प्राप्त हो जाती है। बस भरोसा मात्र इन हंसुओं पर है, जो शुद्ध फौलाद के बने हुए हैं- खजूर के पेड़ों का गला काटने के लिए- वे ये लोग हैं।'
यह कहकर नुटू बाबू ने सरकारी कर्मचारियों की ओर इशारा कर समझा दिया कि उनका तात्पर्य वे लोग ही हैं।
'खजूर के पेड़ से रस निकालना हो तो हंसुओं के बिना काम नहीं चलता। हंसुआ चलाने पर मीठे रस की धारा निकल कर गगरी भर देती है। ऐसे ही एक गगरी-भर रस आज हमारे विलायती सोने के पानी चढ़े हुए हंसुए, अर्थात् हमारे मजिस्ट्रेट साहब बहादुर की कृपा से इलाके के लोगों को मिला है। इससे उन लोगों की प्यास थोड़ी सी बुझेगी। इसके लिये हंसुआ व खजूर के पेड़ दोनों को धन्यवाद देकर मैं अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं।'
नुटू बाबू बैठ गये लेकिन तालियां कोई खास सुनाई नहीं पड़ी, सिर्फ कुछ नासमझ बच्चों ने बड़े उत्साह से तालियां बजा दीं। काफी देर के बाद सभा के बाकी सब लोगों ने हाथ पर हाथ लगाया लेकिन उससे कोई आवाज नहीं निकली। उसके पश्चात् सभा स्थल निस्तब्ध हो गया। सभी लोग एक विचित्र परेशानी का अनुभव करने लगे। सभा में ऐसी घुटन हो गई जैसी हवा न बहने से बादलों से घिरी बरसात की रात्रि में होती है। मुखर्जी बाबू लोग सर नीचा किये, गुस्सा दबाकर, मन ही मन अजगर की तरह फुंफकार रहे थे।
किसी तरह सभा खत्म हुई, मेहमान लोग सब चले गये। तब कहीं जाकर मुखर्जी बाबुओं से सर उठाया। उनके सिर विषैले अजगर के समान हो उठे थे। नुटू मोख्तार को खत्म कर डालने की शपथ लेकर वे कोठी के अंदर चले गये।
यह समाचार नुटू बाबू से छिपा नहीं रहा। रामपुर में ही उनके पास कंकणा का समाचार पहुंच गया। बड़े मुन्सिफ बाबू ने ही यह समाचार उन्हें सुनाया। सुनकर नुटू बाबू ने हंस कर, हाथ जोड़ किसी को प्रणाम किया।
मुन्सिफ बाबू ने पूछा, 'क्यों, बाबू लोगों को प्रणाम कर रहे हैं क्यों?'
'नहीं; महर्षि दुर्वासा को प्रणाम कर रहा हूं।'
'तो यूं कहिए कि आप खुद को ही प्रणाम कर रहे हैं, क्योंकि लोग तो आपको ही कलियुग का दुर्वासा कहते हैं।'
नुटू बाबू ने जवाब दिया, 'नहीं। यदि यह सच होता तो लक्ष्मी का अहंकार तोड़ने के लिए एक बार फिर उसे समुद्र के नीचे निर्वासित कर देता।'
नुटू बाबू ऐसे ही स्वभाव के व्यक्ति थे। उस दिन जो उन्होंने कहा था, मेरी मां ने मुझे नीम के फूल का शहद दिया था, वह कोई अतिशयोक्ति नहीं थी। बात चाहे सही न हो, लेकिन उनका आशय बिल्कुल सत्य था। उनका स्वभाव बचपन से ही ऐसा था।
बी.ए. पास कर पहले नुटू बाबू ने स्कूल की मास्टरी का पेशा अपनाया था। उनकी इच्छा थी कि वह अध्यापकी का एक आदर्श खड़ा करें। लेकिन उनके स्वभाव की वजह से उनकी इच्छा पूरी न हो सकी, अध्यापकी का काम छोड़कर मोख्तारी का पेशा अपनाने के लिए उन्हें मजबूर होना पड़ा।
घटना इस प्रकार थी- उस वर्ष पूजा के समय ग्राम के रईस जमींदार चटर्जी परिवार में नुटू बाबू की पत्नी दावत खाने गई थी। पर वहां से वापस आते ही वह रो पड़ी और बोली, 'अब मैं कभी कहीं दावत खाने नहीं जाऊंगी।'
नुटू बाबू कोई किताब पढ़ रहे थे। उन्होंने सर उठा कर पूछा, 'क्यों?'
इस 'क्यों' का जवाब उनकी पत्नी आसानी से नहीं दे सकी, बार-बार उसे रुलाई आ जाती थी। चिढ़कर नुटू बाबू किताब बन्द कर उठ बैठे। बार-बार पूछने पर बड़ी मुश्किल से उन्हें बात समझ में आई। नुटू बाबू की श्रीमती जी दुर्भाग्यवश गांव के अमीर घराने की गहनों से लदी बहुओं की पंक्ति में भोजन करने बैठ गई थीं। नतीजा यह हुआ कि जब भी कोई परोसने आता, उनका अपमान करता। जिस तरह घर की मालकिन व नौकरानी के साथ खुले आम दो तरह से व्यवहार किया जाता है, उसी तरह उनके साथ नौकरानी-सा बर्ताव किया गया।
नुटू बाबू कुछ देर चुप बैठे रहे, फिर अपने ही मन में बोल उठे, 'लक्ष्मी! दुर्वासा ने तुझे नाहक अभिशाप नहीं दिया। उसने ठीक ही किया।'
उनकी पत्नी कुछ समझ नहीं पाई, सिर्फ मुंह बाये उनकी ओर ताकती रही। नुटू बाबू को अपनी ओर देखते ही वह फिर से रो पड़ी।
नुटू बाबू ने कहा, 'अच्छा मुझे दो साल की मोहलत दो। इसका बदला जरूर लूंगा।'
उसके बाद ही मोख्तारी की परीक्षा पास करने के लिये वे तैयारी करने लगे। एक ही साल के अंदर मोख्तारी पास करके रामपुर महकमे में मोख्तारी करने लगे। तीसरे साल पूजा में सधवा भोजन के समय एक अनोखा काण्ड हो गया। मछली परोसी जा रही थी। परोसने वाला जब नुटू बाबू की पत्नी के पत्तल के पास आया, तो उन्होंने अपनी साड़ी के अंदर के रुपयों की एक भारी थैली निकाल कर सामने रख दी और कहा, 'इन लोगों के समान ही गहने मेरे पास भी हो जायेंगे, ये रहे उनके रुपये। अब इनके बराबर मछली मुझे न भी दो, तो भी कम-से-कम एक तो दे ही देना।'
परिवेषक के हाथ से मछली का बर्तन गिर गया। पूरे गांव में इस बात की जोर-शोर से चर्चा होने लगी। लोगों ने सिर्फ नुटू बाबू पर ही दोष नहीं लगाया, उनके पूर्वजों को भी कोसते हुए बोले, 'बबूल का वंश है, इसमें ऊपर से नीचे तक कांटे ही कांटे हैं। कांटा चुभाना इनकी आदत ही ठहरी।'
नुटू बाबू के दादा शास्त्रज्ञ थे, लेकिन पाण्डित्य की ख्याति से अप्रिय सत्य भाषण के लिये उनकी बदनामी ज्यादा थी। एक बार किसी राजघराने में श्राद्ध के सिलसिले में शास्त्रार्थ चल रहा था। युवराज अपनी पंडिताई जाहिर करने के लिए गीता का एक श्लोक बोलते हुए कह उठे, 'अजी स्वयं भगवान ने ही कहा है, 'जदा जदा ही धर्मस्य...।'
नुटू बाबू के दादा ने बीच में ही टोक कर कहा था, 'आपकी जिह्वा की जड़ता अभी दूर नहीं हुई है, उसे और भी मांजने की जरूरत है। 'जदा जदा' नहीं यदा यदा!'
नुटू बाबू के पिता का नाम था, 'कुनो'-काली प्रसाद। वे विशेष पंडित नहीं थे, न ही उनमें कोई और विशेषता थी। समाज में उन्हें कोई प्रतिष्ठा नहीं मिली थी, उसके लिए उन्होंने कोई चेष्टा भी नहीं की थी। लेकिन सारी जिंदगी उन्होंने घर के कोने में बैठकर ही बिता दी। कभी किसी से दुश्मनी नहीं की, फिर भी लोग कहते थे, यह आदमी घमंडी है।
खैर, ये सब पुरानी बातें हैं।
कंकणा के जमींदारों की शपथ सुनकर नुटू बाबू घबराये नहीं। कंकणा के बाबू लोगों ने अपनी परम्परा के अनुसार प्रतिशोध लेने का तरीका ढूंढ़ना शुरू किया। लेकिन उनके कर्मचारियों ने निराश होकर खबर दी कि नुटू बाबू पर कहीं कोई कर्ज नहीं है। बाबू लोग तलाश में थे कि किसी के पास नुटू बाबू का हैंडनोट या दस्तावेज गिरवी रखे हों तो उन्हें खरीद कर नुटू बाबू को कर्ज के जाल में जकड़ कर खत्म कर डालेंगे।
मुखर्जी परिवार के बड़े बाबू ने बहुत देर तक चुप रहने के बाद अपने कर्मचारियों से पूछा, 'लाट कमलपुर के जमींदार की हालत इस समय कैसी है?'
कमलपुर में ही नुटू बाबू का मकान है, खेत, जमीन, तालाब, बगीचा आदि सारी जायदाद कमलपुर के इलाके के अंदर है।
नायब ने जवाब दिया, 'हालत खास अच्छी तो नहीं है, लेकिन किसी तरह गुजारा हो जाता है। हां दो-एक घरों की हालत बहुत खराब है।'
बड़े बाबू बोले, 'तो फिर उन लोगों का हिस्सा खरीद लो, रुपये कुछ ज्यादा लगे तो कोई हर्ज नहीं। लेकिन हां, एक बार हमारे सभी साझेदारों की राय पूछ लो!'
लगभग चार महीने बाद की बात है।
शाम के समय नुटू बाबू संध्या उपासना कर रहे थे...उनकी पत्नी कमरे में आकर खड़ी हो गई। नुटू बाबू ने देख कर भी नहीं देखा। कुछ देर इंतजार करने के बाद पत्नी ने कहा, 'सुनते हो, कमलपुर से हमारा आदमी महाभारत मंडल आया है।'
नुटू बाबू आंखें मूंद कर ध्यान करने बैठे।
पत्नी ने बताया, 'कंकणा के बाबू लोगों ने उसे मारा-पीटा है, उसके तालाब से मछलियां उठवा ली हैं, उसकी गायों को बन्द करवा लिया है।'
नुटू बाबू आंखें बंद किये चुपचाप बैठे रहे। उनकी पत्नी खींझकर कमरे से बाहर चली गई। नियमानुसार संध्या उपासना खत्म करने के बाद नुटू बाबू उठकर बाहर आये और पत्नी से पूछा, 'दूध गरम हो गया!'
पत्नी ने दूध का कटोरा सामने रख दिया तो नुटू बाबू ने कहा, 'देखो, भगवान को कोई पुकारता हो, तो उसका ध्यान नहीं बंटाना चाहिए।'
पत्नी ने कहा, 'बेचारा ऐसे रो रहा है कि मुझसे रहा नहीं गया। आंसुओं से बेचारे का खाना तक नमकीन हो गया है।'
मुंह धोकर पान चबाते-चबाते नुटू बाबू बाहर के कमरे में आये तो महाभारत उनके पैरों में लोट गया। नुटु बाबू ने उसका हाथ पकड़ कर खींचा और कहा, 'पहले उठो और बताओ कि क्या हुआ, उसके बाद रोना।'
महाभारत की रुलाई और बढ़ गई।
नुटू बाबू ने कड़े स्वर में कहा, 'मैं कहता हूं उठोगे या नहीं?'
उनकी आवाज की कठोरता व बात के ढंग से महाभारत हतप्रभ होकर उठ बैठा और आंसू पोंछने लगा।
नुटू बाबू ने पूछा, 'क्या हुआ है, बताओ!'
'जी, कंकणा के बाबुओं ने हमारे तालाब की सारी मछलियां- तीन छंटाक एक-एक पाव की...'
'तीन छंटाक, एक पाव की बात छोड़ो। तुम्हारे तालाब की सारी मछलियों का क्या हुआ बताओ!'
'जी, बाबू लोगों ने जबर्दस्ती पकड़वा लीं!'
'उसके बाद!'
इस सवाल को सुनकर महाभारत हक्का-बक्का होकर उनकी ओर देखने लगा। नुटू बाबू ने फिर से पूछा, 'और क्या किया है!'
'जी, हमारे गाय-बैलों को पकड़वा कर पिंजरापोल में बन्द करवा दिया है।'
'और?'
अबकी महाभारत फूट-फूट कर रोने लगा, रोते-रोते बताया, 'चपरासी से मुझे बंधवाकर-.'
आगे वह बोल न सका।
नुटू बाबू ने कहा, 'अच्छा, लेकिन कारण क्या है? तुम्हारे साथ यह सब उन लोगों ने क्यों किया?'
किसी तरह अपने को संभाल कर आंखें पोंछते-पोंछते महाभारत ने कहा, 'जी, मुझे बाबू लोगों ने बुलाकर कहा कि नुटू मोख्तार की जमीन तुम ही जोतते हो, हमने सुना है। तुम्हें वह जमीन छोड़ देनी होगी। नुटू मोख्तार की जमीन को इस इलाके में किसी को जोतने नहीं दिया जाएगा।'
नुटू बाबू ने कहा, 'अच्छा, फिर?'
'जी, मैंने हाथ जोड़ कर बताया कि हुजूर, यह मुझसे नहीं हो सकेगा। वह बाभन हैं- नेक आदमी हैं। हम तीन पुस्त से उनकी जमीन जोतते हैं- वे हमारे पुराने मालिक हैं। इतना कहते ही, बस-।'
रुलाई के मारे फिर उसकी आवाज रुंध गई। वह चुपचाप जमीन से आंखें गाड़कर आंसू बहाने लगा।
नुटू बाबू ने लंबी सांस खींच कर कहा, 'महाभारत तुम्हें मुकदमा लड़ना होगा। खर्चा-वर्चा सब मैं करूंगा, आना-जाना, अदालत खर्च सब मैं दूंगा। तुम बस मुकदमा दायर कर दो। सोच-विचार कर लो। कल सवेरे मुझे जवाब देना और अगर यह तुमसे न हो सके तो मेरी जमीन छोड़ दो। मुझे कोई दुःख न होगा। तुम्हें जो नुकसान हुआ है, उसे मैं पूरा कर दूंगा।'
उसके बाद लालटेन की लौ उठाकर, कुछ किताबें उतार कर वे बैठ गये। बहुत ध्यान से कानून का अध्ययन खत्म कर जब उन्होंने किताब बंद की, तब इस छोटे महकमे में सन्नाटा छा गया था। दूर के जंक्शन स्टेशन के यार्ड से मालगाड़ी की शंटिंग की आवाज तेज व गंभीर होने लगी थी। महाभारत कब तक वहीं बैठा एकटक नुटू बाबू की ओर देख रहा था। उसकी ओर नजर पड़ते ही नुटू बाबू बोले, 'तुम अब तक बैठे हो, महाभारत! जलपान तो किया है न, तम्बाकू नहीं पी!'
महाभारत की आंखें गीली थीं, उसने जल्दी से आंखें पोंछकर शर्मिन्दा होकर कहा, 'जी हां, जाता हूं।'
नुटू बाबू ने कहा, 'तुम्हारा नुकसान मैं पूरा कर दूंगा, लेकिन बेइज्जती का नुकसान तो मैं पूरा नहीं कर सकूंगा। उसके लिए तुम्हें मुकदमा करना पड़ेगा, राजा के दरवाजे पर जाना पड़ेगा।'
महाभारत फिर से रो पड़ा। नुटू बाबू की आवाज में जो स्नेह का स्पर्श था, उससे उसका शोक मानो छलक पड़ा। उसने कहा, 'बाबू जी, छोटी, कच्ची मछलियां थीं, इस वर्ष की 'हालि-पोना' एक पाव, तीन छंटाक से बड़ी नहीं थी।'
अबकी नुटू बाबू नाराज नहीं हुए, क्रोध नहीं प्रकट किया, हंसे भी नहीं। बोले, 'ठीक है जाओ, तंबाकू पीकर अब खाना-वाना खा लो!'
महाभारत आंखें पोंछते हुए चला गया।
अंदर जाकर नुटू बाबू ने पत्नी से कहा, 'आज हमारे घर में लक्ष्मी की पूजा नहीं होगी।'
आश्चर्यचकित होकर पत्नी बोली, 'क्या बोलते हैं? भला ऐसा भी कहीं हुआ है?'
नुटू बाबू ने कहा, 'नहीं होगी, नहीं होगी।'
पत्नी और कुछ बोलने का साहस नहीं कर सकी।
मुकदमा दायर हो गया।
नुटू बाबू के योग्य संचालन से और तर्कपूर्ण सवालों से सारी घटनाओं पर सजाया गया झूठा आवरण टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया और सत्य की असली मूर्ति प्रकट हो गई। उसी सूक्ष्म व ठोस दलीलों के कारण मजिस्ट्रेट साहब के सामने कंकणा के बाबुओं के गुमास्ता व चपरासियों को दोषी करार देने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। उन्होंने उन लोगों को कड़ी सजा देने का आदेश दिया। चारों ओर तहलका मच गया।
लेकिन किस्सा यहीं पर खत्म नहीं हुआ, कंकणा के बाबुओं ने जज-अदालत में अपील की।
उस दिन शाम के समय बूढ़े मुन्सिफ बाबू ने आकर कहा, 'नुटू बाबू, काफी हो चुका है, अब इस मामले का आपस में निबटारा कर लीजिये!'
आश्चर्य के साथ उनके मुख की ओर देख कर नुटू बाबू ने कहा, 'यह आप क्या कह रहे हैं?'
'ठीक ही कह रहा हूं। झगड़ा तो यहीं खत्म नहीं होगा। मान लीजिये कि जज-अदालत में भी यही सजा कायम रही तो वे हाईकोर्ट भी जाएंगे। फिर, नये झगड़े भी पैदा हो सकते हैं। उनके पास पैसे की कमी तो है नहीं। लोग कहते हैं कि कंकणा में लक्ष्मी बंधी हुई है।'
नुटू बाबू ने कहा, 'मेरा झगड़ा तो उस लक्ष्मी से ही है। उस देवी की आदत ही है लोगों के सर पर पैर रख कर रांदते हुए चलने की। उसके पैरों को मैं जमीन की धूल पर उतारूंगा।'
मुन्सिफ ने कहा, 'अरे छिः छिः यह आप क्या कह रहे हैं, नुटू बाबू!'
नुटू बाबू ने जवाब दिया, 'मैं तो ठीक ही कहता हूं मुन्सिफ बाबू, लेकिन आपको मेरी बात जंच नहीं रही है।'
उसके बाद हंस कर फिर बोले, 'न जंचना स्वाभाविक ही है। लक्ष्मी के पैर तो आपके ही सर पर सवार है। पगडंडी तो संकीर्ण होती हैं, किंतु आपके सर पर तो रथ चलने लायक राजकीय सड़क तैयार हो गई है। आपकी चांद काफी चौड़ी है।'
मुन्सिफ बाबू ठहाका मारकर हंस पड़े और बोले, 'खूब कहा आपने, बड़े मौके की बात कह डाली।'
उसके बाद उस प्रसंग में वे और कुछ नहीं बोले। हास-परिहास में शाम का समय बीत गया।
लेकिन लक्ष्मी की पराजय इतनी आसानी से नहीं होती है, जज-अदालत में अपील किये जाने पर यह मुकदमा खारिज हो गया। नुटू बाबू मुंह लाल किये अदालत से बाहर आये। सत्य की इस अपमानपूर्ण पराजय से उनके क्षोभ व शर्म की सीमा न थी। लेकिन उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ। क्योंकि जज-अदालत के वकील का सवाल सुनकर ही उन्हें इस बात का अंदाजा हो गया था कि वे हारेंगे।
सदर से रामपुर वापस आकर वे संध्या उपासना में बैठे ही थे कि मकान के बाहर कम से कम दस ढाक1 एक साथ प्रचंड आवाज के साथ बज उठे। कुछ क्षण बाद उनकी पत्नी विस्मय-विह्वल होकर उनके कमरे में आई और बोली, 'कंकणा के बाबुओं ने हमारे दरवाजे के सामने ढाक बजाने का हुक्म दिया है। लोगों ने खूब उछल-कूद मचा रखी है।' नुटू बाबू में कोई प्रतिक्रिया न हुई। वे जिस तरह ध्यान में बैठे थे, उसी प्रकार बैठे रहे।
लगभग एक महीने के बाद कंकणा के बाबुओं के घर में एक और समारोह हुआ। कुरूक्षेत्र के युद्ध में जब दुर्योधन द्वैपायन सरोवर में छिप गया था, तब पांडवों ने कोई समारोह नहीं किया था, लेकिन नुटू मोख्तार पराजय की लज्जा में मोख्तारी तक छोड़कर कलकत्ता भाग गये, इस खुशी में कंकणा के बाबू लोगों ने एक अच्छा खासा उत्सव मनाया। उसी समारोह में उन लोगों ने घोषणा की कि ढाक बजाकर बच्चू की मोख्तारी छुड़ायी है, अब कनस्टर बजाकर गांव से भगाएंगे।
बड़े बाबू ने कहा, 'उससे पहले उस महाभारत के बच्चे को खत्म करो, अठारह पर्व में से एक भी पर्व न बचा रहे।'
लगभग तीन साल के अंदर कंकणा के बाबुओं की यह शपथ भी करीब-करीब पूरी होने लग गई। महाभारत सब कुछ गंवाकर अब पूरी तरह छुटकारा पाने का एक आसान तरीका ढूंढ रहा था। लेकिन बहुत ही जिद्दी आदमी है यह महाभारत, किसी भी सूरत में बाबुओें के पैरों पर जाकर लोटने को तैयार नहीं हुआ। और नुटू मोख्तार गांव छोड़कर जो गये तो आज तक वापस नहीं आये। उनकी पत्नी अपने मायके में रहने लगी थी।
उस दिन जमींदार को शुभचिंतक ग्राम्य मंडल ने आकर महाभारत से कहा, 'अरे जा, बाबुओं के पैरों पर लोट जा। पानी में रहकर मगर से लड़ाई नहीं की जाती।'
सिरफिरे महाभारत ने जवाब दिया, 'लड़ाई करो तो मगर काटता ही है, न करो तब भी काटता है। इसलिए लड़कर मरना ही अच्छा है।'
मंडल नाराज होकर बोला, 'लक्ष्मी जब सर पर सवार होती हैं तब इंसान का दिमाग इसी तरह घूम जाता है।'
महाभारत ने कहा, 'मुझे लक्ष्मी ही ज्यादा पसंद है भैया, वह किसी को छोड़कर नहीं जाती।'
मंडल अवाक् हो गया, आखिर में उसने कहा, 'मेरा भी क्या कसूर है! नहीं तो ब्राह्नण जमींदार...'
महाभारत एकाएक भभक उठा, हाथ-पैर फेंकते हुए चिल्ला-चिल्लाकर बोलने लगा, 'चंडाल कसाई, चंडाल कसाई।'
दो दिन के बाद ही महाभारत की टूटी झोपड़ी में आग लग गई।
औरत व बच्चों की चीत्कार सुनकर लोग दौड़ आये, तो देखा महाभारत की झोपड़ी जल रही है। लेकिन महाभारत उधर ध्यान न देकर एक लंबे चौड़े काले जवान की छाती पर चढ़कर बैठा है और बेरहमी से उसे दबोचता जा रहा है। बड़ी कठिनाई से लोगों ने उस आदमी को महाभारत से छुड़ाया। दम घुटने से वह हांफते-हांफते बोला, 'पानी'।
महाभारत ने छलांग लगाकर एक जलता अंगार खींच लिया और कहा, 'ले पी पानी।'
उसी आदमी ने महाभारत के मकान में आग लगाई है, वह कंकणा के बाबुओं का चपरासी है। महाभारत ने उसे पुलिस के हाथ सौंप दिया। दूसरे दिन वह जले मकान की आग से चिलम सुलगाकर बेफिक्री के साथ तंबाकू पी रहा था, इतने में किसी ने आवाज लगाई, 'महाभारत!'
महाभारत ने बाहर आकर देखा, जमींदार का गुमाश्ता खड़ा हैं। छूटते ही उसने चिल्ला कर कहा, 'मैं कोई समझौता नहीं करूंगा, किसलिए आये हो तुम!'
गुमाश्ता ने कहा, 'अरे सुनो तो सही।'
कुछ भी न सुनकर महाभारत ने दोनों अंगूठे उसके सामने हिलाकर कहा, 'ले ले केला, ले ले केला, अब तू हमारा क्या बिगाड़ेगा!'
गुमाश्ता काला मुंह लेकर वापस चला गया, जाते समय उसने कहा, 'अबे गंवार, तू कुछ जानता भी है दुनिया किसके वश में है?'
दो दिनों के बाद रामपुर से नुटू बाबू का पुराना मुहर्रिर महाभारत को लेकर चला गया।
उसी दिन दोपहर को रामपुर की फौजदारी अदालत में महाभारत को साथ लेकर नुटू बाबू वकील का गाऊन पहन कर पहली बार दाखिल हुए। वे वकील होकर वापस आये हैं। इतने दिनों तक वे कलकत्ते में कानून की पढ़ाई कर रहे थे।
अब कंकणा के बाबू लोग काफी चिंतित हो उठे। नुटू बाबू की पैरवी पर एस.डी.ओ. साहब स्वयं घटनास्थल का मुआयना कर गये। अंत में कंकणा के बाबुओं के नायब गुमाश्ता को भी अभियुक्त बनाकर मुकदमे को दौरा अदालत में सुनवाई के लिए भेज दिया गया। नुटू बाबू खुद भी सदर में जाकर बैठ गये, सिर्फ बैठे ही नहीं, सरकारी वकील के सहयोग से खुद ही मामला चलाने लगे।
कुछ ही दिनों के अंदर कई लोगों के माध्यम से अनेक विनीत अनुरोध और अनेक प्रकार के लुभावने प्रस्ताव नुटू बाबू के पास आये। उन लोगों ने कहा, 'मुकदमा वापस ले लीजिये, इससे आपकी ही मर्यादा बढ़ेगी।'
नुटू बाबू ने कहा, 'अमीर के साथ गरीब का झगड़ा कभी न समझौते से खत्म हो सकता है। न कभी हुआ है और न कभी होगा।'
आखिर में उन्होंने कहा, 'हां, अगर बाबू लोग खुद कंधों पर ढाक लेकर अदालत के सामने बजाएं, या महाभारत के मकान की छत पर खुद चढ़कर उसे छा दें, तो मैं कोशिश कर सकता हूं।'
अनुरोध करने वाले मुंह काला करके उठ गये। मामला चलने लगा। गवाही सुनवाई खत्म हो जाने पर सरकारी वकील की सम्मति से नुटू बाबू ने सबसे पहले सवाल पूछना शुरू किया। ऐसा लगा मानो ज्वालामुखी पर्वत फट पड़ा हो। गहरी संवेदना से पूर्ण ओजस्वी भाषा के द्वारा सारी घटनाओं को उन्होंने मानो अदालत की आंखों के सामने प्रत्यक्ष खड़ा कर दिया। बलवान के अत्याचारों से त्रस्त दुर्बल के हाहाकार ने मानो मूर्त स्वरूप प्राप्त कर लिया। झगड़े के मूल सूत्र से शुरू कर इस आगजनी तक की सारी घटनाओं को गवाहों की गवाही के साथ मिलाकर उन्होंने साबित करते हुए आखिर में कहा, 'आज सब ओर धन के मद में मदहोश धनिकों के अत्याचारों से दुनिया जर्जरित हो गई है। विचाराधीन घटना उसकी एक जलती हुई मिसाल है। लेकिन अफसोस की बात यही है कि धनी के अपराध का दण्ड दुर्बल को देने के सिवाय न्यायाधीश के सामने दूसरा कोई उपाय नहीं है। लेकिन उसका विचार तो कोई और करेंगे- जो सर्मज्ञ हैं, सर्वत्र विराजमान हैं, सर्वनियन्ता हैं- वे इसका इंसाफ जरूर करेंगे। उस न्याय का थोड़ा-सा अंश हमें मालूम है, जिसे ईश्वर के पुत्र महामानव ईसा मसीह खुदा बता गये हैं। उन्होंने बताया है- धनी के ईश्वर के राज्य में प्रवेश की अपेक्षा सुई के छेद में से ऊंट का चला जाना आसान है।'
उनकी जिरह के बाद सरकारी वकील को और कुछ कहने की जरूरत नहीं मालूम हुई। फैसला सुना दिया गया, जिसमें अपराधी को कठोर सजायें दी गयीं। फैसले के बाद नुटू बाबू के बाहर आते ही उनके मुहर्रिर ने कहा कि तीन मुवक्किल मुकदमे के कागजात लेकर बैठे हुए हैं।
नुटू बाबू के दिमाग में उस समय भी उसी मुकदमें की बात घूम रही थी। भौंहें सिकोड़ कर वे मुहर्रिर को घूरने लगे।
उसने बताया, 'एक सेशन्स और दो एस.ओ.ओ. कोर्ट के मुकदमे हैं, मैंने चार रुपये फीस बताई है।'
पीछे से एक मोख्तार मित्र ने आकर बधाई देते हुए कहा, 'बहुत बढ़िया आर्गूमेंट हुआ है। अब फटे हुए पैंट और जूते बदल डालीए भाई। मेरे हाथ में एक केस है, तुम्हें ही वकालतनामा दूंगा। लेकिन मुवक्किल गरीब है।'
नुटू बाबू ने कहा, 'भेज देना। पैसे के लिये कोई फिक्र न करो!'
यह दुनिया अजीब है, लेकिन इस दुनिया में घटित होने वाली घटनाओं की विचित्रता और भी विस्मयकारी है। समय की विचित्र धारा की गति में कंकणा के बाबुओं के साथ नुटू का विरोध एक दिन अचानक एक असंभव परिणाम के साथ समाप्त हो गया।
पन्द्रह साल के बाद। उस दिन अचानक कंकणा के बाबुओं की बग्घी नुटू बाबू के मकान के अहाते में घुसी और दरवाजे के सामने आकर रुक गई। अंदर से बूढ़े बड़े बाबू जी, उनके पुत्र और तीसरे बाबू उतर आये। नुटू बाबू के दरबान ने बाकायदा उन्हें सलाम किया और दरवाजा खोल दिया। साथ ही साथ दो खानसामे आकर श्रद्धा के साथ नमस्कार कर कुर्सियों को पोंछ कर, अगल-बगल खड़े हो गये। बूढ़े बाबू जी ने कमरे के चारों तरफ देखकर कहा, 'वाह भाई वाह! हमारे नुटू ने तो यहां इन्द्रपुरी बना डाली है। खूब, खूब!'
बड़े बाबू के पुत्र ने एक खानसामा को बुलाकर कहा, 'अब वकील साहब को खबर दो। बोलो कंकणा के बड़े बाबू और तीसरे बाबू आये हैं।'
नुटू बाबू को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे तुरंत नीचे उतर आये और बोले, 'आइए, अहोभाग्य है, आज मेरा!'
बड़े बाबू जी ने कहा, 'तुम्हारे बिना बुलाये ही हम आये हैं, अब बैठने दोगे या भगा दोगे।'
नुटू बाबू सकुचा गये, बोले, 'अरे यह आप क्या कहते हैं? क्या मैं ऐसा कर सकता हूं या कोई भी भला आदमी कर सकता है?'
बड़े बाबू ने मुस्करा कर कहा, 'ठहरो, आज मैं तुम्हारे साथ सवाल करूंगा। तुम तो इस समय हमारे मुल्क के सबसे बड़े वकील हो, दूसरे जिलों से भी लोग तुम्हें बुला कर ले जाते हैं। देखता हूं आज कौन हारता है!'
नुटू बाबू ने आदर के साथ कहा, 'ठीक है, बैठने की कृपा करें!'
बड़े बाबू ने कहा, 'मान लो कि तुम्हारे घर कोई भिखारी आया है, उसे बैठने के लिये कहने से क्या फायदा अगर उसे भीख ही न दो।'
नुटू बाबू ने हाथ जोड़कर कहा, 'आप लोग मुझसे भीख मांगेंगे यह तो असंभव बात है, आशंका की भी बात है। यह तो बलि के द्वार पर बाभन के भीख मांगने जैसा मामला है। ठीक है पहले बैठ तो जायें।'
बड़े बाबू बार-बार गर्दन हिलाते हुए बोले, 'उहूं, पहले तुम वादा करो कि दोगे, तब बैठूंगा, नहीं तो जाता हूं।'
नुटू बाबू ने कहा, 'ठीक है, कहिये अगर मेरी क्षमता के अंदर होगा तो दूंगा।'
बड़े बाबू ने कहा, 'तुम्हें अपने पुत्र को मुझे भीख में देना होगा, मेरी नातिन को तुम्हें अपने यहां आश्रय देना होगा'
बड़े बाबू के पुत्र ने आकर नुटू बाबू के दोनों हाथों को पकड़कर विनती की। नुटू बाबू के आश्चर्य का ठिकाना न रहा।
तीसरे बाबू ने कहा, 'तुम्हारा लड़का बहुत अच्छा है, बी।ए। और एम।ए। में फर्स्ट आया है, तुम भी अब काफी धनी हो गये हो, बड़ी-बड़ी जगहों से तुम्हारे लड़के की शादी के लिये प्रस्ताव आ रहे हैं। लेकिन कंकणा मुखर्जी परिवार की लड़की धन, वंश व इज्जत में तुम्हारे पुत्र के अनुपयुक्त नहीं होगी। रूप की बात मैं नहीं कहता, वह तुम खुद ही देख सकोगे।'
नुटू बाबू ने बड़े व तीसरे मुखर्जी बाबू का चरण स्पर्श करते हुए कहा, 'आप लोगों की नातिन हमारे घर आयेगी, यह सचमुच मेरा सौभाग्य है!'
जिस विरोध की शुरुआत एक समारोह में हुई थी, एक और समारोह में उसका अंत हो गया।
विवाह सम्पन्न हो गया।
कार्यक्रम का अंत होने के बाद भी उत्सव खत्म नहीं हुआ था। आये हुए रिश्तेदारों में से सब लोग अभी नहीं गए थे। कुछ बेशर्म लालची रिश्तेदार वहीं डेरा डाले पड़े रहेंगे- ऐसा मालूम होता था। उन लोगों के बच्चों के मारे तस्वीरें फूलदान वगैरह टूट-फूट कर खत्म होते जा रहे थे।
नुटू बाबू सवेरे एक आराम कुर्सी पर बैठे तंबाकू पीते-पीते इसी समस्या के बारे में सोच रहे थे। बहुत परिश्रम और अनियमितता के कारण उनकी तबियत खराब हो गई थी, कुछ बुखार भी था। नौकर ने आकर खबर दी कि उनकी फाउन्टेन पेन कहीं नहीं मिल रही है। नुटू बाबू का खून सर में चढ़ गया। उन्होंने तुरंत श्रीमती जी को बुला भेजा। श्रीमती जी के आते ही उन्होंने आदेश दिया- रतनपुर की काली की मां, पारुल की श्यामा-ठकुराइन-सबको आज ही वापस लौटने के लिए कह दो।
श्रीमती जी ने आश्चर्य के साथ कहा, 'यह कैसे हो सकता है। कोई अतिथि खुद जब तक न जाये, उसे जाने के लिये कैसे कहा जाये। अपने ही तो लोग हैं।'
नुटू बाबू ने कहा, 'अपने लोगों से मैं छुटकारा पाना चाहता हूं। मुझ पर दया करो, उन्हें विदा करो। चाहे तो कुछ रुपये पैसे दे-दिवाकर विदा कर दो, नहीं तो वे कमरे दरवाजे सब तोड़-ताड़ देंगे।'
श्रीमती जी असमंजस में पड़ कर अंदर चली गयीं। नुटू बाबू थकावट के मारे कुर्सी पर लेट कर शायद रिश्तेदारों से छुटकारा पाने का उपाय सोच रहे थे। थोड़ी देर में मुहर्रिर ने आकर मुकदमे के कागजात सामने की मेज पर रखते हुए कहा, 'आपने फैसले की जो नकद मांगी थी, वह लाया हूं लेकिन खर्च नाहक कुछ ज्यादा हो गया है।'
नुटू बाबू सचेत होकर उठ बैठे। एक सेशन्स मुकदमे के फैसले की नकल उनके सामने रखी थी। इस मुकदमे में नुटू बाबू की अप्रत्याशित पराजय हुई थी। उनके कुछ सूक्ष्म तर्कों को न्यायाधीश ने अनुचित ढंग से अस्वीकृत कर दिया था! भौंहें सिकोड़ कर उन्होंने उस फैसले को उठा लिया। मुहर्रिर चला गया। फैसला पढ़ते-पढ़ते नुटू बाबू की आंखें व मुंह लाल हो गये। न्यायाधीश के मन्तव्य व अनुचित न्याय पद्धति को देखकर उनके क्रोध की सीमा न रही। गुस्से के मारे उन्होंने फैसले को उठाकर दूर फेंक दिया और कमरे के अंदर चहलकदमी करने लगे। ऊपर के कमरे में रिश्तेदारों के लड़कों ने ऐसा हुड़दंग मचा रखा था जिसकी कोई हद नहीं थी। नुटू बाबू बड़ी परेशानी के साथ ऊपर की ओर ताक कर बोले, 'भगवान रक्षा करो।' नौकर ने आकर कई चिट्ठियां मेज पर रख दीं। चिट्ठियों को देखते समय एक बहुत परिचित हस्ताक्षर में लिखे लिफाफे को देखकर उन्होंने आग्रह के साथ उसे खोला, हां पुराने मित्र वृद्ध मुंसिफ बाबू की चिट्ठी थी। इस शादी में नहीं आ सके, उसके लिए क्षमा मांगते हुए उन्होंने लिखा था-
'आने की इच्छा प्रबल थी, फिर भी गठिया के दर्द के सामने इच्छा की हार हुई! बिस्तर पर लेटे-लेटे ही आपके पुत्र व पुत्रवधू को आशीर्वाद भेज रहा हूं। डाक से कुछ आशीर्वादी भेंट भी भेजी है कृपया स्वीकार करें'
अंत में उन्होंने लिखा था-
'आज एक बात कहूंगा, नाराज मत होइयेगा। एक दिन आपने कहा था, लक्ष्मी जी को लोगों के सिर पर पैर रखकर रौंदते हुए चलने की आदत है। उनके चरणों को आपने रास्ते की धूल में उतारने की बात कही थी। लेकिन आपने तो उन चरणों को खींच कर अपने ही माथे पर रख लिया। आप लज्जित न हों, ये चरण कमल हैं ही इतने लुभावने कि अपने सर पर रखे बिना चैन ही नहीं मिलता। क्या आपके सर पर भी देवी जी के रजत रथ के उपयुक्त रास्ता तैयार हो गया है! समझे या नहीं, गंजापन आया है, या नहीं!'
पत्र की भाषा तीखे भाले की नोक की तरह उनके मस्तिष्क में आकर चुभ गई। अस्वस्थ उत्तेजित मन के अंदर अचानक एक विचित्र भाव का आविर्भाव हुआ। पूरी जिंदगी क्षण भर में उनकी आंखों के सामने सिनेमा के चित्रों के समान स्पष्ट दिखाई देने लगी। ऐसा लगा जैसे उनका मकान, उनका ऐश्वर्य सब कुछ जैसे कुत्सित भाव से उनका उपहास कर रहे हैं। फिर ऐसा प्रतीत हुआ 'जैसे कमरे में लटकने वाली सभी तस्वीरों में मुन्सिफ बाबू का व्यंग्य से भरा चेहरा उनका मजाक बना रहा है। रतनपुर की काली मां और पारुल की श्यामा ठकुराइन ने ऊपर विजय उत्सव के सिलसिले में ताण्डव नृत्य शुरू कर दिया है?'
थर-थर कांपते हुए नुटू बाबू एक कुर्सी पर बैठ गये। महाभारत ने आकर प्रणाम करते हुए कहा, 'हुजूर, पारुल की श्यामा ठकुराइन घर जा रही हैं, मैं भी जाऊं उनके संग?'
नुटू बाबू से कोई जवाब देते नहीं बना, उनका दम मानो घुटने लगा था। विह्वल दृष्टि से वह कमरे से बाहर निकलने का दरवाजा ढूंढ़ रहे थे, लेकिन कहां, दरवाजा कहां हैं?

(अनुवादः जितेन्द्र बंधोपाध्याय)

 
 
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